Thursday, November 26, 2015

राजनीति की शिक्षा


हमारे बाप रहे चपरासी के लड़का। उस समय कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढाई नहीं होती थी। राजनीति होती थी। तो वे रहे छात्र नेता। इसलिए पढ लिख गये। उसके बाद से वे आगे बढ़ते गए। हम लोग भी पैदा हुए और मां बाप को देख देख कर आगे बढते गए। उसी समय हमें समझ आ गया कि पढना लिखना इस दुनिया में बिलकुल जरूरी नहीं है। आप दुनिया में क्या करंेगे ये भगवान तै कर देता है। वो आपके मां बाप तय कर देता है। आप दुनिया में आ जाते हैं। उसके बाद आपको कुछ करना नहीं है। बस बडे होते जाना है। उसमें आपको कुछ करना नहीं है। रोज सोना और जागना है। खाना पीना करना है। बस आप बड़े हो जाएंगे। आपके मां बाप आपके लिए करते जाएंगे।
राजनीति में घर का आदमी बहुत जरूरी होता है। वैसे तो घर का आदमी हर जगह जरूरी होता है। धंधे में नहीं होता है ? कभी देखें हैं कि कोई व्यापारी,  कोई कारखाने वाले ने अपने लड़के की जगह किसी और के लडके को धंधे का मालिक बना दिया ? नालायक से नालायक लडका हो तो भी मालिक वहीं बनेगा। हमारे बाप को जेल भेज दिए थे। तो क्या हुआ ? हमारी माताजी खाना बनाते बनाते घर से निकलीं और बिहार की मुख्यमंत्री बन गईं। क्या पार्टी में लोगों की कमी थी क्या ? मगर घर का आदमी जरूरी होता है। आज किसी दूसरे को मुख्यमंत्री बनाए होते तो हम पटना की सडकों पर भीख मांग रहे होते।
राजनीति में जब हम किसी के सगे नहीं हैं तो कोई हमारा सगा क्यों होगा भाई। वैसे राजनीति में सगा होना भी नहीं चाहिए। राजनीति में यदि आप योग्य न हुए और अचानक किसी जुगाड़ से या किस्मत से कुछ बन भी गए न तो दो चार साल में सड़क पर आ जाओगे। इसलिए लोग अपनी औकात देख लेते हैं और पार्टी में अपनी जगह स्वीकार कर लेते हैं। जिन्दाबाद जिन्दाबाद करते रहते हैं और कहते रहते हैं कि हम पार्टी के वफादार सिपाही हैं। न तो वे वफादार होते हैं और न सिपाही होते हैं। बस वो समझदार होते हैं। अपनी औकात समझ लेते हैं। और चुप रहते हैं। अपने हिस्से का खाते हैं और खुश रहते हैं। राजनीति तो दरअसल ये है।
हमारे मामाजी साधू जी, उनका नाम सुना आपने ? उनको पिताजी ने घर का आदमी मानकर बढाना शुरू किया सोचा माता जी भी खुश रहेंगी कि भाई को बढ़ा रहे हैं। तो उनके पर निकलने लगे। उनको लगा कि वो सच में राजनीतिज्ञ हो गए। अरे भई केवल गुंडई राजनीति नहीं है। उनने तत्काल पिताजी पल्ला छोड़ा, दुश्मनों से मिल गए। अब कहां हैं? न दुश्मन बचे न मामाजी।
हमें पिताजी ने बता दिया है कि बस अपनी जगह बैठो। काम को समझो। ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं। हमारे यहंा बहुत से काबिल अधिकारी होते हैं। वो बड़ी बड़ी परीक्षा पास करके आते हैं। उनके पास बहुत दिमाग होता है। वो काम करते जाते हैं। हमें उनको काम करने देना है। वो अपना कमाते हैं हम अपना कमाते हैं। पैसा कमाने की चिन्ता युवावस्था में करना नहीं चाहिए। वो अपने आप आता है। बस एक बार आपकी बदनामी भर हो जाए कि आप पैसा खाते हैं। उसके बाद किसी बात की कोई सीमा नहीं।
लोग कहते हैं कि हमें शर्म नहीं आती। भला ये भी कोई बात हुई। मिनिस्टर बनने में क्या शर्म। हमारे पिताजी को नहीं आई जब उनने हमारी मां को मुख्यमंत्री बना दिया। हमें क्यों आएगी ? और एक बात तो बताइये कि हमारे पिताजी ने पूरे बिहार को रौंद डाला, बढ़िया चुनाव जिताया। अब मिनिस्टर बनाने की बारी आई तो दूसरों को बनाएंगे। और घर के लड़के घर में घुंइयां छीलेंगे। जितने लोग हमारी पार्टी के कोटे से मंत्री बनना थे सो बने। उसी में हम भी बन गए। इसमें शर्म की क्या बात। हम लोग कोई विदेशी लोकतंत्र वाले थोड़े ही हैं कि मिनिस्टर बनना जिम्मेदारी का काम होता है। हमारे यहां मिनिस्टर बनने का मतलब है एक बड़ा बंगला, कुछ लाल बत्ती वाली कारें, कुछ कारिंदे, बस। प्रजा का काम करवाना। उनसे पैसे लेना। उन्हीं पैसों को वापस उन्हीं पर खर्च करना। हां दो चार लोग रखे जाते हैं जो पढ़े लिखे होते हैं। उनसे वैसा काम लिया जाता है। आजकल इन पढे़ लिखे लोगों को पार्टी प्रवक्ता बना देते हैं। वो टी वी में बैठकर हमारी तरफ से बहस करते हैं। तो बड़ा कौन हुआ पढ़ा लिखा कि अनपढ़।
तो अब हम चुनाव जीत चुके हैं। मिनिस्टर बन चुके हैं। अब आगे का काम संतोषी माता संवारे। बाकी पिताजी और नितिश जी सम्हाल लेंगे।......................................सुखनवर


24 11 2015

Saturday, November 21, 2015

मार्गदर्शक मार्ग के दर्शक हो गए

अब आपको क्या बताएं पत्रकार जी। सुबह से तैयार होकर बैठ जाते हैं। नहा धोकर। इस बुढापे जब कल का ठिकाना नहीं है अभी दर्जी से नए कुर्ता धोती बंडी सिलवाए हैं। हम लोग समझाते हैं। भई हो गया। जितना मिलना था मिल गया। अब छोड़ो भी। नए लोग आगे आएंगे। आएंगे क्या आ चुके हैं। अब उनके दिन आएं हैं। सचाई को मान लो न दादा जी। मगर नहीं साहब सुबह से तैयार होकर बाहर कुर्सी लगाकर बैठे हैं। बार बार उठते हैं बाहर झांकते हैं। कोई आया क्या। हम पूछते हैं क्यों रास्ता देख रहे हो तो बोलते हैं हम मार्गदर्शक मंडल हैं। हमारे से मार्गदर्शन लेने नरेन्द्र आएगा, अरूण आएगा। राजनाथ आएगा। गडकरी आएगा। मगर कोई नहीं आता। अरे पत्रकार जी। ये मार्गदर्शक मंडल में हैं या मार्ग के दर्शक हैं। दिन भर रास्ता देखते रहते हैं। और तो और जोशी जी को चिढ़ाने  के लिए मैट्रिक फेल को शिक्षामंत्री बना दिया। विदेश मंत्री बिचारी आज तक विदेश जाने को तरस रही है। वकील साहब को वित्त मंत्री बना दिया।
महीनों गुजर गये हैं। कोई नहीं आया पर इनका दिल नहीं मानता। मानने कोे तैयार नहीं कि इनके दिन लद गए हैं। अरे भई आपको मौका मिला तो था। उस समय आपने अपने को भावी प्रधानमंत्री बनवा लिया था। आप समझे सब आपके कायल हो गए हैं। बाकी लोगों ने सोचा हम चुनाव तो जीतने वाले नहीं हैं काहे को बुढऊ से संबंध खराब करें। कह दिया हां आप ही हो हमारे प्रधानमंत्री। शान से चुनाव हारे। घर बैठ गए। मगर किस्मत तो देखो। पांच साल फिर निकल गए बुढऊ टंच हैं। फिर चुनाव आ गए। इस बार नरेन्द्र अड़ गए। बोले पिछले बार ये थे इस बार मैं रहूंगा। पहले घोषणा करो। नागपुर से ऑर्डर ले आए। चुनाव लड़ गए। अरे इनकी तो टिकिट के लाले पड़ गये थे। चुनाव के पहले ही मार्गदर्शक बनाए दे रहे थे। जैसे तैसे करके तो टिकटें मिलीं। हवा अच्छी बही। सब जीत गए। मगर हसरत तो दिल में ही रह गई। प्रधानमंत्री बनने की। रथ यात्रा निकाली। मस्जिद गिराई। अच्छा माहौल बना। आज भी लोग उन दिनों को याद करके सिहर उठते हैं। मगर जब चुनाव जीते अपनी सरकार बनी तो अटल जी ने एक बार न कहा कि सारी मेहनत इनकी है इन्हें बनाओ प्रधानमंत्री। बना दिया गृहमंत्री।
ले देके इस बार सरकार बनी तब तो हालात ही बेकाबू हैं। प्रधानमंत्री तो छोड़ो संसद सदस्य मान लें वोई बहुत है। ऐसी छीछालेदर इस बुढापे में किसी की न हो भाई। पेंशनर की भी ज्यादा इज्जत होती है भाई। कहते हैं, अब देखो आप लोग अपनी अपनी लठिया सम्हालो दादाजी लोग और एक कमरे में बैठो। हम लोग तुमसे सलाह लिया करेंगे। तुम लोग सोचते रहा करो कौन कौन सी सलाह देना है। अब वे तीनों चारों बिचारे सोच सोच के बैठे हैं कि येे सलाह देंगे वो सलाह देंगे मगर कोई आता ही नहीं। एक को तो देश में रहने की फुर्सत नहीं। दूसरे को चालें चलने से फुर्सत नहीं। एक दो बार सोचा कि नागपुर हेडक्वार्टर में शिकायत कर देंगे फिर देखते हैं कैसे नहीं आते ये जवान रस्ते में। मगर नागपुर से भी डाक आना बंद हो गई।
अब देखो बिहार के चुनाव थे। हम लोग से एक बार पूछ लेते तो क्या बिगड़ जाता। हम लोग की तो वोई हालत हो गई जो शाहजहां की आगरा के किले में थी। बस कमरे में बैठे रहो और ताजमहल तकते रहो। अब हम प्रधानमंत्री की कुर्सी तक रहे हैं। अरे क्या मालूम कब कौन सा चमत्कार हो जाए। कहो किसी को दया आ जाए। अरे दो चार दिनों के लिए ही बन जाएं प्रधानमंत्री। मगर चालाकी तो देखो। बिहार चुनाव में हम लोगों को दो कौड़ी को नई पूछो मगर हार गए (और भैया हार तो ऐसी बेहतरीन हुई है कि तबियत खुश हो गई ) तो कहने लगे कि हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। काए भैया हमारी काहे की जिम्मेदारी। एक सभा में तो लेके नहीं गए। हमारी तो छोड़ो जे दोनों गुजरातियों ने मिलकर बिहारियों को ही बिहार चुनाव से बाहर कर दिया। अब मान लो चुनाव जीत ही जाते तो क्या गुजरात से लाते बिहार का मुख्यमंत्री।
तो भैया ऐसा है कि सब ठीक है। सब जानते हैं। पुरानी कहावत है। गरीब की हाय नहीं लेना चाहिए। और हम तो उजागर कह रहे। हां हमारी हाय लगी और जब तक हम रहेंगे और लगेगी। अब जीत तो लो बेटा कोई चुनाव तुम। ..................सुखनवर

16 11 2015

Tuesday, April 29, 2014

सरकार नहीं बनी तो देख लेंगे

वो सवालों की तरफ से बेफिक्र थे। सवाल पहले से तय थे। जवाब भी तैयार थे। बोलना भर था। बटुक पत्रकार ने पूछ लिया। जवाब आना चालू हुआ ’ बनारस के मुसलमानों को मैं प्यार करूंगा। 16 मई के बाद मैं उन्हंंे इतना प्यार करूंगा जितना किसी नेता ने नहीं किया होगा।’ बात गौर करने लायक है। साफगोई जबरदस्त है। बंदा प्यार करने को तैयार है मगर चुनाव का परिणाम तो आ जाए। फिर कर लेंगे प्यार। प्यार करने लायक तो हो जाएं। हो सकता है प्यार करने की जरूरत ही न रहे। बिना जरूरत क्यों प्यार करें। और फिर ये भी तो देख लें कि इन लोगों ने वोट किसे दिया है। मुझे इनके वोट तो चाहिए ही नहीं। मुझे मिलेंगे भी नहीं। 2002 से लेकर अब तक जो भी किया है वो इसीलिए थोड़े किया है कि इनके वोट चाहिए। गुजरात में कुल 19 सीटें विधानसभा की ऐसी हैं जहां इनके वोट से कोई फर्क पड़ सकता है। मैं तो चाहता ही हूं कि ये 20 फीसदी लोग इकठ्ठे होकर मेरे खिलाफ हो जाएं। जब ये इकठ्ठे हो जाएंगे तभी तो इनके खिलाफ 80 फीसदी लोग इकठ्ठे होंगे। अपनी अपनी राजनीति है। यही तो धु्रवीकरण है। पोलराइजेशन। इसीलिए तो मैंने सोनिया पर अटैक किया कि तुम मुसलमानों को पोलराइज कर रही हो। अपना उद्देश्य था कि हिन्दुओं तक संदेश पंहुच जाए कि वो लोग इकठ्ठे हो रहे हैं तुम भी इकठ्ठे हो। वो कांगे्रस को दे रहे हैं तुम भाजपा को दो। हमारे संघ की राजनीति ये है कि हमें 80 प्रतिशत को धर्म के नाम पर इकठ्ठे करना है। जातिवाद के हम भी विरोधी हैं। इसलिए नहीं कि ये बुरी बात है। नहीं। बिल्कुल नहीं। हम विरोधी इसलिए है कि हम कहते हैं कि गर्व से कहो हम हिन्दू हैं, हम भाजपा के वोटर हैं मगर ये कहते हैं कि हम हिन्दू तो हैं मगर सबसे पहले हम ब्राह्मण हैं या ठाकुर हैं या बनिया हैं या फिर यादव, कुर्मी, जाटव, लोधी न जाने क्या क्या हैं ? जिस दिन ये लोग अपने को जाति से उठकर हिन्दू मानने लगेंगे हमारी बन आएगी। फिर देखते हैं हमें सत्ता में आने सेे कौन रोकता है।’
सुखनवर की चिन्ता दूसरी है। बिका हुआ मीडिया जिस ईमानदारी से अपना पैसा चुकाने में लगा है उससे देश में सचमुच एक ध्रुवीकरण हो तो रहा है। ये मोदी का अखंड पाठ मुद्दों से दूर धर्म की लड़ाई बनता जा रहा है। मीडिया की लड़ाई तो मोदी ने जीत ली है। अब तो ये माहौल हो गया है कि बिना पैसे मिले भी मीडियावाला आएं बाएं शाएं बकने में लगा है। युवा मीडियाकर्मियों  का जोश तो देखते ही बनता है। जब वे कैमरा पर्सन के साथ अपना नाम बताते हैं तो उनके चेहरे का नूर देखने लायक होता है। 16 मई को ये सब थम जाएगा। परिणाम आ जाएंगे। अभी तो मीडिया के भरोसे मोदी जी को शायद दो तिहाई या तीन चैथाई बहुमत मिल रहा है। ये बोलने के लिए भुगतान हो चुका है। कुछ सर्वे भी तैयार हैं जो आज कल में आ जाएंगे। मगर असली परिणाम के बाद क्या होगा। ये जो हिन्दू मुसलमान का उन्माद पैदा किया है चुनाव में बहुमत न मिलने पर, मोदी की सरकार न बनने पर क्या होगा ? दोष किस पर आएगा। जाहिर है ये हिन्दुओं का दोष नहीं होगा। ये दोष ’उन लोगों’ का होगा। तब क्या होगा ? जिस गैर जिम्मेदारी से ये उन्माद इस ऊंचाई पर पंहुचाया गया है वो यूं ही तो खत्म नहीं होगा। होने भी नहीं दिया जाएगा। तब के लिए देश की क्या तैयारी है। कितने गुजरात और कितने मुजफ्फरनगर हो सकते हैं इसके बारे में भी अभी से सोच लिया जाए। क्योंकि कई विद्वानों का कहना है कि संघ परिवार को 2014 का चुनाव नहीं 2019 का चुनाव जीतना है। उनका लक्ष्य ये है।
इस आपाधापी में आम जन कहीं दूर छिटका पड़ा है। उसकी बात तो हो रही है पर उसके लिए नहीं हो रही। आजादी के इतने साल बाद भारत के चुनाव के मुद्दे क्या हैं ? सोनिया गांधी विदेशी है। राहुल अनुभवहीन है। कांग्रेस भ्रष्टाचार करती है। भाजपा साम्प्रदायिक है। हम जोड़ते हैं वो तोड़ते हैं। घोटाले, राबर्ट वाड्रा ये सब तो हो गया। मगर ये तो बताओ कि तुम्हारी सरकार आ जाएगी तो तुम्हारी आर्थिक नीति क्या होगी ? औद्योगिक नीति क्या होगी ? श्रम नीति क्या होगी ? मनरेगा अच्छा है या बुरा है ? भूजल के लिए क्या करोगे ? बड़े बांध अच्छे हैं या बुरे हैं ? खेती को लाभ का काम कैसे बनाओगे ? देश में स्वास्थ्य सेवाओं का कबाड़ा हो चुका है, प्राथमिक शिक्षा का सत्यानाश हो चुका है। उसके लिए क्या योजना है ? हमारे देश की भाषाओं की मौत हो रही है उसके लिए क्या करोगे ? टैक्सों का क्या करोगे ? लगाओगे या टैक्स लेना बंद कर दोगे ? कुछ तो बताओ। कांग्रेस तो बहुत बुरी है पर अपनी योजना तो बताओ ? पेट्रोल,डीजल के दाम का क्या करोगे ? सब्जियों अनाजों के दाम कैसे घटाओगे और तुम्हारे राज में दाम कितने हो जाएंगे ?
काला धन कैसे वापस आएगा ? काला धन जिनका है उन भारत के वीर सपूतों के साथ क्या करोगे ? रामदेव ने कहा है कि केवल बैंकिग ट्रांजेक्शन टैक्स लगाने के बाद किसी टैक्स की जरूरत नहीं रहेगी। उसके बारे में भाजपा का क्या कहना है। ऐसा भी किया जा सकता है कि बाबा अपनी ही कंपनी के लेन देन पर टैक्स की गणना कर लें। बता दें कि अभी कितना टैक्स देते हैं और यदि उनके अनुसार  बैंकिग ट्रांजेक्शन टैक्स लग जाएगा तो वे कितना गुना ज्यादा टैक्स देंगे। वो चाहें तो पिछले दस सालों की गणना करके पिछला टैक्स भी दे सकते हैं आखिर राष्ट्र का सवाल है।.............................सुखनवर
28 04 2014
 

Wednesday, April 23, 2014

वे बेशर्मी से बिके

एबीपी चैनल में एक कार्यक्रम चल रहा है। घोषणा पत्र। इसमें चैनल के बहादुर पत्रकार निर्भीक पत्रकार एक एक पार्टी के नेता को बैठाकर उनसे सवाल करते हैं। कुछ गोल टेबिलों में और विद्वान बैठे रहते हैं जो आज भी वही सवाल करते हैं जो एक साल पहले करते थे। एक दिन देखा तो राज ठाकरे बैठे थे। उनसे प्रश्न करते समय निर्भीक चैनलिये पत्रकारों के हाथ पैर फूल रहे थे। कांपते हाथों और लड़खड़ाती जबान से प्रश्न पूछे जा रहे थे और राज ठाकरे उसी ठसक से जवाब दे रहे थे जैसे वे मुम्बई के वो हैं जिसे किसी को भी पीटकर सुधारने का हक है। दूसरे दिन आजम खां बैठे थे। उनसे भी सवाल जवाब चल रहे थे लेकिन निर्भीक पत्रकारों को आजम खान कह रहे थे कि तुम मीडिया वाले मोदी के हाथों बिके हुए हो। तुमने मोदी से पैसे लिए हैं। तुम काहे के निष्पक्ष। तुम तो सबके बयान तोड़फोड़कर दिखाते हो। मगर बहादुर पत्रकारों ने कुछ नहीं कहा। तीसरे दिन देखता हूं तो मोदी विराजमान हैं मगर सामने जनता नहीं है। तीन नए पत्रकार विराजमान हैं। वे प्रश्न पूछेंगे। आम जनता ? नहीं पूछेगी। ये तीन सधे सधाये सीखे सिखाये प्रायोजित प्रश्नकर्ता फिर उसी कांपती आवाज में मोदी जी से पहले से तय तारीफ भरे प्रश्न कर रहे हैं। समय की सीमा नहीं। कोई व्यवधान नहीं। कोई प्रतिपश्न नहीं। अभिभूत पत्रकारगण। ये इंटरव्यू न जाने कितनी देर चला एक घंटे से ज्यादा का प्रलाप था।
हद तो तब हुई जब चैनल ने बताया कि ये इंटरव्यू दर्शकों को अभी कई दिनों  तक देखना होगा। आज 23 तारीख को फिर इसका प्रसारण चालू है। कल वोटिंग है। प्रचार बंद है। चुनाव आयोग सख्त है। चैनल में इंटरव्यू चालू है।
जब सर्वे आना शुरू हुए थे तभी ये तय हो गया था कि एन डी ए को जब तक पूर्ण बहुमत नहीं मिल जाएगा ये सर्वे वाले चुप न बैठेंगे। पिछले सप्ताह पूर्ण बहुमत आ चुका है। अब जरूरत है कि 12 मई से पहले दो तिहाई या फिर सीधे तीन चैथाई बहुमत दिलवा दिया जाए और इंदिरा गांधी राजीव गांधी का इतिहास दोहरा दिया जाए।
आजकल क्लीनचिट का जमाना है। हर अपराधी के पास एक दो क्लीनचिटें हैं। ज्योंही आप आरोप लगाएंगे कि आप अपराधी हैं अगला कह देगा ये देखो क्लीनचिट। ये मुझे फला तहसील के मजिस्ट्रेट ने दी है। ये देखो मुझे ये तहसीलदार ने दी है। ये देखा ये फलां थानेदार ने दी है। बस इतने से ही काम बन जाता है।
मोदी ने कहा है कि पिछले बारह सालों में गुजरात में दंगे नहीं हुए। इससे भक्तजन बहुत प्रसन्न हुए। मुदितमन से उनका भजन करने लगे। कब्र में  गड़े मुर्दों ने कहा कि अब दंगे कहां से होंगे। हम सब तो यहां पड़े हैं। अब हमें कहां से मारोगे।
भारत का वोटर बहुत समझदार है। वो संसद का चुनाव लड़ने वाले से वो प्रश्न करता है जो उसे नगरनिगम पार्षद से करना चाहिए। उसकी अपेक्षा रहती है कि जीतने वाला हर रोज उसके घर आकर उसकी नाली सड़क के बारे में बात करे। उसके लड़के की नौकरी लगा दे। घर आकर उसका फार्म भर दे। वो सांसद से ये नहीं पूछता कि वो कितने दिन संसद गया। उसने वहां क्या किया। किन मुद्दों पर बोला। उसकी पार्टी ने संसद कितने दिन चलने दी कितने दिन रोक दी। वगैरह।
आप पार्टी का एक भी सांसद नहीं है। उसने कहा है कि हमारा कोई भी संसद कभी संसद में अध्यक्ष की कुर्सी के पास नहीं जाएगा। हर बहस में हिस्सा लेगा। सदन की कार्यवाही नहीं रोकेगा। क्या ये कसम बाकी पार्टी के लोग नहीं खा सकते। जिस संसद में जाने के लिए उम्मीदवार इतनी मेहनत और इतना पैसा खर्च कर रहा है उसी में जाने के बाद वहां संसद का बहिष्कार करना, संसद न चलने देना, बहस न होने देना कौन से मजबूत लोकतंत्र की निशानी है ?
और अंत में यू पी ए और एन डी ए चुनाव के कम से कम अंतिम मतदान के पहले ही आम जनता को यह तो बता दें कि देश की आर्थिक नीति, शिक्षा नीति, विदेश नीति, पर्यावरण, जैसे तमाम मुद्दों पर मतभेद कहां कहां हैं ? कहां कहां उनमें कोई मतभेद नहीं है। घोषणा पत्रों से स्पष्ट हो चुका है कि दोनों में रत्ती भर मतभेद नहीं है।
ये शेखो बरहमन के झगड़े सब नासमझी  की बातें हैं।

Wednesday, April 9, 2014

कल को गोली भी चल सकती है

बताइये कितना बढि़या सबकुछ सैट चल रहा था। कहीं कोई दिक्कत नहीं। कोई समस्या नहीं। हम सब एकदूसरे से सहमत थे। कितना झगड़ते थे। एकदूसरे को हराते थे जिताते थे। कोई सिद्धांत आड़े नहीं आता था। कभी आपने सुना कि हमने मारपीट की हो। गाली गुप्तार से आगे कभी बढ़े नहीं। कितना सही बंटवारा था। हिन्दू हमारे मुसलमान तुम्हारे। पिछड़े हमारे अतिपिछड़े तुम्हारे। व्यापारी हमारे मजदूर तुम्हारे। ऐसा तो नहीं था कि हमने किसी नए आदमी को घुसने न दिया हो। भाई ये तो खेल है। आओ तुम भी खेलो। जैसे रेल के डिब्बे में होता है। जब कोई नया यात्री घुसता है तो सबको दुश्मन लगता है। अगला स्टेशन आने तक वो सैट हो जाता है और फिर उसे भी नया यात्री दुश्मन लगने लगता है। स्टेशन आते रहते हैं। लोग उतरते चढ़ते रहते हैं।
देखिये मूल बात है सेवा। लोकतंत्र का मूल मंत्र। हम सब सेवा करना चाहते हैं। जो सेवा करता है उसे मेवा मिलता है। हम सेवा करते हैं। हमें मेवा मिलता है। सब जानते हैं। हर कोई अपने हिस्से का मेवा खा रहा है। हम लोगों में कभी कोई बुराई होती भी है तो मेवे को लेकर ही होती है। कहीं कोई बड़ी सेवा हो गई। बड़ा मेवा मिल गया तो जाहिर है कि बाकी सेवकों को ईष्र्या होती है। तुमने बड़ा हाथ मार लिया। हमें भी खिलाओ। कभी खिला दिया जाता है। कभी आत्म सम्मान आड़े आ जाता है। आपको ठीक नहीं लग रहा होगा मगर हम लोगों का भी आत्म सम्मान होता है जनाब। यूं ही समाजसेवा नहीं करते। जो कुछ करते हैं सरे आम करते हैं। वो कहावत है न कि उंट की चोरी निहुरे निहुरे। सो जब डाका डालते हैं तो उजागर डालते हैं। कहां तक छुपें भाई साब। और छुपें कैसे। एक एक डील आजकल करोड़ों से कम की होती नहीं। पंचायत का छोटा सा ठेका लेने जाओ तो दो चार करोड़ का काम हो जाता है। और ये लोकतंत्र जो है न बड़ी मुसीबत है। जिसको देखो वोई मुंह फाड़े बैठा है। हमें भी खिलाओ। काम कुछ करना नहीं मगर इन्हें भी खिलाओ। पंचायती राज आ गया है तो पंचों, सरपंचों, पंचायत सचिव, सी ई आ,े कलेक्टर, कमिश्नर, राजधानी, आॅडिट, अब कहां कहां तक गिनाएं। इन सबको देने के बाद बचता क्या है ? घंटा। फिर भी अपना ये है कि भाई हम सब राष्ट्रभक्त लोग हैं। चलो देशभक्त भी कहलो। अब ये भी मुश्किल हो गई है साहब कि शब्द तक बंट गए हैं। राष्ट्रभक्त मतलब एक पार्टी और देशभक्त मतलब दूसरी पार्टी। करते हैं सब सेवा, मगर छुपाते ऐसे हैं जैसे किसी को दिखाई नहीं दे रहा हो। हमारा कहना है कि भई जोर से नारा लगाओ ’’हम सब एक हैं’
इस देश में कानून बनाने वालों मालूम नहीं क्या सूझा कि नियम बना दिया हर पंाच साल मंे चुनाव होंगे। अरे पांच साल में होता ही क्या है। आपने देखा नहीं कि पंचवर्षीय योजना लागू नहीं हो पाई क्योंकि योजना ही नहीं बन पाई। जब योजना बनाने में पांच साल कम पड़े तो लागू करने में तो कम पड़ेंगे ही। फिर चुनाव जीतो। आजकल करोड़ों रूपये का काम हो गया है। सरकार बन गई तो ठीक वसूली हो जाएगी वरना विपक्ष में बैठने में क्या मिलना है। जितना छीन झपट लो उतना बहुत है। जब तक कुछ सैट हुआ। कुछ कमाई हुई कुछ सेवा हुई तब तक पांच साल पूरे फिर चुनाव लड़ो। आजकल टिकिट हासिल करना भी एक चुनाव ही है। ऐसा लोकतंत्र मजबूत हुआ है कि सबकुछ पानी की तरह साफ हो गया है। पार्टी का नेता कहता है कि टिकिट चाहिए पैसा दो। झक मारके देते हैं। भई मार्केट के हिसाब से चलना पड़ता है। तुम नहीं दोगे तो दूसरा दे देगा। फिर करते रहना फोकट की सेवा।
तो जनाब जैसी जमाने की रीत है वैसा हम चल रहे थे। मगर इस देश के नागरिक का क्या करें। खुद आकर कहेगा कि भैया तबादला रूकवा दो जितना खर्चा होगा हम देंगे। फिर बाद में कहेगा कि बहुत भ्रष्टाचार है। लड़के की नौकरी लगवा दो। जितना कहोगे दूंगा। बाद में कहेगा बड़ा भ्रष्टाचार है। तो जनाब सबको बड़ा जोश आया कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन करेंगे। करो भाई। एक बुढऊ को पकड़ लाए। वो अनशन पर बैठ गए। जब तक सरकार भ्रष्टाचार नहीं खत्म करेगी मैं भूखा रहंूगा। आठ दस दिन वो नौटंकी चली। एक बाबा जी दवाई बेचते थे। वो भी अनशन पर बैठ गए। मगर उन्हें उठाना नहीं पड़ा। वो तीन दिन मंे खुद ही अस्पताल पंहुच गए। वो बहुत बहादुर थे। अपनी धोती फेंक फाक के किसी औरत का सलवार कुर्ता पहन के छुप के भागे। फिर पकड़ भी लिए गए। उनकी धोती के अंदर खाकी हाफ पेंट थी।
यहां तक तो ठीक था। ऐसा जोश आना भी जरूरी है। वो कहा जाता है न कि एक बार कुकर की सीटी बजा दो प्रेशर खत्म हो जाता है। तो कुकर की सीटी बज गई। ये आंदोलन बहुत बढि़या था। चाट फुल्की आइसक्रीम वगैरह के साथ दिल्ली वासियों को खूब मजा आया। टी वी वालों को खूब मजा आया। उनका बढि़या धंधा हुआ। दोनों का स्वार्थ पूरा हुआ। उनका आंदोलन चमक गया। उनका धंधा चमक गया।
बुढऊ तो चले गए अपने गांव मगर ये कुछ लोग जो उनके साथ थे बहुत बदमाश निकले। अभी तक क्या होता था कि ये एनजीओ वालों का काम बहुत अच्छा था। ये विरोध करते थे और अपने घर चले जाते थे। राजनीति से दूर रहते थे। राजनीति हम करते थे। विरोध ये करते थे। मगर ये कुछ बदमाश ज्यादा आगे बढ़ गये। इनने अपनी पार्टी बना ली। हम सबने सोचा चलो कुछ दिन में अपने साथ आ जाएंगे। मगर ये तो सिर पर ही चढ़ने लगे। कहते हैं सिस्टम बदलेंगे। अरे भई क्यों बदलोगे सिस्टम। इस सिस्टम में क्या बुराई है। सब मिलकर खा रहे हैं। कभी हम हीरो हो जाते हैं कभी हम विलेन हो जाते हैं। देश का विकास हो रहा है। हमारा विकास हो रहा है। देश की जनता भोली है। वो किसी चपरासी बाबू अफसर को सौ पचास की घूस दे देती है तो समझती है कि ये भ्रष्टाचार है। उसे मालूम नहीं कि हम लोग राजधानी में बैठकर जो खेल खेलते हैं उस पैसे में कितने जीरो हैं वो नहीं गिन पायेंगे। ये फटेहाल क्या जाने विकास क्या होता है। एक डिफेंस डील कितने की होती है। किसी को कहदो कि लिखो बेटा - एक लाख करोड़। अच्छा भला एम बी ए लड़का न लिख पाये ऐसे विकास के आंकड़े।
तो भाई साहब अब हम कुछ गारंटी नहीं दे सकते। अभी तो जूते, चांटा चल रहे हैं। कल को गोली भी चल सकती है। फिर बैठना राजघाट पर। बड़े आए सिस्टम बदलने वाले। 

मेरे सामने कुछ सवाल हैं भाग -2


मेरे सामने कुछ और सवाल भी हैं। पिछले बार मैंने कुछ सवाल उठाये थे जिन पर मित्रों ने काफी ध्यान दिया। ये नई किश्त है।
संसद में कोई व्यक्ति केवल एक सीट का प्रतिनिधित्व कर सकता है। फिर वह दो जगह से क्यों खड़ा होता है। पूर्व में जब भी कोई दो सीटों से चुनाव लड़ा है तो वह इसलिए कि एक जगह से नहीं जीत पाया तो दूसरी जगह से तो जीत ही जाउंगा। मगर जिस आदमी का दावा है कि उसकी लहर चल रही है वो यदि दो जगह से चुनाव लड़े तो यह तो तय है कि उसकी लहर पर उसे खुद विश्वास नहीं है। आपका क्या खयाल है। कैसी लहर है ?
देश दुनिया के हाल जानने का हमारे पास क्या साधन है ? टी वी और अखबार।  हमारे शहर के अखबार में जो गुजरात से 1000 कि मी दूर है और जिसका गुजरात से कोई संबंध नहीं है गुजरात के मुख्यमंत्री के आदमकद फोटो के साथ गुजरात सरकार का विज्ञापन छपता है। क्या इस विज्ञापन के पैसे का अखबार द्वारा मोदी गुणगान करने से कोई संबंध है ? सवाल है। क्या दिन दिन भर टी वी चैनलों द्वारा मोदी के भाषणों का जीवंत लाइव प्रसारण करने और किसी और का प्रसारण न करने का नगद भुगतान करने के अलावा कोई और कारण हो सकता है। आजकल हर चैनल द्वारा लगभग प्रतिदिन एक नया महा सर्वे और उसका परिणाम घोषित किया जा रहा है। भाजपा को प्राप्त संभावित सीटों की संख्या अब 250 तक पंहुच चुकी है। टारगेट 272 से केवल 22 सीट दूर जबकी पहले मतदान को अभी चार दिन बचे है। क्या इन सर्वे का भुगतान से कोई संबंध है ? मुझे महान पत्रकारों और उनके अनुमानों पर कुछ ज्यादा ही भरोसा हो चला है।
टी वी देखने से पता चलता है कि चुनाव दिल्ली, अमृतसर, रायबरेली, अमेठी, लखनउ और वाराणसी में हो रहा है। बाकी किसी प्रदेश में किसी और सीट पर चुनाव हो रहा है इसका पता चल नहीं पा रहा है। क्या केरल, प बंगाल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, बिहार, यू पी में भी चुनाव हो रहे हैं ? असम, नागालैंड आदि में चुनाव हो रहे हैं या वहां बी जे पी के उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गये हैं।इन प्रदेशांे में किसी की चुनाव सभा हो रही है क्या ? वहां चुनाव के मुद्दे क्या हैं ? केरल में चुनाव किन मुद्दों पर लड़ा जा रहा है।
कुछ बहुत छोटे सवाल हैं -
एफ डी आई के बारे में कांग्रेस और बी जे पी में क्या कोई मतभेद है ? यदि है तो क्या है ? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है ?
भारत के सरकारी संस्थानों को देशी विदेशी पूंजीपतियों को बेच देने के बारे में जिसे विनिवेश कहा जाता है क्या बी जे पी और कांग्रेस में क्या कोई मतभेद है ? यदि है तो क्या है ? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है ?
केजरीवाल ने गैस के दामों का मामला उठाया है। इस बारे में कांग्रेस और बी जे पी मंे क्या कोई मतभेद है ? यदि है तो क्या है ? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है ?
हमारे देश के कानूनों के कारण लाखों बेगुनाग लोग अदालतों, जेलों और थानों के चक्कर काटते रहते हैं। इन कानूनों को बदलने की कोई योजना या इच्छा हमारे देश के राजनीतिक दलों को है या नहीं ?
घरेलू हिंसा, दहेज, नारी के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार, जैसे कारणों से हमारे देश की आधी आबादी घुट घुट कर जीने के लिए मजबूर है। इनकी हालत सुधारने की कोई इच्छा या योजना हमारे देश के राजनैतिक दलों में है या नहीं ?
एसिड से जलाने का कृत्य तो बलात्कार से भी अधिक जघन्य है। उसके लिए मौत की सजा का प्रावधान करने की कोई इच्छा या योजना हमारे देश के राजनैतिक दलों में है या नहीं ?
पर्यावरण को बचाने, पानी को बचाने, भूजल स्तर को बढ़ाने, शहरों को हरा भरा बनाने, आम आदमी को अच्छी सड़क पर चलने, अच्छे हवादार घरों में रहने, ज+हर से मुक्त अच्छा खाना देने की कोई इच्छा या योजना हमारे देश के राजनैतिक दलों में है या नहीं ?
इस देश का गरीब आदमी बिना किसी पास के टिकिट खरीदकर रेलवे के दूसरे दर्र्र्जे के डब्बों में सफर करता है। इन डब्बों और इन यात्रियों की हालत क्या आपने देखी है। इन यात्रियों को मनुष्य समझकर रेलवे के डब्बे आम आदमी के लिए सुलभ कराने की कोई योजना या इच्छा हमारे देश के राजनैतिक दलों में है या नहीं ?
हमारे देश के सरकारी स्कूल जर्जर, टूटे फूटे, गंदगी से बजबजाते, शिक्षक विहीन क्यों हैं ? क्या हमारे देश की बुनियादी शिक्षा में कोई सुधार संभव नहीं है ? इसकी कोई योजना या इच्छा हमारे देश के राजनैतिक दलों में है या नहीं ?
हमारे देश के सरकारी अस्पताल जर्जर, सुविधाहीन, डाक्टर विहीन क्यों हैं ? क्या हमारे देश की बुनियादी स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई सुधार संंभव नहीं है ? क्यों नहीं है ?
हमारे देश में लाखों मजदूर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश जाकर मेहनत कर जीवनयापन करते हैं। इनके लिए किसी राजनैतिक दल में कोई सोच है या नहीं ? क्यों नहीं है ?
आज नौकरी करने वालों के लिए काम के घंटे, स्वास्थ्य, मनोरंजन, परिवार, कला, संस्कृति सभी कुछ स्वाहा हो चुका है। इन रोबोटों के लिए किसी राजनैतिक दल में कोई सोच है या नहीं ? क्यों नहीं है ?
यदि हम इन बातों पर विचार नहीं करते और राजनैतिक दल इन बातों के लिए जवाबदेह नहीं हैं तो आपके वोट देने का मतलब क्या है ? आप वोट नहीं भी देंगे तो भी चलेगा न ? आपका वोट कीमती है इस मुगालते में न रहें। लोकतंत्र के इस उत्सव में  आपके वोट के दीपक से किसी और के महल में उजाला होगा। आपका बस तेल जलेगा। 06 04 2014 

मेरे सामने कुछ सवाल हैं भाग -1

मेरे सामने कुछ सवाल है। टीवी के न्यूज चैनलों का आम दर्शक होते हुए भी मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं ये एक गुस्ताखी तो है पर क्या करूं ?
प्रधानमंत्री पद के स्वघोषित और स्वविजयी प्रत्याशी कहते हैं कि देश आजादी के बाद बर्बाद हो गया। आजादी से पहले हमारे अंग्रेज मालिक बढि़या विकास कर रहे थे। इसीलिए ये लोग स्वतंत्रता संग्राम के बजाय अंग्रेजों के साथ थे। आजादी होते ही विकास पूरी तरह रूक गया। इसका मतलब यह हुआ कि हम आज जैसे हैं वैसे ही सन् 1947 में थे। मुझे ऐसा लगता नहीं पर शायद यही सच होगा। सन् 98 से सन् 2004 तक कांग्रेस के अलावा कोई दूसरी दैवीय सरकार थी शायद इन्हीं 6 सालों में ये जो कुछ भी बदलाव हुआ दिखता है वो हो गया हो। पर यदि ये बहुत अच्छा और अनुकरणीय था तो ये दैवीय सरकार दोबारा क्यों नहीं आई ? क्या वोटर पाकिस्तान से आकर इनके विरोध में मत डालकर भाग गये ?
आजादी के बाद से कांग्रेस की सरकार रही जिसने देश का विकास नहीं होने दिया। पर क्या आजादी के बाद चुनाव नहीं हुए। क्या ये सरकार साठ साल तक बिना चुनाव के सत्ता पर बैठी रही ? मगर चुनाव तो हुए तो फिर वोट किसने डाले ? प्यारे बहनो और भाइयों ने ही वोट डाले और विकास विरोधी सरकार को जिताया। बहुत बार तो ऐसा जिताया कि रिकाॅर्ड बन गया। फिर ये सरकार की गलती है या प्यारे भाइयो और बहनों की जिन्होंने कांग्रेस की सरकार को बार बार जिताया।
कांग्रेस ने घोषणा पत्र जारी कर दिया। आपने तो नहीं किया। कांग्रेस का घोषणा पत्र तो एक धोखा है। मगर आप तो सम्पूर्ण धोखा हैं। आपका घोषणा पत्र क्या है ?
कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति करती है। आप काहे की राजनीति करते हैं ? आपको वोटों के बैंक से परहेज है ? क्या आप वोटों के बिना जीत जाएंगे ? कांग्रेस चाहती है कि उसे मुसलमानों के वोट पूरे मिल जाएं तो आप भी तो चाहते हैं कि आपको हिन्दुओं के पूरे वोट मिल जाएं। आप भी तो धर्मसंसद, राममंदिर, विश्व हिन्दु परिषद, बजरंग दल के नाम पर हिन्दू वोट बैंक को ही तो भरने में जुटे हैं। बाॅल तो आप भी वही खेल रहे हैं फर्क इतना है कि आप दूसरे सिरे एन्ड पर खड़े हैं।
कांग्रेस और भाजपा दोनों का एकदूसरे पर आरोप है कि वे सत्ता के भूखे हैं। वे स्वयं संत और निर्मोही हैं और दूसरा सत्ता की राजनीति कर रहा है। चुनाव जीतने पर क्या होगा ? क्या आप सत्ता स्वीकार नहीं करेंगे। क्या आप कहेंगे कि हम चुनाव जीत गये तो क्या हुआ पर हम सत्ता के भूखे नहीं हैं। हम सत्ता हारे हुओं को सौंपते हैं।
कांग्रेस सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढा दिये। आप जब सत्ता में आएंगे तो क्या करेंगे ? क्या दाम घटाएंगे ? कितने घटाएंगे ? क्या आपकी सरकार पेट्रोल के दाम 10 या 20 रूपये लीटर कर देगी। आखिर क्या भाव होगा ? क्या दामों का संबंध अंतर्राट्रीय बाजार से नहीं होगा ?
खाद के दाम क्या होंगे? कितने घटाएंगे ? कितने रूपये बोरी खाद मिलेगी।
अनाज के दाम बहुत ज्यादा हैं। आप क्या कर देंगे ? आपकी सरकार गेहूं चावल दाल तेल नमक किस दाम पर उपलब्ध करायेगी ? क्या ये दाम आपकी सरकार रहने तक 5 साल तक स्थिर रहेंगे ? किसानों को क्या मूल्य मिलेगा ? किसानों को ज्यादा मूल्य देंगे तो जनता को वही अनाज कम पैसे में कैसे देंगे जरा समझाएं। कांग्रेस की सरकार तो बहुत खराब रही आपकी अच्छी सरकार क्या करने वाली है स्पष्ट बताएं ?
  राट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कहा है कि हर हिन्दू को पांच बच्चे पैदा करना चाहिए। बिलकुल सही है। क्या संघ अपने हर कार्यकर्ता से इसके लिए शपथ पत्र भरवा रहा है ? उन हिन्दुओं को क्या सजा मिलेगी जिनने अपनी पत्नियों को छोड़ दिया है या शादी ही नहीं की। संध की जनसंख्या नीति क्या है ? भारत की जनसंख्या जरूरत से ज्यादा है, कम है या ठीक है।
कांग्रेस की सरकार आतंकवादियों से डरती है। आपकी नहीं डरेगी। आप सत्ता पर आते ही क्या करेंगे ? पाकिस्तान पर हमला कर देंगे? बंगला देश को मिटा देंगे ? कश्मीरी पंडित पहले भी कश्मीर से बाहर थे, 2004 तक आपकी सरकार थी तब भी कश्मीर से बाहर थे आज भी बाहर हैं। आप उनके लिए क्या करेंगे ? क्या आपके नेतृत्व में सभी कश्मीरी पंडित कश्मीर में जाकर बस जाएंगे। साफ साफ बताएं धारा 370 का आप क्या करेंगे ? क्या उसे मिटा देंगे ? सत्ता में आने के कितने दिन के अंदर ?
क्या आपको याद है कि आपके रक्षा मंत्री कश्मीर में आपकी जेलों में बंद आतंकवादियों को कंधार सुरक्षित पंहुचा कर आए थे ? क्या कहना है हिन्दू वीर ? उन्हें खत्म क्यों नहीं कर दिया ? उनको बिरयानी तो आप भी खिलाते रहे।
कारगिल की लड़ाई के बाद लाहौर बस लेकर कौन शांति वार्ता करने गया था। मुशर्रफ को आगरा बुलाकर बिरयानी कौन खिला रहा था। चीन से संबंध सुधारने की पहल किसने की थी ? पाकिस्तान, बंगला देश और चीन से दुश्मनी की बातें करना और दोस्ती का हाथ बढ़ाना इनमें से कौन सी चाल आप आगे चलेंगे ? आपकी विदेश नीति क्या है ?
अमेरिका को आप क्या मानते हैं ? दुश्मन या दोस्त ? अमेरिकी सरकार से आप कैसे संबंध रखेंगे ?
भारत में दवाइयां हजारों प्रतिशत मुनाफे में बेची जा रही हैं। आप क्या करेंगे ? क्या दवाओं की प्यारी प्यारी देशी विदेशी कंपनियांे  के अंधाधुध दामों पर प्रतिबंध लगाएंगे ? कितने दिनों में ?
साठ सालों में देश बरबाद हो गया पर सन् 1947 में देश में कितने स्कूटर, कितनी मोटर साइकिलें और कितनी कारें थीं ? अब कितनी हैं ? करोड़ों में। कितने कम्प्यूटर थे ? कितने लड़के लड़कियां विदेशों में नौकरी करते थे ? कितने विदेशों में पढ़ते थे ? कितने मोबाइल और कितने टी वी थे। कितने न्यूज चैनल थे।
मेरा कहना है कि झूठ बोलो। जम कर बोलो। राजनीतिज्ञ हो। मगर किसके सामने बोल रहे हो। अभी तो तुमने केवल विरोधी की निंदा की है। विकास के नाम पर क्या करोगे ये भी तो बताओ। अभी तो तुम घोषणापत्र ही नहीं बना पाये।  02 04 2014