Wednesday, July 29, 2020

ईश्वर की करूण पुकार - मैं मंदिर में नहीं रहता मुझे पूजने वहां मत जाना

मेरे लिए भव्य मंदिर बनने वाला है। उसके शिलान्यास के लिए कोई को आमंत्रित किया गया है। वो मेरे लिए अपने व्यस्त समय में से समय देंगे। धर्म के बहुत बड़े अध्येता और धर्मात्मा होंगे। वेद शास्त्रों के ज्ञाता। वो समय देने वाले हैं। वो जब समय दे देंगे तो शिलान्यास हो जाएगा। जिन लोगों ने मंदिर बनाने की जिम्मेदारी झपट ली है वो कह रहे हैं कि इस धरा पर केवल वही मंदिर के शिलान्यास के योग्य हैं। विडंबना ये है कि ये सब मेरे स्वघोषित भक्त हैं। इनके बिना मैं बहुत खतरे में था। ये मेरे ऐसे रक्षक हैं। इनके कारण मेरी इतनी बदनामी हो रही है। दूसरे देवता लोग मुझ पर हंसते हैं। कहते हैं कि ऐसे तुम्हारे भक्त हैं तो हम लोग बिना भक्तों के ही भले। मुझे मंदिर बनाने वालों और मंदिर के पुजारियों योगियों से बहुत डर लगता है। मुझे डर इसलिए लगता है कि मैं इन सबकी नस नस जानता हूं। इनके करतूतें और कारनामे याद कर मैं नींद से उठ जाता हूं। सिहर उठता हूं। ठीक से सो नहीं पाता। ये रहे तो मनुष्य जाति खत्म हो जाएगी। भक्तों मैं मंदिर में नहीं रहता। इनके बनाये मंदिर में तो एक रात भी नहीं। मुझे पूजने वहां मत जाना। मैंने धरती पर केवल एक जीव ऐसा बनाया जो सोच सकता है, बोल सकता है और अन्याय का विरोध कर सकता है। मगर इस जीव ने मुझे बहुत निराश किया है। इसने अपनी बोलने सोचने और विरोध करने की शक्ति कुटिलों के आगे समर्पित कर दी। अब ये जीव ऐसा हो गया है कि इसे जितना मारो, जितना अत्याचार करो, ये केवल जयजयकार ही करेगा। इसने मनुष्य जाति के गुणों का त्याग कर दिया है। कुत्ते का स्वामी भले ही चोर हो या साहूकार, कुत्ता हमेशा स्वामीभक्त बनाता रहता है। सदियों से इन लोगों ने मेरे भक्तों को बहका कर समझा दिया है कि मैं मंदिर में रहता हूं। मुझे तो कहीं रहने की जरूरत ही नहीं पड़ती। घर मकान महल मंदिर कुछ भी नहीं चाहिए। मैं तो निराकार हूं। मैं तो परम ब्रह्म हूं। मैं तो कण कण में हूं। मैं तो हवा में भी हूं और पत्थर में भी हूं। मैं तो घर में भी हूं और बाहर भी। मैं तो खेतों में भी हूं। खलिहानों में भी हूं। झोपड़ी में भी हूं और महलों में भी हूं। और यह सृष्टि तो मेरी ही रचना है। (ये भी ये ही लोग बोलते हैं ) अच्छा प्रपंच फैलाया है। मेरा मंदिर बनाते हैं और मुझसे पूछते भी नहीं कि आप इसमें रहने के लिए तैयार हैं या नहीं। इसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है। मालूम नहीं किसके प्राणों की प्रतिष्ठा कर लेते हैं। न जाने किसके प्राण ले लेते हैं। मैं तो किसी भी मंदिर में नहीं रहता। मै तो वैसे भी बहुत कठोर हूं। यदि मैं पूजा करवाऊंगा तो हरेक से पूछूंगा कि अपने जीवन में कैसा व्यवहार करते हो। मेरे भक्त बनने की औकात है तुम्हारी। मंदिर में तो हत्यारा भी मेरी पूजा करके चला जाता है। हत्यारा भी आता है और मरने वाले के घर वाले भी। मैं दोनों का साथ कैसे दे सकता हूं। उस पर ये बदमाश कहते हैं कि सब भगवान की लीला है। अरे मेरी लीला काहे को है। हत्या तुम करो और लीला मेरी कहलाए। अदालत में प्रपंच करके तुम छूट जाओ और कहो भगवान सब देखता है। एक तो शक्तिमान और सर्वशक्तिमान का प्रपंच अलग फैला रखा है। जो कुछ हो रहा है सब ईश्वर की इच्छा से हो रहा है। भगवान सर्वशक्तिमान है। अरे क्या खाक सर्वशक्तिमान है। भगवान सर्वशक्तिमान होता तो सारे नीचों का अब तक नाश हो चुका होता और भले लोग सुखी जीवन व्यतीत कर रहे होते। मगर भारतवर्ष में एक सर्वशक्तिमान का प्रादुर्भाव हो चुका है। एक सहायक सर्वशक्तिमान भी है। ये दोनों मिलकर इस भारत वर्ष में नियति नटी के कार्यकलाप चला रहे हैं। इनके कारण इस धरा में मेरा तो कोई काम ही नहीं बचा है। इसीलिए मैं धरा को त्याग कर अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहा हूं। किसी ऐसे ग्रह की खोज में हूं जहां किसी को पता न चले कि मैं सर्वशक्तिमान हूं। सोचा मंगल में जाकर बस जाऊं मगर पता चला है मनुष्य वहां पंहुचकर थाने और अदालतें खोलने की तैयारी कर रहा है। इसलिए मैंनेे इरादा बदल दिया है। ऐसा भी हो सकता हैं कि मैं किसी ग्रह में डेरा जमाऊं तब तक पता चले कि वहां तो पहले ही से सजे धजे सर्वशक्तिमान कैमरामैन के साथ बैठे हैं। मुझे पता चला है कि आजकल पृथ्वी के विभिन्न भू भागों में ऐसे ही सर्वशक्तिमानों का ही राज है। मुझसे तो ये भारत का सर्वशक्तिमान ही नहीं सम्हल रहा। बाकियों को क्या सम्हालूंगा। अब इस पृत्थी का भला मेरी ताकत से बाहर है। अब आप ही लोग सम्हालो। मैं तो किसी दूसरे ग्रह में जीवन ढूंढता हूं। सुखनवर 28 07 2020

Saturday, July 11, 2020

राजनीति में प्रवेश



युवक : दादा, देश की सेवा करना है। उसके लिए दादा राजनीति में प्रवेश करना चाहता हूं।
दादा : तेरा बाप क्या करता है
युवक : भड़भूंजा है। चना मूंगफली बेचता है।
दादा : तो तू राजनीति में प्रवेश नहीं कर सकता। तुझ जैसे भड़भूंजों, बाबू किरानियों की क्या औकात की राजनीति में प्रवेश              करें। ये राजघरानोें के बच्चों का काम है। उनका जंन्म धर्म संस्थापनाय होता है। तुम जैसे लोग क्या खा के राजनीति            में प्रवेश करेंगे। अबे राजनीति आलरेडी तुम्हारे अंदर प्रवेश कर चुकी है।
युवक : दादा आप भी तो राजनीति के घराने से नहीं हो। आपका बाप भी तो गेहूं चावल की दलाली करता था। फिर आप कैसे            राजनीति में कैसे आ गये।
दादा : देखो बेटा राजनीति और पत्रकारिता में कोई आदमी अपनी इच्छा से नहीं आता। बेरोजगारी से आता है। अपन ने पढ़ाई          लिखाई की नहीं। किसी काम के थे नहीं। बाप की कमाई से पेट भर जाता था। दिनभर टिल्लेनवीसी करता था। तो एक          दिन मोहल्ले के एम एल ए ने अपने साथ लटका लिया। उसे एक निठल्ले चेले की जरूरत थी और अपने को कोई काम            नहीं था। वो दो चार दिन में हमें दो चार सौ रूपैया दे देता था। कपड़े सिलवा देता था। खाना खिला देता था। फिर उसने          मेरे नाम पर ठेके लेना शुरू कर दिया। पैसा मिलने लगा। फिर हमने अपने नाम से ठेका लेना शुरू कर दिया। फिर हम           ठेकेदार हो गये। पैसा हो गया। विधायक चुनाव हार गया तो हमने पार्टी बदली और जीते हुए विधायक के घर बैठने               लगे। उसके चमचे हो गये।
युवक : ये तो हुई ठेकेदारी की बात। मगर आप तो पंहुचे हुए राजनीतिज्ञ हो। वो कैसे बन गए।
दादा : ये सब कुछ एक दो दिन में नहीं हो जाता। कठिन तपस्या करना होती है। ठेकेदारी हमारे देश में राजनीति की पाठशाला          है। जो ठेकेदार बना वो दूसरे दिन राजनीति के गलियारों में घूमने लगता है। उसे बिल देना है। पेमेन्ट लेना है। अगला             ठेका लेना है। दूसरों को ठेका नहीं लेने देना है। दूसरे ठेकेदार को पटकनी देना है। इसके लिए हमें कोई न कोई पार्टी में          रहना पड़ता है। जो पार्टियां चुनाव लड़ती हैं उन पार्टियों को पैसा देना पड़ता है। हार जीत तो जनता के हाथ में है। उसके          बाद तो एम एल ए हमारे हाथ में है। हमने चंदा दिया है। हमने उसका काम किया वो हमारा काम करता है।
युवक : मगर आप तो लगातार लोगों के लिए काम करते रहते हो ये तो जनसेवा ही है।
दादा : अरे सुनो यार ये कोई जनसेवा नहीं है। हमारे देश में कहीं कोई काम होता नहीं। आप टैक्स जमा करने जाओगे तो                अगला टैक्स नहीं लेगा। आप इलाज कराने जाओगे तो डाक्टर इलाज नहीं करेगा। आप रिपोर्ट करने जाओगे तो थाने          में रिपोर्ट नहीं लिखी जाएगी बल्कि आप साबुत थाने से बाहर निकल आओ तो बहुत बड़ी बात है। आप घूस देने जाओगे          तो कोई लेगा नहीं। इसीलिए कोई आदमी कहीं जाता है तो पहले एक नेता को साथ लेकर जाता है। नेता काम करवा              देता है। अपनी फीस ले लेता है। दूसरों की फीस दे देता है। हम भी यही करते हैं। हम काम करने वाले और करवाने वाले          के बीच की कड़ी हैं।
युवक : मगर आपके पास केस आते कहां से हैं।
दादा : सकल पदारथ हैं जग माही। करमहीन नर पावत नाहीं। कुछ नहीं करना पड़ता है। बस दुकान खोलना पड़ती है। दुकान          खोलेगे तो ग्राहक आयेंगे। ग्राहक आयेंगे तो दुकान चलेगी। अपन ने तो अब ये कर लिया है कि अपनी दुकान काफी              फैला ली है। काफी पार्टनर रख लिये हैं। इस काम में अब काफी विस्तार हो गया है। राजनीति अब उतनी सीधी सादी              रही नहीं जितनी गाँ धी जी के जमाने में थी। अब हम पंडे पुजारी गुंडे लठैत पुलिस सरकारी बाबू अफसर हर जात और          हर पार्टी के नेता को साधे रखते हैं। इससे बड़े बड़े काम हो जाते हैं। तुम्हें एक राज की बात बताता हूं। यदि तुम जिंदगी          भर अच्छे काम करोगे तो कोई तुम्हें दो कौड़ी में नहीं पूछेगा। मगर तुम अड़ी देते रहोगे तो तुम्हारी न्यूसेंस वेल्यू                   रहेगी। हर कोई सबसे पहले तुम्हें पूछेगा।
                    इसलिए बेटा राजनीति में प्रवेश की प्रतीक्षा मत करो। तुम जैसे अनपढों निठल्लों और मूर्खों के लिए ही                    राजनीति का मैदान बना है। खूब खेलो और लगातार बोलते रहो कि राजनीति बहुत गंदी जगह है। इसमें किसी भले               आदमी की कोई जगह नहीं है। इससे हम लोग इस देश के पैसे के हरे भरे मैदान को अनंतकाल तक चरते रहेंगे। लोग          हमें चोर बोलते रहेंगे। हमसे अपने काम कराते रहेंगे। और राजनीति से दूर रहेंगे। इसी में हमारी जीत है।
सुखनवर
11 07 2020

Thursday, July 2, 2020

टाइगर जिन्दा है और चूहे खा रहा है।



ये उदारीकरण हमने शुरू नहीं किया। ये मनमोहन सिंह ने शुरू किया। ये उनका विचार था कि देश में व्यापार बढ़ना चाहिए। तो बढ़ गया। खूब आयात निर्यात हो रहा है। देखिये व्यापार में  उन्नति के लिए क्या नहीं करना पड़ता। बकरीद के लिए बकरा कैसे तैयार किया जाता है ? बढिया खिलाते पिलाते हैं। वजन बढाते हैं। फिर कुर्बानी देते हैं। हमारा अपना मालिक है। लेन देन वो करता है। डील वो करता है। उसने बताया कि सौदा हो गया है। तुम लोगों को बेच दिया है। तो साहब हमारा निर्यात हो गया। ऐसा नहीं है। इस बार पूरा बाड़ा ही बेच दिया गया। बकरों का सरदार खुद भी हम लोगों के साथ आगे आगे चल रहा है। हमारी चमड़ी गोश्त हड्डी सब बिकी है। मंहगे दाम पर बिकी है। व्यापार का तो नियम है। खरीददार की कितनी गरज है इससे बकरे का दाम तय होता है। जब एक बार दिल्ली के खरीददार ने तय कर लिया कि ये बकरे और बकरे वाला हम हर कीमत पर खरीदेंगे तो फिर अच्छा दाम तो मिलना ही था।
देखिये ये जमीर वगैरह की बात न कीजै। काहे का जमीर। मालिक चुनाव लड़ाता है। तो हम लड़ते हैं। वो जिताता है तो जीतते हैं। वो पैसा लगाता है। हम तो बंधुआ मजदूर हैं। इसीलिए जो मालिक कहता है कि वो हम करते हैं। उसने बताया अच्छा दाम मिल रहा है। ऐसा मौका कम मिलता है। डील साॅलिड है। अजी नहीं हमें थोड़ी मालूम था कि क्या डील है। डील तो वही करते हैं। जब तिरंगे में थे तो भी उन्होंने ही डील की थी। हमें पता चला कि हम मिनिस्टर बन गये हैं। अरे हमारे महाराजा बहुत जोरदार आदमी हैं। नौजवान हैं। उन्हें अंग्रेजी आती है। बड़े घर के आदमी हैं। हवाई जहाज से चलते हैं। बड़े बड़े धंधे हैं। कितनी बातें तो हमें मालूम नहीं हैं। और साब हमें पता भी नहीं करना है। नौकर आदमी को मालिक के बारे में ज्यादा पता नहीं करना चाहिए। अरे उनने हमें बेचा है तो अपना नफा नुकसान देखकर ही बेचा होगा। इतने सालों से ये सुअरबाड़ा चला रहे हैं। उनके पहले उनके पिता जी चलाते थे। उसके पहले उनके। लंबा सिलसिला है। राजा महाराजाओं की बात हम आप क्या समझेंगे। वो कब किसके साथ हो जाएं कोई भरोसा नहीं। जब अंग्रेज थे तो उनके साथ थे। अब उनको लगा कि ज्यादा दिन सत्ता से अलग रहे तो धंधे पर खतरा है। कब कौन सा केस चल जाए। कब कौन सा छापा पड़ जाए। राजा लोगों की इज्जत अलग चीज होती है। सीधे दिल्ली में जाकर काली कार निकाली। नए मालिक के साथ समझौते पर दस्तखत किए। बिक गये। वो बिके तो हम बिक गये।
पैसा ? अरे सबकुछ पैसे के लिए ही हो रहा है भाई साब। पैसा नहीं लेंगे तो क्या मुफत में बिक जाएंगे। आपने आज तक सुना है कि बिना पैसे के किसी ने अपने आपको बेचा है ?
              मगर एक बात कहें साहब इस मंहगाई के जमाने में दाम बढि़या मिले। वो तो और भी देने को तैयार थे। मगर हमारी भी नैतिकता है। वाजिब दाम से एक पैसा ज्यादा लेना हमें भी मंजूर नहीं है। अब हिसाब लगाइये। पिछले विधान सभा चुनाव का खर्चा। फिर बिकने का मेहनताना ( मानदेय )। फिर आगे चार साल की तनखाह भत्ते वगैरह का नुकसान। फिर अगला चुनाव लड़ने का खर्चा। वैसे इस पार्टी के पास पैसा बहुत है और कार्यकर्ता बहुत मूर्ख और समर्पित। तो चुनाव का पैसा उपर से आ जाता है और खर्चा कम होता है। फिर हम लोगों को तो मालिक ही देते हैं। आखिर हमें बेचकर ही तो वो अपना व्यापार कर पाते हैं। अब अगला चुनाव नई पार्टी से क्या पता जीते कि न जीते तो उसका मुआवजा।
अब इसमें चरित्र की बात कहां से आ गई। यानी हमारा निर्यात हो गया तो हम चरित्रहीन हो गये। और जिनने हमारा आयात किया वो ? वो चरित्रहीन नहीं हैं। हम न बिकते तो वो खरीद पाते ? चरित्र की बात तो आप करो नहीं। काहे का चरित्र। भेड़ बकरियों का कौन सा चरित्र होता है। भेड़ बकरियां और तमाम जानवर गले में रस्सी बांध का खिरका बनाकर लाए ले जाए जाते हैं। जो खाने को दिया जाता है वो खाते हैं। जो खिलाता है उसके लिए में में में में करते हैं। अच्छा आप शेर की बात सोच रहे हैं। वो तो कबके खत्म हो गये। अब तो कुछ नमूने के लिये चिडि़या घर और राष्ट्रीय उद्यानों में रखे गए हैं। वो भी शाकाहारी टाइप के। भोपाल दिल्ली में जो घूम रहे हैं वो तो हम ही लोग हैं। शेर की खाल ओढ़े हुए। हमारे महाराज भी तो अपने को शेर कहते हैं। कैसे शेर हैं ये तो आपने देख लिया। गोश्त के नाम पर चूहा बिल्ली खा रहे हैं।
अब दो तीन महीनों बाद चुनाव होंगे। उससे निपटना होगा। टिकट तो मिल जाना चाहिए। मालिक ने बात कर ली होगी। हम न जीतेंगे तो मालिक काहे के मालिक रह जाएंगे। एक बात है कि हमारे इस पार्टी में आ जाने से इस पार्टी के पुराने लोग तो हमें निपटाएंगे। उनसे कैसे निपटा जाएगा ये देखना पड़ेगा। वैसे हमें हमारी जनता पर पूरा भरोसा है। वो कहावत है न कि जनता को वही मिलता है जिसके वो लायक होती है। यदि वो इसी लायक है कि हम जैसे नालायकों को अपना नेता बनाये तो हम क्या करें। अपने इलाके में जब हम जाएंगे तो जो हमें गाली देते थे वो हमारा जयकारा लगायेंगे। जो हमारा जयकारा लगाते थे वो अब भी हमारा जयकारा लगायेंगे। अंग्रेजों ने यूं ही थोड़ी इतने सालों तक भारत में राज किया है। वो लातें मारते थे और हम जयकारा लगाते थे और गांधी को गोली मारते थे।
सुखनवर

02 07 2020

Thursday, June 18, 2020

चक्रवर्ती सम्राट के मन की बाते


पिछले कई सालों से मैं ये पता लगा रहा हूं कि इतिहास कहां लिखा जा रहा है। कहीं न कहीं तो लिखा ही जा रहा होगा। जो भी लिख रहा हो उसी से सैटिंग करना है। मामला ये है कि मैं इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में लिखवाना चाहता हूं।  बचपन से यह पढ़ाया जाता है कि फलां ढिकां का नाम इतिहास मेंं स्वर्णक्षरों में लिखा गया है। मेरा नाम भी इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना है। मैं नगद भी दे सकता हूं और स्वर्ण भी दे सकता हूं। लिखने वाला कारीगर भी मैं दे सकता हूं। हजारों पड़े हैं।
भारत वर्ष के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी राजपुरूष को ये सूझा है। अब जब से मैंने राजपाट सम्हाला है मैं चाहता हूं कि इतिहास मुझसे ही शुरू हो और मुझ पर ही खत्म हो। इतिहास के पुनर्लेखन के लिए भी आदेश दे चुका हूं। मैं चाहता हूं कि मेरे सामने ही मेरा मूल्यांकन हो जाए। अपना मूल्यांकन मैं खुद कर लूंगा। मेरे पास लेखक हैं कारिंदे हैं। मेरा युग भारत का स्वर्ण युग कहलाए।
मैं जम्बू द्वीप - आर्यावर्त का राजा हूं। एक विराट आयोजन करके चक्रवर्ती विक्र्रमादित्य की उपाधि लूंगा। प्राचीनकाल से राजा लोग विक्र्रमादित्य की पदवी धारण करते थे और चक्रवर्ती कहलाते थे। मैंने महाभारत रामायण सीरियल के कास्ट्यूम डिजायनरों से अवसर अनूकूल मणि माणिक युक्त भव्य कास्ट्यूम तैयार करने के लिए कह दिया है। अभी ये सोच रहा हूं कि इस भव्य समारोह को कहां आयोजित किया जाए। अयोध्या, बनारस, हल्दीघाटी, पानीपत, प्लासी, कुरूक्षेत्र हस्तिनापुर एवरेस्ट आदि के बारे में सोच रहा हूं। इसमें सभी देशों के राजाओं को बुलाउंगा। मैंने तो अश्वमेध यज्ञ की योजना बना ली थी मगर चीन पाकिस्तान मेें मेरा अश्व जा नहीं पाएगा तो रद्द कर दी।
इसी सिलसिले में मैं ये पता करवा रहा हूं कि ये राजा अकबर वगैरह को जो जिल्ले इलाही वगैरह कहा जाता था वो मुझे क्यों नहीं कहा जा सकता है। यदि ये सब किसी समारोह में होता हो तो वह मैं करवा दूंगा। वैसे मैंने गुजरात में खबर भेज दी है। वहां इस तरह के चाहने वाले बहुत हैं। कुछ नई उपाधियां जैसे तकदीरे हिन्दुस्तान, शहंशाह ए हिन्दुस्तान, वगैरह भी हो सकती हैं।
भारत वर्ष के इतिहास में किसी राजपुरूष ने पहली बार इतने देशों की यात्राएं की हैं। मैंने तो ऐसे ऐसे देशों की यात्राएं की हैं जहां हमारे देश का राजदूतावास नहीं था। कई देश के लोग तो घबरा गये। बोले आप क्यों आ रहे हैं। मैंने कहा भई मैं अपने जहाज से अपने खर्चे से आ रहा हूं। आप लोगों को केवल स्थानीय व्यवस्था करना है। उसका भी खर्च मैं दिलवा दूंगा। यदि जनता कम पड़े तो मैं उसकी भी व्यवस्था कर सकता हूं। तो इन यात्राओं की भी एक किताब बनती है। प्रकाशन विभाग को अभी तक ये काम कर चुके होना चाहिए था। अभी इनकी खबर लेता हूं।
2014 में मैं चाय वाला बना। देस के चाय वालों ने उसे गंभीरता से ले लिया। मेरे पास आए और बोले स्टेशन पर बेचे जाने वाली चाय सदियों से घटिया ही रही है। हमें आपका मार्गदर्शन चाहिए। उसका स्तर कैसे सुधारा जाए। मैंने कहा कि भाई जो चाय मैंने पूरे देस को बेच दी और लोगों ने पी ली और कह रहे हैं कि साठ सत्तर सालों में ऐसी चाय नहीं पी उसको तुम लोग घटिया कह रहे हो। शर्म आनी चाहिए। चाय ऐसे ही बिकेगी और सबको पीना पड़ेगी।
दुनिया में जो भी महान हुआ है उसने किताब लिखी है। हिटलर ने भी आत्मकथा लिखी थी। मेरे सलाहकारों का कहना है कि आत्मकथा तब लिखी जाती है जब अपनी कथा खत्म होने लगती है। इसीलिए मुझे लेख निबन्ध प्रवचन और विचार आदि लिखना थे। वो काम हो गया। तीसेक किताबें छप चुकी हैं। कुछ और भी छप रही हैं। लोग काम पर लगे हुए हैं। मुझे पता चला है कि महान और अमर होने के लिए कवि होना जरूरी है। एक को कहा है कि कविता की किताब छपा दो। किताब अंग्रेजी में है। मूल किताब गुजराती में है। पहले ही छप चुकी है। एक महिला को अभी अभी पद्मश्री दिया है। वो अनुवाद कर रही है। सहायकों ने कहा कि साहब लोग बोलेंगे असली हस्तलिपी वाली कापी दिखाओ। मैंने कहा बोल देा मैं लिख के फाड़ देता था।
मेरी बायोपिक बन चुकी है। सवा सौ करोड़ देसवासियों को बहुत पसंद आई। विस्व इतिहास में आज तक किसी फिल्म को इतने लोगों ने नहीं देखा। पर बहुत सारे क्षेत्र बाकी है। पेंटिंग है। यह क्षेत्र बिल्कुल खाली है। वैसे कई प्रस्ताव आए हैं। कलाकार हैं। वो कहते हैं कि हम जानते हैं आप पेंटर हैं। अब बताइये कैसे मना करूं। गायन वादन है। ड्रम तो मैं बजाता ही था। संगीत में हाथ आजमाना है। कई नृत्यांगनाओं ने तैयारी शुरू कर दी है मेरी कविताओं पर नृत्य प्रस्तुतियांे की। कई संगीतकार और गायक भी कविताओं की सुरसाधना में लग गए हैं। कविताओं पर पेंटिंग प्रदर्शनी तो शायद तैयार हो चुकी होगी। यह देस तो प्रतिभाओं की खान है। ज्योंहि मैं गद्दीनशीन हुआ, कुछ कलाकार और लेखक जुट गये और उन्होंने मेरी बाल लीलाओं पर एक कार्टून किताब बना डाली। कल्पना की हद है। पहले तो मुझे लगा कि ये मेरी खुशामद के लिए लिखी गई है। फिर मैं समझ गया कि ये कलाकार लोग तो कल्पना कर ही सकते हैं।
मैं सोच रहा था कि कि मेरा राज कितने साल चलेगा तो देखिये रूस में जार ने 63 साल राज किया। पुर्तगाल में सालाजार कितने साल रहा। 36 साल। स्पेन में फ्रेंको 35 साल रहा। मुसोलिनी और हिटलर हालांकि कम साल रहे यही करीब 15 -15 साल पर उन्होंने विश्व इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में तो लिखाया। मेरे साथी ने कहा है कि हम पचास साल राज करंेगे। मतलब अभी 43-44 साल और बचे हैं। हे भगवान कैसे गुजरेंगे भारत की जनता के ये साल। मगर भारत की सवा सौ करोड़ जनता की सेवा करने का सवाल है। करके ही रहूंगा।
सुखनवर
14 06 2020

Saturday, May 30, 2020

अंधा, लंगड़ा और बहरा कानून



आखिरकार वकील साहब जनता से मुखातिब हुए। वो हमेशा की तरह गुस्से में थे। वो कानून के जानकार हैं। मगर चुप रहते हैं। दरअसल पूरा मंत्रीमंडल ही चुप रहता है। उसे पी एम ओ से इशु अलाट किए जाते हैं। आप आज जाकर इस विषय पर बोलें। फार्मेट सबको मालूम है। रेल मंत्री पीयूष गोयल, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर फील्डिंग के लिए उतारे जाते हैं। इन मंत्रियों की खासियत ये है कि ये अपने मंत्रालय के अलावा सभी विषयों पर बात कर सकते हैं। ये सभी राहुल गांधी के विशेषज्ञ हैं। इनका फार्मेट तय है। सबसे पहले मोदी स्तुति करना है। इसके बाद राहुल गांधी के ट्वीट पर बीट करना है। देश में इतना अच्छा वातावरण है कि पत्रकार वार्ता में स्तुति और आरती होती है। फिर कुछ भजन इत्यादि। अंत में दुष्टों का नाश हो। गोमाता की जय। सनातन धर्म की जय। कांग्रेस का नाश हो। वगैरह बोलकर इति वार्ताः श्रोयन्ताम हो जाता है।
तो वकील साहब आए। बैठे। नथुने फुलाए। सांस छोड़ी, फिर ली फिर छोड़ी फिर दीर्घ श्वसन। अच्छा हुआ सूर्य नमस्कार नहीं किया। वैसे भी उसका एक दिन मुअइययन है। उसी दिन करना है और विश्व कीर्तिमान बनाना है। विश्व के इतिहास में पहली बार, भारत के इतिहास में पहली बार इत्यादि विशेषणों के बिना तो खबर ही नहीं बनती। तो वकील साहब ने कहा कि ’’राहुल ने पांच तरीकों से कोरोना की जंग कमजोर करने की कोशिश की। पहली बात - निगेटिविटी फैलाई, दूसरा - संकट के समय देश के खिलाफ काम किया। तीसरा- झूठी वाहवाही लूटने की कोशिश की। चैथा - उनकी कथनी और करनी में फर्क है। पांचवां - उन्होंने गलत तथ्य और झूठी खबरें उड़ाईं। उनके पास प्लान हो तो हमें बताएं’’। वकील साहब ने ये भी बताया कि राहुल गांधी महाराष्ट्र की सरकार को बचाने के लिए प्रधानमंत्री से सवाल पूछ रहे हैं। ये राहुल गांधी इतने ज्यादा बड़बोले हो गये हैं कि इन्होंने हमारे प्रधानमंत्री की आलोचना की जब उन्होंने करोना की लड़ाई में भारत की जनता से तालियां और थालियां पिटवाईं, जब दिये जलवाये और दिवाली मनवाई।
तो ये वकील साहब हमारे देश के कानून मंत्री हैं। इनकी बातों में कितना ज्यादा कानून दिखाई देता है। यदि ऐसा आदमी देश का कानून मंत्री है तो आप अंदाज कर लीजिये कि देश में किस कानून का राज है। इनके आरोप तो देखिये। ये वकील साहब जिनका केस लड़ते होंगे उसका क्या होता होगा। कानून मंत्री ने देश को जागरूक किया कि कारोना की लड़ाई राहुल गांधी के कारण कमजोर हो गई। बहुत अच्छे भाई। एक बात तो मान ली कि लड़ाई कमजोर हो गई। फिर कहा कि निगेटिविटी फैलाई। सच बात है जिसकी चोरी पकड़ी जाए वो कह सकता है कि तुम निगेटिव हो। फिर बोले कि संकट के समय देश के खिलाफ काम किया। जब ये गद्दारी की जा रही थी तब आप क्या कर रहे थे कानून मंत्री जी। आज तो बिना किसी अपराध के लोग देशद्रोह में बंद किए जा रहे हैं। ’युद्ध और शांति ’ नाम की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक घर में रखने पर लोग जेल में हैं। आप के पास तो सुनहरा मौका था कानून मंत्री जी। इस अपराधी को पकड़ने का। इसके बाद उनका आरोप बहुत तीखा है। राहुल ने झूठी वाहवाही लूटने की कोशिश की। आप तो इसके विशेषज्ञ हैं झूठी वाहवाही लूटने के। आपकी बाॅल दूसरे ने खेल ली। बहुत बुरा हुआ। ये शिकायत वाजिब है। चैथी शिकायत भी ठीक नहीं है। उनकी कथनी और करनी में फर्क है। वो तो निगेटिव आदमी हैं। करना उन्हें कुछ है नहीं। करते तो सबकुछ आप हैं फिर कथनी करनी में फर्क कैैसा। अंतिम तर्क ये है उन्होंने गलत तथ्य और झूठी खबरें उड़ाईं। पर आपने बताया नहीं कि सही तथ्य और सही खबरें क्या हैं। फिर आपने पूछा कि आपके पास कोई प्लान हो तो बताएं ? बहुत अच्छे। बहुत ही अच्छे। वो अपना प्लान आपको बताएं। सरकार आप चला रहे हैं और प्लान वो बताएं। यही तो राहुल गांधी प्रधानमंत्री से पूछ रहे हैं कि लाॅक डाउन तो फेल हो गया है अब प्लान बी बताईये। तालियां बज गईं। थालियां बज गईं। दीवाली मन गई। हद है बेशर्मी की। आर्मी बैंड बज गए। बहारों फूल बरसाओ भी हो गया। सचमुच हमारा देश विश्वगुरू है। लोग बीमारों का इलाज कर रहे हैं ये बहारो फूल बरसाओ कर रहे हैं।
इन सत्ताधारी लौहपुरूषों के दिलों की जांच होना चाहिए। इतने हृदयद्रावक दृश्यों में भी फूल से खिले हुए हैं। करोड़ों आदमी भूखा प्यासा सड़कें नाप रहा है। मर रहा है। बच्चे बूढ़े महिलाएं सब तड़फ रहे हैं। कह रहे हैं कि मरना तो है घर जाकर मर जाएंगे। भूखे यहां भी मरना है वहां भी मरना है। पांच ट्रिलियन इकाॅनामी ( आखिर ये होती क्या है ?) का सपना दिखाने वाले नंगे पैर चलते मजदूरों को एक बोतल पानी नहीं दे पा रहे। खाना तो दूर। ये कह नहीं पा रहे कि तुम सवा सौ करोड़ भारतवासी लोगों को ’’ मैं ’’ खाना खिलाउंगा, पानी पिलाउंगा, तुम्हारे बच्चों को दूध दवाई दूंगा। तुम लोग अपने घर पर रहो।
मगर गुरूर आसमान पर है। शर्म नहीं आती सत्ता पर काबिज तुम हो और दोषी राहुल गांधी है। आजतक कभी सुना है कि रेल रास्ता भटक जाती है। पानी का जहाज, नाव, हवाई जहाज, बस मोटरकार तो सुना है कि रास्ता भटक गई। कहीं जाना था और कहीं चली गई। मगर रेल गाड़ी - पटरी पर चलने वाली रेलगाड़ी 600 - 700 कि मी रास्ता भटक गई। एक नहीं दो नहीं बीसों रेलगाडि़यां रास्ता भटक गईं। उनके रास्ते में कोई स्टेशन नहीं पड़ा। कोई सिग्नल नहीं दिखाया गया। 30 घंटे का सफर 90 घंटे में बिना खाना पानी के। जब रेल रूकती है तो लाशें उतारना पड़ती हैं। ये सब इसीलिए तो क्योंकि इसमें कोई रेलमंत्री कोई रेलअधिकारी, कोई मध्यवर्गीय सवार नहीं था। ये श्रमिक स्पेशल है। इसमें मजदूर सवार थे। ’ये लोग तो ऐसे ही होते हैे।’ इनका कोई नाम नहीं होता। इनकी केवल गिनती होती है। 11 मजदूर रेलपटरी पर सोते हुए मर गए। ये लोग रेल की पटरी पर सोए ही क्यों ? सोयंेगे तो कटेंगे। वाजिब बात। न्याय की कुर्सी पर ये कहा जा रहा है।
अपने होने पर शर्म आती है।
- सुखनवर
29 05 2020

Thursday, November 26, 2015

राजनीति की शिक्षा


हमारे बाप रहे चपरासी के लड़का। उस समय कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढाई नहीं होती थी। राजनीति होती थी। तो वे रहे छात्र नेता। इसलिए पढ लिख गये। उसके बाद से वे आगे बढ़ते गए। हम लोग भी पैदा हुए और मां बाप को देख देख कर आगे बढते गए। उसी समय हमें समझ आ गया कि पढना लिखना इस दुनिया में बिलकुल जरूरी नहीं है। आप दुनिया में क्या करंेगे ये भगवान तै कर देता है। वो आपके मां बाप तय कर देता है। आप दुनिया में आ जाते हैं। उसके बाद आपको कुछ करना नहीं है। बस बडे होते जाना है। उसमें आपको कुछ करना नहीं है। रोज सोना और जागना है। खाना पीना करना है। बस आप बड़े हो जाएंगे। आपके मां बाप आपके लिए करते जाएंगे।
राजनीति में घर का आदमी बहुत जरूरी होता है। वैसे तो घर का आदमी हर जगह जरूरी होता है। धंधे में नहीं होता है ? कभी देखें हैं कि कोई व्यापारी,  कोई कारखाने वाले ने अपने लड़के की जगह किसी और के लडके को धंधे का मालिक बना दिया ? नालायक से नालायक लडका हो तो भी मालिक वहीं बनेगा। हमारे बाप को जेल भेज दिए थे। तो क्या हुआ ? हमारी माताजी खाना बनाते बनाते घर से निकलीं और बिहार की मुख्यमंत्री बन गईं। क्या पार्टी में लोगों की कमी थी क्या ? मगर घर का आदमी जरूरी होता है। आज किसी दूसरे को मुख्यमंत्री बनाए होते तो हम पटना की सडकों पर भीख मांग रहे होते।
राजनीति में जब हम किसी के सगे नहीं हैं तो कोई हमारा सगा क्यों होगा भाई। वैसे राजनीति में सगा होना भी नहीं चाहिए। राजनीति में यदि आप योग्य न हुए और अचानक किसी जुगाड़ से या किस्मत से कुछ बन भी गए न तो दो चार साल में सड़क पर आ जाओगे। इसलिए लोग अपनी औकात देख लेते हैं और पार्टी में अपनी जगह स्वीकार कर लेते हैं। जिन्दाबाद जिन्दाबाद करते रहते हैं और कहते रहते हैं कि हम पार्टी के वफादार सिपाही हैं। न तो वे वफादार होते हैं और न सिपाही होते हैं। बस वो समझदार होते हैं। अपनी औकात समझ लेते हैं। और चुप रहते हैं। अपने हिस्से का खाते हैं और खुश रहते हैं। राजनीति तो दरअसल ये है।
हमारे मामाजी साधू जी, उनका नाम सुना आपने ? उनको पिताजी ने घर का आदमी मानकर बढाना शुरू किया सोचा माता जी भी खुश रहेंगी कि भाई को बढ़ा रहे हैं। तो उनके पर निकलने लगे। उनको लगा कि वो सच में राजनीतिज्ञ हो गए। अरे भई केवल गुंडई राजनीति नहीं है। उनने तत्काल पिताजी पल्ला छोड़ा, दुश्मनों से मिल गए। अब कहां हैं? न दुश्मन बचे न मामाजी।
हमें पिताजी ने बता दिया है कि बस अपनी जगह बैठो। काम को समझो। ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं। हमारे यहंा बहुत से काबिल अधिकारी होते हैं। वो बड़ी बड़ी परीक्षा पास करके आते हैं। उनके पास बहुत दिमाग होता है। वो काम करते जाते हैं। हमें उनको काम करने देना है। वो अपना कमाते हैं हम अपना कमाते हैं। पैसा कमाने की चिन्ता युवावस्था में करना नहीं चाहिए। वो अपने आप आता है। बस एक बार आपकी बदनामी भर हो जाए कि आप पैसा खाते हैं। उसके बाद किसी बात की कोई सीमा नहीं।
लोग कहते हैं कि हमें शर्म नहीं आती। भला ये भी कोई बात हुई। मिनिस्टर बनने में क्या शर्म। हमारे पिताजी को नहीं आई जब उनने हमारी मां को मुख्यमंत्री बना दिया। हमें क्यों आएगी ? और एक बात तो बताइये कि हमारे पिताजी ने पूरे बिहार को रौंद डाला, बढ़िया चुनाव जिताया। अब मिनिस्टर बनाने की बारी आई तो दूसरों को बनाएंगे। और घर के लड़के घर में घुंइयां छीलेंगे। जितने लोग हमारी पार्टी के कोटे से मंत्री बनना थे सो बने। उसी में हम भी बन गए। इसमें शर्म की क्या बात। हम लोग कोई विदेशी लोकतंत्र वाले थोड़े ही हैं कि मिनिस्टर बनना जिम्मेदारी का काम होता है। हमारे यहां मिनिस्टर बनने का मतलब है एक बड़ा बंगला, कुछ लाल बत्ती वाली कारें, कुछ कारिंदे, बस। प्रजा का काम करवाना। उनसे पैसे लेना। उन्हीं पैसों को वापस उन्हीं पर खर्च करना। हां दो चार लोग रखे जाते हैं जो पढ़े लिखे होते हैं। उनसे वैसा काम लिया जाता है। आजकल इन पढे़ लिखे लोगों को पार्टी प्रवक्ता बना देते हैं। वो टी वी में बैठकर हमारी तरफ से बहस करते हैं। तो बड़ा कौन हुआ पढ़ा लिखा कि अनपढ़।
तो अब हम चुनाव जीत चुके हैं। मिनिस्टर बन चुके हैं। अब आगे का काम संतोषी माता संवारे। बाकी पिताजी और नितिश जी सम्हाल लेंगे।......................................सुखनवर


24 11 2015

Saturday, November 21, 2015

मार्गदर्शक मार्ग के दर्शक हो गए

अब आपको क्या बताएं पत्रकार जी। सुबह से तैयार होकर बैठ जाते हैं। नहा धोकर। इस बुढापे जब कल का ठिकाना नहीं है अभी दर्जी से नए कुर्ता धोती बंडी सिलवाए हैं। हम लोग समझाते हैं। भई हो गया। जितना मिलना था मिल गया। अब छोड़ो भी। नए लोग आगे आएंगे। आएंगे क्या आ चुके हैं। अब उनके दिन आएं हैं। सचाई को मान लो न दादा जी। मगर नहीं साहब सुबह से तैयार होकर बाहर कुर्सी लगाकर बैठे हैं। बार बार उठते हैं बाहर झांकते हैं। कोई आया क्या। हम पूछते हैं क्यों रास्ता देख रहे हो तो बोलते हैं हम मार्गदर्शक मंडल हैं। हमारे से मार्गदर्शन लेने नरेन्द्र आएगा, अरूण आएगा। राजनाथ आएगा। गडकरी आएगा। मगर कोई नहीं आता। अरे पत्रकार जी। ये मार्गदर्शक मंडल में हैं या मार्ग के दर्शक हैं। दिन भर रास्ता देखते रहते हैं। और तो और जोशी जी को चिढ़ाने  के लिए मैट्रिक फेल को शिक्षामंत्री बना दिया। विदेश मंत्री बिचारी आज तक विदेश जाने को तरस रही है। वकील साहब को वित्त मंत्री बना दिया।
महीनों गुजर गये हैं। कोई नहीं आया पर इनका दिल नहीं मानता। मानने कोे तैयार नहीं कि इनके दिन लद गए हैं। अरे भई आपको मौका मिला तो था। उस समय आपने अपने को भावी प्रधानमंत्री बनवा लिया था। आप समझे सब आपके कायल हो गए हैं। बाकी लोगों ने सोचा हम चुनाव तो जीतने वाले नहीं हैं काहे को बुढऊ से संबंध खराब करें। कह दिया हां आप ही हो हमारे प्रधानमंत्री। शान से चुनाव हारे। घर बैठ गए। मगर किस्मत तो देखो। पांच साल फिर निकल गए बुढऊ टंच हैं। फिर चुनाव आ गए। इस बार नरेन्द्र अड़ गए। बोले पिछले बार ये थे इस बार मैं रहूंगा। पहले घोषणा करो। नागपुर से ऑर्डर ले आए। चुनाव लड़ गए। अरे इनकी तो टिकिट के लाले पड़ गये थे। चुनाव के पहले ही मार्गदर्शक बनाए दे रहे थे। जैसे तैसे करके तो टिकटें मिलीं। हवा अच्छी बही। सब जीत गए। मगर हसरत तो दिल में ही रह गई। प्रधानमंत्री बनने की। रथ यात्रा निकाली। मस्जिद गिराई। अच्छा माहौल बना। आज भी लोग उन दिनों को याद करके सिहर उठते हैं। मगर जब चुनाव जीते अपनी सरकार बनी तो अटल जी ने एक बार न कहा कि सारी मेहनत इनकी है इन्हें बनाओ प्रधानमंत्री। बना दिया गृहमंत्री।
ले देके इस बार सरकार बनी तब तो हालात ही बेकाबू हैं। प्रधानमंत्री तो छोड़ो संसद सदस्य मान लें वोई बहुत है। ऐसी छीछालेदर इस बुढापे में किसी की न हो भाई। पेंशनर की भी ज्यादा इज्जत होती है भाई। कहते हैं, अब देखो आप लोग अपनी अपनी लठिया सम्हालो दादाजी लोग और एक कमरे में बैठो। हम लोग तुमसे सलाह लिया करेंगे। तुम लोग सोचते रहा करो कौन कौन सी सलाह देना है। अब वे तीनों चारों बिचारे सोच सोच के बैठे हैं कि येे सलाह देंगे वो सलाह देंगे मगर कोई आता ही नहीं। एक को तो देश में रहने की फुर्सत नहीं। दूसरे को चालें चलने से फुर्सत नहीं। एक दो बार सोचा कि नागपुर हेडक्वार्टर में शिकायत कर देंगे फिर देखते हैं कैसे नहीं आते ये जवान रस्ते में। मगर नागपुर से भी डाक आना बंद हो गई।
अब देखो बिहार के चुनाव थे। हम लोग से एक बार पूछ लेते तो क्या बिगड़ जाता। हम लोग की तो वोई हालत हो गई जो शाहजहां की आगरा के किले में थी। बस कमरे में बैठे रहो और ताजमहल तकते रहो। अब हम प्रधानमंत्री की कुर्सी तक रहे हैं। अरे क्या मालूम कब कौन सा चमत्कार हो जाए। कहो किसी को दया आ जाए। अरे दो चार दिनों के लिए ही बन जाएं प्रधानमंत्री। मगर चालाकी तो देखो। बिहार चुनाव में हम लोगों को दो कौड़ी को नई पूछो मगर हार गए (और भैया हार तो ऐसी बेहतरीन हुई है कि तबियत खुश हो गई ) तो कहने लगे कि हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। काए भैया हमारी काहे की जिम्मेदारी। एक सभा में तो लेके नहीं गए। हमारी तो छोड़ो जे दोनों गुजरातियों ने मिलकर बिहारियों को ही बिहार चुनाव से बाहर कर दिया। अब मान लो चुनाव जीत ही जाते तो क्या गुजरात से लाते बिहार का मुख्यमंत्री।
तो भैया ऐसा है कि सब ठीक है। सब जानते हैं। पुरानी कहावत है। गरीब की हाय नहीं लेना चाहिए। और हम तो उजागर कह रहे। हां हमारी हाय लगी और जब तक हम रहेंगे और लगेगी। अब जीत तो लो बेटा कोई चुनाव तुम। ..................सुखनवर

16 11 2015

Tuesday, April 29, 2014

सरकार नहीं बनी तो देख लेंगे

वो सवालों की तरफ से बेफिक्र थे। सवाल पहले से तय थे। जवाब भी तैयार थे। बोलना भर था। बटुक पत्रकार ने पूछ लिया। जवाब आना चालू हुआ ’ बनारस के मुसलमानों को मैं प्यार करूंगा। 16 मई के बाद मैं उन्हंंे इतना प्यार करूंगा जितना किसी नेता ने नहीं किया होगा।’ बात गौर करने लायक है। साफगोई जबरदस्त है। बंदा प्यार करने को तैयार है मगर चुनाव का परिणाम तो आ जाए। फिर कर लेंगे प्यार। प्यार करने लायक तो हो जाएं। हो सकता है प्यार करने की जरूरत ही न रहे। बिना जरूरत क्यों प्यार करें। और फिर ये भी तो देख लें कि इन लोगों ने वोट किसे दिया है। मुझे इनके वोट तो चाहिए ही नहीं। मुझे मिलेंगे भी नहीं। 2002 से लेकर अब तक जो भी किया है वो इसीलिए थोड़े किया है कि इनके वोट चाहिए। गुजरात में कुल 19 सीटें विधानसभा की ऐसी हैं जहां इनके वोट से कोई फर्क पड़ सकता है। मैं तो चाहता ही हूं कि ये 20 फीसदी लोग इकठ्ठे होकर मेरे खिलाफ हो जाएं। जब ये इकठ्ठे हो जाएंगे तभी तो इनके खिलाफ 80 फीसदी लोग इकठ्ठे होंगे। अपनी अपनी राजनीति है। यही तो धु्रवीकरण है। पोलराइजेशन। इसीलिए तो मैंने सोनिया पर अटैक किया कि तुम मुसलमानों को पोलराइज कर रही हो। अपना उद्देश्य था कि हिन्दुओं तक संदेश पंहुच जाए कि वो लोग इकठ्ठे हो रहे हैं तुम भी इकठ्ठे हो। वो कांगे्रस को दे रहे हैं तुम भाजपा को दो। हमारे संघ की राजनीति ये है कि हमें 80 प्रतिशत को धर्म के नाम पर इकठ्ठे करना है। जातिवाद के हम भी विरोधी हैं। इसलिए नहीं कि ये बुरी बात है। नहीं। बिल्कुल नहीं। हम विरोधी इसलिए है कि हम कहते हैं कि गर्व से कहो हम हिन्दू हैं, हम भाजपा के वोटर हैं मगर ये कहते हैं कि हम हिन्दू तो हैं मगर सबसे पहले हम ब्राह्मण हैं या ठाकुर हैं या बनिया हैं या फिर यादव, कुर्मी, जाटव, लोधी न जाने क्या क्या हैं ? जिस दिन ये लोग अपने को जाति से उठकर हिन्दू मानने लगेंगे हमारी बन आएगी। फिर देखते हैं हमें सत्ता में आने सेे कौन रोकता है।’
सुखनवर की चिन्ता दूसरी है। बिका हुआ मीडिया जिस ईमानदारी से अपना पैसा चुकाने में लगा है उससे देश में सचमुच एक ध्रुवीकरण हो तो रहा है। ये मोदी का अखंड पाठ मुद्दों से दूर धर्म की लड़ाई बनता जा रहा है। मीडिया की लड़ाई तो मोदी ने जीत ली है। अब तो ये माहौल हो गया है कि बिना पैसे मिले भी मीडियावाला आएं बाएं शाएं बकने में लगा है। युवा मीडियाकर्मियों  का जोश तो देखते ही बनता है। जब वे कैमरा पर्सन के साथ अपना नाम बताते हैं तो उनके चेहरे का नूर देखने लायक होता है। 16 मई को ये सब थम जाएगा। परिणाम आ जाएंगे। अभी तो मीडिया के भरोसे मोदी जी को शायद दो तिहाई या तीन चैथाई बहुमत मिल रहा है। ये बोलने के लिए भुगतान हो चुका है। कुछ सर्वे भी तैयार हैं जो आज कल में आ जाएंगे। मगर असली परिणाम के बाद क्या होगा। ये जो हिन्दू मुसलमान का उन्माद पैदा किया है चुनाव में बहुमत न मिलने पर, मोदी की सरकार न बनने पर क्या होगा ? दोष किस पर आएगा। जाहिर है ये हिन्दुओं का दोष नहीं होगा। ये दोष ’उन लोगों’ का होगा। तब क्या होगा ? जिस गैर जिम्मेदारी से ये उन्माद इस ऊंचाई पर पंहुचाया गया है वो यूं ही तो खत्म नहीं होगा। होने भी नहीं दिया जाएगा। तब के लिए देश की क्या तैयारी है। कितने गुजरात और कितने मुजफ्फरनगर हो सकते हैं इसके बारे में भी अभी से सोच लिया जाए। क्योंकि कई विद्वानों का कहना है कि संघ परिवार को 2014 का चुनाव नहीं 2019 का चुनाव जीतना है। उनका लक्ष्य ये है।
इस आपाधापी में आम जन कहीं दूर छिटका पड़ा है। उसकी बात तो हो रही है पर उसके लिए नहीं हो रही। आजादी के इतने साल बाद भारत के चुनाव के मुद्दे क्या हैं ? सोनिया गांधी विदेशी है। राहुल अनुभवहीन है। कांग्रेस भ्रष्टाचार करती है। भाजपा साम्प्रदायिक है। हम जोड़ते हैं वो तोड़ते हैं। घोटाले, राबर्ट वाड्रा ये सब तो हो गया। मगर ये तो बताओ कि तुम्हारी सरकार आ जाएगी तो तुम्हारी आर्थिक नीति क्या होगी ? औद्योगिक नीति क्या होगी ? श्रम नीति क्या होगी ? मनरेगा अच्छा है या बुरा है ? भूजल के लिए क्या करोगे ? बड़े बांध अच्छे हैं या बुरे हैं ? खेती को लाभ का काम कैसे बनाओगे ? देश में स्वास्थ्य सेवाओं का कबाड़ा हो चुका है, प्राथमिक शिक्षा का सत्यानाश हो चुका है। उसके लिए क्या योजना है ? हमारे देश की भाषाओं की मौत हो रही है उसके लिए क्या करोगे ? टैक्सों का क्या करोगे ? लगाओगे या टैक्स लेना बंद कर दोगे ? कुछ तो बताओ। कांग्रेस तो बहुत बुरी है पर अपनी योजना तो बताओ ? पेट्रोल,डीजल के दाम का क्या करोगे ? सब्जियों अनाजों के दाम कैसे घटाओगे और तुम्हारे राज में दाम कितने हो जाएंगे ?
काला धन कैसे वापस आएगा ? काला धन जिनका है उन भारत के वीर सपूतों के साथ क्या करोगे ? रामदेव ने कहा है कि केवल बैंकिग ट्रांजेक्शन टैक्स लगाने के बाद किसी टैक्स की जरूरत नहीं रहेगी। उसके बारे में भाजपा का क्या कहना है। ऐसा भी किया जा सकता है कि बाबा अपनी ही कंपनी के लेन देन पर टैक्स की गणना कर लें। बता दें कि अभी कितना टैक्स देते हैं और यदि उनके अनुसार  बैंकिग ट्रांजेक्शन टैक्स लग जाएगा तो वे कितना गुना ज्यादा टैक्स देंगे। वो चाहें तो पिछले दस सालों की गणना करके पिछला टैक्स भी दे सकते हैं आखिर राष्ट्र का सवाल है।.............................सुखनवर
28 04 2014
 

Wednesday, April 23, 2014

वे बेशर्मी से बिके

एबीपी चैनल में एक कार्यक्रम चल रहा है। घोषणा पत्र। इसमें चैनल के बहादुर पत्रकार निर्भीक पत्रकार एक एक पार्टी के नेता को बैठाकर उनसे सवाल करते हैं। कुछ गोल टेबिलों में और विद्वान बैठे रहते हैं जो आज भी वही सवाल करते हैं जो एक साल पहले करते थे। एक दिन देखा तो राज ठाकरे बैठे थे। उनसे प्रश्न करते समय निर्भीक चैनलिये पत्रकारों के हाथ पैर फूल रहे थे। कांपते हाथों और लड़खड़ाती जबान से प्रश्न पूछे जा रहे थे और राज ठाकरे उसी ठसक से जवाब दे रहे थे जैसे वे मुम्बई के वो हैं जिसे किसी को भी पीटकर सुधारने का हक है। दूसरे दिन आजम खां बैठे थे। उनसे भी सवाल जवाब चल रहे थे लेकिन निर्भीक पत्रकारों को आजम खान कह रहे थे कि तुम मीडिया वाले मोदी के हाथों बिके हुए हो। तुमने मोदी से पैसे लिए हैं। तुम काहे के निष्पक्ष। तुम तो सबके बयान तोड़फोड़कर दिखाते हो। मगर बहादुर पत्रकारों ने कुछ नहीं कहा। तीसरे दिन देखता हूं तो मोदी विराजमान हैं मगर सामने जनता नहीं है। तीन नए पत्रकार विराजमान हैं। वे प्रश्न पूछेंगे। आम जनता ? नहीं पूछेगी। ये तीन सधे सधाये सीखे सिखाये प्रायोजित प्रश्नकर्ता फिर उसी कांपती आवाज में मोदी जी से पहले से तय तारीफ भरे प्रश्न कर रहे हैं। समय की सीमा नहीं। कोई व्यवधान नहीं। कोई प्रतिपश्न नहीं। अभिभूत पत्रकारगण। ये इंटरव्यू न जाने कितनी देर चला एक घंटे से ज्यादा का प्रलाप था।
हद तो तब हुई जब चैनल ने बताया कि ये इंटरव्यू दर्शकों को अभी कई दिनों  तक देखना होगा। आज 23 तारीख को फिर इसका प्रसारण चालू है। कल वोटिंग है। प्रचार बंद है। चुनाव आयोग सख्त है। चैनल में इंटरव्यू चालू है।
जब सर्वे आना शुरू हुए थे तभी ये तय हो गया था कि एन डी ए को जब तक पूर्ण बहुमत नहीं मिल जाएगा ये सर्वे वाले चुप न बैठेंगे। पिछले सप्ताह पूर्ण बहुमत आ चुका है। अब जरूरत है कि 12 मई से पहले दो तिहाई या फिर सीधे तीन चैथाई बहुमत दिलवा दिया जाए और इंदिरा गांधी राजीव गांधी का इतिहास दोहरा दिया जाए।
आजकल क्लीनचिट का जमाना है। हर अपराधी के पास एक दो क्लीनचिटें हैं। ज्योंही आप आरोप लगाएंगे कि आप अपराधी हैं अगला कह देगा ये देखो क्लीनचिट। ये मुझे फला तहसील के मजिस्ट्रेट ने दी है। ये देखो मुझे ये तहसीलदार ने दी है। ये देखा ये फलां थानेदार ने दी है। बस इतने से ही काम बन जाता है।
मोदी ने कहा है कि पिछले बारह सालों में गुजरात में दंगे नहीं हुए। इससे भक्तजन बहुत प्रसन्न हुए। मुदितमन से उनका भजन करने लगे। कब्र में  गड़े मुर्दों ने कहा कि अब दंगे कहां से होंगे। हम सब तो यहां पड़े हैं। अब हमें कहां से मारोगे।
भारत का वोटर बहुत समझदार है। वो संसद का चुनाव लड़ने वाले से वो प्रश्न करता है जो उसे नगरनिगम पार्षद से करना चाहिए। उसकी अपेक्षा रहती है कि जीतने वाला हर रोज उसके घर आकर उसकी नाली सड़क के बारे में बात करे। उसके लड़के की नौकरी लगा दे। घर आकर उसका फार्म भर दे। वो सांसद से ये नहीं पूछता कि वो कितने दिन संसद गया। उसने वहां क्या किया। किन मुद्दों पर बोला। उसकी पार्टी ने संसद कितने दिन चलने दी कितने दिन रोक दी। वगैरह।
आप पार्टी का एक भी सांसद नहीं है। उसने कहा है कि हमारा कोई भी संसद कभी संसद में अध्यक्ष की कुर्सी के पास नहीं जाएगा। हर बहस में हिस्सा लेगा। सदन की कार्यवाही नहीं रोकेगा। क्या ये कसम बाकी पार्टी के लोग नहीं खा सकते। जिस संसद में जाने के लिए उम्मीदवार इतनी मेहनत और इतना पैसा खर्च कर रहा है उसी में जाने के बाद वहां संसद का बहिष्कार करना, संसद न चलने देना, बहस न होने देना कौन से मजबूत लोकतंत्र की निशानी है ?
और अंत में यू पी ए और एन डी ए चुनाव के कम से कम अंतिम मतदान के पहले ही आम जनता को यह तो बता दें कि देश की आर्थिक नीति, शिक्षा नीति, विदेश नीति, पर्यावरण, जैसे तमाम मुद्दों पर मतभेद कहां कहां हैं ? कहां कहां उनमें कोई मतभेद नहीं है। घोषणा पत्रों से स्पष्ट हो चुका है कि दोनों में रत्ती भर मतभेद नहीं है।
ये शेखो बरहमन के झगड़े सब नासमझी  की बातें हैं।

Wednesday, April 9, 2014

कल को गोली भी चल सकती है

बताइये कितना बढि़या सबकुछ सैट चल रहा था। कहीं कोई दिक्कत नहीं। कोई समस्या नहीं। हम सब एकदूसरे से सहमत थे। कितना झगड़ते थे। एकदूसरे को हराते थे जिताते थे। कोई सिद्धांत आड़े नहीं आता था। कभी आपने सुना कि हमने मारपीट की हो। गाली गुप्तार से आगे कभी बढ़े नहीं। कितना सही बंटवारा था। हिन्दू हमारे मुसलमान तुम्हारे। पिछड़े हमारे अतिपिछड़े तुम्हारे। व्यापारी हमारे मजदूर तुम्हारे। ऐसा तो नहीं था कि हमने किसी नए आदमी को घुसने न दिया हो। भाई ये तो खेल है। आओ तुम भी खेलो। जैसे रेल के डिब्बे में होता है। जब कोई नया यात्री घुसता है तो सबको दुश्मन लगता है। अगला स्टेशन आने तक वो सैट हो जाता है और फिर उसे भी नया यात्री दुश्मन लगने लगता है। स्टेशन आते रहते हैं। लोग उतरते चढ़ते रहते हैं।
देखिये मूल बात है सेवा। लोकतंत्र का मूल मंत्र। हम सब सेवा करना चाहते हैं। जो सेवा करता है उसे मेवा मिलता है। हम सेवा करते हैं। हमें मेवा मिलता है। सब जानते हैं। हर कोई अपने हिस्से का मेवा खा रहा है। हम लोगों में कभी कोई बुराई होती भी है तो मेवे को लेकर ही होती है। कहीं कोई बड़ी सेवा हो गई। बड़ा मेवा मिल गया तो जाहिर है कि बाकी सेवकों को ईष्र्या होती है। तुमने बड़ा हाथ मार लिया। हमें भी खिलाओ। कभी खिला दिया जाता है। कभी आत्म सम्मान आड़े आ जाता है। आपको ठीक नहीं लग रहा होगा मगर हम लोगों का भी आत्म सम्मान होता है जनाब। यूं ही समाजसेवा नहीं करते। जो कुछ करते हैं सरे आम करते हैं। वो कहावत है न कि उंट की चोरी निहुरे निहुरे। सो जब डाका डालते हैं तो उजागर डालते हैं। कहां तक छुपें भाई साब। और छुपें कैसे। एक एक डील आजकल करोड़ों से कम की होती नहीं। पंचायत का छोटा सा ठेका लेने जाओ तो दो चार करोड़ का काम हो जाता है। और ये लोकतंत्र जो है न बड़ी मुसीबत है। जिसको देखो वोई मुंह फाड़े बैठा है। हमें भी खिलाओ। काम कुछ करना नहीं मगर इन्हें भी खिलाओ। पंचायती राज आ गया है तो पंचों, सरपंचों, पंचायत सचिव, सी ई आ,े कलेक्टर, कमिश्नर, राजधानी, आॅडिट, अब कहां कहां तक गिनाएं। इन सबको देने के बाद बचता क्या है ? घंटा। फिर भी अपना ये है कि भाई हम सब राष्ट्रभक्त लोग हैं। चलो देशभक्त भी कहलो। अब ये भी मुश्किल हो गई है साहब कि शब्द तक बंट गए हैं। राष्ट्रभक्त मतलब एक पार्टी और देशभक्त मतलब दूसरी पार्टी। करते हैं सब सेवा, मगर छुपाते ऐसे हैं जैसे किसी को दिखाई नहीं दे रहा हो। हमारा कहना है कि भई जोर से नारा लगाओ ’’हम सब एक हैं’
इस देश में कानून बनाने वालों मालूम नहीं क्या सूझा कि नियम बना दिया हर पंाच साल मंे चुनाव होंगे। अरे पांच साल में होता ही क्या है। आपने देखा नहीं कि पंचवर्षीय योजना लागू नहीं हो पाई क्योंकि योजना ही नहीं बन पाई। जब योजना बनाने में पांच साल कम पड़े तो लागू करने में तो कम पड़ेंगे ही। फिर चुनाव जीतो। आजकल करोड़ों रूपये का काम हो गया है। सरकार बन गई तो ठीक वसूली हो जाएगी वरना विपक्ष में बैठने में क्या मिलना है। जितना छीन झपट लो उतना बहुत है। जब तक कुछ सैट हुआ। कुछ कमाई हुई कुछ सेवा हुई तब तक पांच साल पूरे फिर चुनाव लड़ो। आजकल टिकिट हासिल करना भी एक चुनाव ही है। ऐसा लोकतंत्र मजबूत हुआ है कि सबकुछ पानी की तरह साफ हो गया है। पार्टी का नेता कहता है कि टिकिट चाहिए पैसा दो। झक मारके देते हैं। भई मार्केट के हिसाब से चलना पड़ता है। तुम नहीं दोगे तो दूसरा दे देगा। फिर करते रहना फोकट की सेवा।
तो जनाब जैसी जमाने की रीत है वैसा हम चल रहे थे। मगर इस देश के नागरिक का क्या करें। खुद आकर कहेगा कि भैया तबादला रूकवा दो जितना खर्चा होगा हम देंगे। फिर बाद में कहेगा कि बहुत भ्रष्टाचार है। लड़के की नौकरी लगवा दो। जितना कहोगे दूंगा। बाद में कहेगा बड़ा भ्रष्टाचार है। तो जनाब सबको बड़ा जोश आया कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन करेंगे। करो भाई। एक बुढऊ को पकड़ लाए। वो अनशन पर बैठ गए। जब तक सरकार भ्रष्टाचार नहीं खत्म करेगी मैं भूखा रहंूगा। आठ दस दिन वो नौटंकी चली। एक बाबा जी दवाई बेचते थे। वो भी अनशन पर बैठ गए। मगर उन्हें उठाना नहीं पड़ा। वो तीन दिन मंे खुद ही अस्पताल पंहुच गए। वो बहुत बहादुर थे। अपनी धोती फेंक फाक के किसी औरत का सलवार कुर्ता पहन के छुप के भागे। फिर पकड़ भी लिए गए। उनकी धोती के अंदर खाकी हाफ पेंट थी।
यहां तक तो ठीक था। ऐसा जोश आना भी जरूरी है। वो कहा जाता है न कि एक बार कुकर की सीटी बजा दो प्रेशर खत्म हो जाता है। तो कुकर की सीटी बज गई। ये आंदोलन बहुत बढि़या था। चाट फुल्की आइसक्रीम वगैरह के साथ दिल्ली वासियों को खूब मजा आया। टी वी वालों को खूब मजा आया। उनका बढि़या धंधा हुआ। दोनों का स्वार्थ पूरा हुआ। उनका आंदोलन चमक गया। उनका धंधा चमक गया।
बुढऊ तो चले गए अपने गांव मगर ये कुछ लोग जो उनके साथ थे बहुत बदमाश निकले। अभी तक क्या होता था कि ये एनजीओ वालों का काम बहुत अच्छा था। ये विरोध करते थे और अपने घर चले जाते थे। राजनीति से दूर रहते थे। राजनीति हम करते थे। विरोध ये करते थे। मगर ये कुछ बदमाश ज्यादा आगे बढ़ गये। इनने अपनी पार्टी बना ली। हम सबने सोचा चलो कुछ दिन में अपने साथ आ जाएंगे। मगर ये तो सिर पर ही चढ़ने लगे। कहते हैं सिस्टम बदलेंगे। अरे भई क्यों बदलोगे सिस्टम। इस सिस्टम में क्या बुराई है। सब मिलकर खा रहे हैं। कभी हम हीरो हो जाते हैं कभी हम विलेन हो जाते हैं। देश का विकास हो रहा है। हमारा विकास हो रहा है। देश की जनता भोली है। वो किसी चपरासी बाबू अफसर को सौ पचास की घूस दे देती है तो समझती है कि ये भ्रष्टाचार है। उसे मालूम नहीं कि हम लोग राजधानी में बैठकर जो खेल खेलते हैं उस पैसे में कितने जीरो हैं वो नहीं गिन पायेंगे। ये फटेहाल क्या जाने विकास क्या होता है। एक डिफेंस डील कितने की होती है। किसी को कहदो कि लिखो बेटा - एक लाख करोड़। अच्छा भला एम बी ए लड़का न लिख पाये ऐसे विकास के आंकड़े।
तो भाई साहब अब हम कुछ गारंटी नहीं दे सकते। अभी तो जूते, चांटा चल रहे हैं। कल को गोली भी चल सकती है। फिर बैठना राजघाट पर। बड़े आए सिस्टम बदलने वाले। 

मेरे सामने कुछ सवाल हैं भाग -2


मेरे सामने कुछ और सवाल भी हैं। पिछले बार मैंने कुछ सवाल उठाये थे जिन पर मित्रों ने काफी ध्यान दिया। ये नई किश्त है।
संसद में कोई व्यक्ति केवल एक सीट का प्रतिनिधित्व कर सकता है। फिर वह दो जगह से क्यों खड़ा होता है। पूर्व में जब भी कोई दो सीटों से चुनाव लड़ा है तो वह इसलिए कि एक जगह से नहीं जीत पाया तो दूसरी जगह से तो जीत ही जाउंगा। मगर जिस आदमी का दावा है कि उसकी लहर चल रही है वो यदि दो जगह से चुनाव लड़े तो यह तो तय है कि उसकी लहर पर उसे खुद विश्वास नहीं है। आपका क्या खयाल है। कैसी लहर है ?
देश दुनिया के हाल जानने का हमारे पास क्या साधन है ? टी वी और अखबार।  हमारे शहर के अखबार में जो गुजरात से 1000 कि मी दूर है और जिसका गुजरात से कोई संबंध नहीं है गुजरात के मुख्यमंत्री के आदमकद फोटो के साथ गुजरात सरकार का विज्ञापन छपता है। क्या इस विज्ञापन के पैसे का अखबार द्वारा मोदी गुणगान करने से कोई संबंध है ? सवाल है। क्या दिन दिन भर टी वी चैनलों द्वारा मोदी के भाषणों का जीवंत लाइव प्रसारण करने और किसी और का प्रसारण न करने का नगद भुगतान करने के अलावा कोई और कारण हो सकता है। आजकल हर चैनल द्वारा लगभग प्रतिदिन एक नया महा सर्वे और उसका परिणाम घोषित किया जा रहा है। भाजपा को प्राप्त संभावित सीटों की संख्या अब 250 तक पंहुच चुकी है। टारगेट 272 से केवल 22 सीट दूर जबकी पहले मतदान को अभी चार दिन बचे है। क्या इन सर्वे का भुगतान से कोई संबंध है ? मुझे महान पत्रकारों और उनके अनुमानों पर कुछ ज्यादा ही भरोसा हो चला है।
टी वी देखने से पता चलता है कि चुनाव दिल्ली, अमृतसर, रायबरेली, अमेठी, लखनउ और वाराणसी में हो रहा है। बाकी किसी प्रदेश में किसी और सीट पर चुनाव हो रहा है इसका पता चल नहीं पा रहा है। क्या केरल, प बंगाल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, बिहार, यू पी में भी चुनाव हो रहे हैं ? असम, नागालैंड आदि में चुनाव हो रहे हैं या वहां बी जे पी के उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गये हैं।इन प्रदेशांे में किसी की चुनाव सभा हो रही है क्या ? वहां चुनाव के मुद्दे क्या हैं ? केरल में चुनाव किन मुद्दों पर लड़ा जा रहा है।
कुछ बहुत छोटे सवाल हैं -
एफ डी आई के बारे में कांग्रेस और बी जे पी में क्या कोई मतभेद है ? यदि है तो क्या है ? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है ?
भारत के सरकारी संस्थानों को देशी विदेशी पूंजीपतियों को बेच देने के बारे में जिसे विनिवेश कहा जाता है क्या बी जे पी और कांग्रेस में क्या कोई मतभेद है ? यदि है तो क्या है ? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है ?
केजरीवाल ने गैस के दामों का मामला उठाया है। इस बारे में कांग्रेस और बी जे पी मंे क्या कोई मतभेद है ? यदि है तो क्या है ? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है ?
हमारे देश के कानूनों के कारण लाखों बेगुनाग लोग अदालतों, जेलों और थानों के चक्कर काटते रहते हैं। इन कानूनों को बदलने की कोई योजना या इच्छा हमारे देश के राजनीतिक दलों को है या नहीं ?
घरेलू हिंसा, दहेज, नारी के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार, जैसे कारणों से हमारे देश की आधी आबादी घुट घुट कर जीने के लिए मजबूर है। इनकी हालत सुधारने की कोई इच्छा या योजना हमारे देश के राजनैतिक दलों में है या नहीं ?
एसिड से जलाने का कृत्य तो बलात्कार से भी अधिक जघन्य है। उसके लिए मौत की सजा का प्रावधान करने की कोई इच्छा या योजना हमारे देश के राजनैतिक दलों में है या नहीं ?
पर्यावरण को बचाने, पानी को बचाने, भूजल स्तर को बढ़ाने, शहरों को हरा भरा बनाने, आम आदमी को अच्छी सड़क पर चलने, अच्छे हवादार घरों में रहने, ज+हर से मुक्त अच्छा खाना देने की कोई इच्छा या योजना हमारे देश के राजनैतिक दलों में है या नहीं ?
इस देश का गरीब आदमी बिना किसी पास के टिकिट खरीदकर रेलवे के दूसरे दर्र्र्जे के डब्बों में सफर करता है। इन डब्बों और इन यात्रियों की हालत क्या आपने देखी है। इन यात्रियों को मनुष्य समझकर रेलवे के डब्बे आम आदमी के लिए सुलभ कराने की कोई योजना या इच्छा हमारे देश के राजनैतिक दलों में है या नहीं ?
हमारे देश के सरकारी स्कूल जर्जर, टूटे फूटे, गंदगी से बजबजाते, शिक्षक विहीन क्यों हैं ? क्या हमारे देश की बुनियादी शिक्षा में कोई सुधार संभव नहीं है ? इसकी कोई योजना या इच्छा हमारे देश के राजनैतिक दलों में है या नहीं ?
हमारे देश के सरकारी अस्पताल जर्जर, सुविधाहीन, डाक्टर विहीन क्यों हैं ? क्या हमारे देश की बुनियादी स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई सुधार संंभव नहीं है ? क्यों नहीं है ?
हमारे देश में लाखों मजदूर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश जाकर मेहनत कर जीवनयापन करते हैं। इनके लिए किसी राजनैतिक दल में कोई सोच है या नहीं ? क्यों नहीं है ?
आज नौकरी करने वालों के लिए काम के घंटे, स्वास्थ्य, मनोरंजन, परिवार, कला, संस्कृति सभी कुछ स्वाहा हो चुका है। इन रोबोटों के लिए किसी राजनैतिक दल में कोई सोच है या नहीं ? क्यों नहीं है ?
यदि हम इन बातों पर विचार नहीं करते और राजनैतिक दल इन बातों के लिए जवाबदेह नहीं हैं तो आपके वोट देने का मतलब क्या है ? आप वोट नहीं भी देंगे तो भी चलेगा न ? आपका वोट कीमती है इस मुगालते में न रहें। लोकतंत्र के इस उत्सव में  आपके वोट के दीपक से किसी और के महल में उजाला होगा। आपका बस तेल जलेगा। 06 04 2014 

मेरे सामने कुछ सवाल हैं भाग -1

मेरे सामने कुछ सवाल है। टीवी के न्यूज चैनलों का आम दर्शक होते हुए भी मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं ये एक गुस्ताखी तो है पर क्या करूं ?
प्रधानमंत्री पद के स्वघोषित और स्वविजयी प्रत्याशी कहते हैं कि देश आजादी के बाद बर्बाद हो गया। आजादी से पहले हमारे अंग्रेज मालिक बढि़या विकास कर रहे थे। इसीलिए ये लोग स्वतंत्रता संग्राम के बजाय अंग्रेजों के साथ थे। आजादी होते ही विकास पूरी तरह रूक गया। इसका मतलब यह हुआ कि हम आज जैसे हैं वैसे ही सन् 1947 में थे। मुझे ऐसा लगता नहीं पर शायद यही सच होगा। सन् 98 से सन् 2004 तक कांग्रेस के अलावा कोई दूसरी दैवीय सरकार थी शायद इन्हीं 6 सालों में ये जो कुछ भी बदलाव हुआ दिखता है वो हो गया हो। पर यदि ये बहुत अच्छा और अनुकरणीय था तो ये दैवीय सरकार दोबारा क्यों नहीं आई ? क्या वोटर पाकिस्तान से आकर इनके विरोध में मत डालकर भाग गये ?
आजादी के बाद से कांग्रेस की सरकार रही जिसने देश का विकास नहीं होने दिया। पर क्या आजादी के बाद चुनाव नहीं हुए। क्या ये सरकार साठ साल तक बिना चुनाव के सत्ता पर बैठी रही ? मगर चुनाव तो हुए तो फिर वोट किसने डाले ? प्यारे बहनो और भाइयों ने ही वोट डाले और विकास विरोधी सरकार को जिताया। बहुत बार तो ऐसा जिताया कि रिकाॅर्ड बन गया। फिर ये सरकार की गलती है या प्यारे भाइयो और बहनों की जिन्होंने कांग्रेस की सरकार को बार बार जिताया।
कांग्रेस ने घोषणा पत्र जारी कर दिया। आपने तो नहीं किया। कांग्रेस का घोषणा पत्र तो एक धोखा है। मगर आप तो सम्पूर्ण धोखा हैं। आपका घोषणा पत्र क्या है ?
कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति करती है। आप काहे की राजनीति करते हैं ? आपको वोटों के बैंक से परहेज है ? क्या आप वोटों के बिना जीत जाएंगे ? कांग्रेस चाहती है कि उसे मुसलमानों के वोट पूरे मिल जाएं तो आप भी तो चाहते हैं कि आपको हिन्दुओं के पूरे वोट मिल जाएं। आप भी तो धर्मसंसद, राममंदिर, विश्व हिन्दु परिषद, बजरंग दल के नाम पर हिन्दू वोट बैंक को ही तो भरने में जुटे हैं। बाॅल तो आप भी वही खेल रहे हैं फर्क इतना है कि आप दूसरे सिरे एन्ड पर खड़े हैं।
कांग्रेस और भाजपा दोनों का एकदूसरे पर आरोप है कि वे सत्ता के भूखे हैं। वे स्वयं संत और निर्मोही हैं और दूसरा सत्ता की राजनीति कर रहा है। चुनाव जीतने पर क्या होगा ? क्या आप सत्ता स्वीकार नहीं करेंगे। क्या आप कहेंगे कि हम चुनाव जीत गये तो क्या हुआ पर हम सत्ता के भूखे नहीं हैं। हम सत्ता हारे हुओं को सौंपते हैं।
कांग्रेस सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढा दिये। आप जब सत्ता में आएंगे तो क्या करेंगे ? क्या दाम घटाएंगे ? कितने घटाएंगे ? क्या आपकी सरकार पेट्रोल के दाम 10 या 20 रूपये लीटर कर देगी। आखिर क्या भाव होगा ? क्या दामों का संबंध अंतर्राट्रीय बाजार से नहीं होगा ?
खाद के दाम क्या होंगे? कितने घटाएंगे ? कितने रूपये बोरी खाद मिलेगी।
अनाज के दाम बहुत ज्यादा हैं। आप क्या कर देंगे ? आपकी सरकार गेहूं चावल दाल तेल नमक किस दाम पर उपलब्ध करायेगी ? क्या ये दाम आपकी सरकार रहने तक 5 साल तक स्थिर रहेंगे ? किसानों को क्या मूल्य मिलेगा ? किसानों को ज्यादा मूल्य देंगे तो जनता को वही अनाज कम पैसे में कैसे देंगे जरा समझाएं। कांग्रेस की सरकार तो बहुत खराब रही आपकी अच्छी सरकार क्या करने वाली है स्पष्ट बताएं ?
  राट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कहा है कि हर हिन्दू को पांच बच्चे पैदा करना चाहिए। बिलकुल सही है। क्या संघ अपने हर कार्यकर्ता से इसके लिए शपथ पत्र भरवा रहा है ? उन हिन्दुओं को क्या सजा मिलेगी जिनने अपनी पत्नियों को छोड़ दिया है या शादी ही नहीं की। संध की जनसंख्या नीति क्या है ? भारत की जनसंख्या जरूरत से ज्यादा है, कम है या ठीक है।
कांग्रेस की सरकार आतंकवादियों से डरती है। आपकी नहीं डरेगी। आप सत्ता पर आते ही क्या करेंगे ? पाकिस्तान पर हमला कर देंगे? बंगला देश को मिटा देंगे ? कश्मीरी पंडित पहले भी कश्मीर से बाहर थे, 2004 तक आपकी सरकार थी तब भी कश्मीर से बाहर थे आज भी बाहर हैं। आप उनके लिए क्या करेंगे ? क्या आपके नेतृत्व में सभी कश्मीरी पंडित कश्मीर में जाकर बस जाएंगे। साफ साफ बताएं धारा 370 का आप क्या करेंगे ? क्या उसे मिटा देंगे ? सत्ता में आने के कितने दिन के अंदर ?
क्या आपको याद है कि आपके रक्षा मंत्री कश्मीर में आपकी जेलों में बंद आतंकवादियों को कंधार सुरक्षित पंहुचा कर आए थे ? क्या कहना है हिन्दू वीर ? उन्हें खत्म क्यों नहीं कर दिया ? उनको बिरयानी तो आप भी खिलाते रहे।
कारगिल की लड़ाई के बाद लाहौर बस लेकर कौन शांति वार्ता करने गया था। मुशर्रफ को आगरा बुलाकर बिरयानी कौन खिला रहा था। चीन से संबंध सुधारने की पहल किसने की थी ? पाकिस्तान, बंगला देश और चीन से दुश्मनी की बातें करना और दोस्ती का हाथ बढ़ाना इनमें से कौन सी चाल आप आगे चलेंगे ? आपकी विदेश नीति क्या है ?
अमेरिका को आप क्या मानते हैं ? दुश्मन या दोस्त ? अमेरिकी सरकार से आप कैसे संबंध रखेंगे ?
भारत में दवाइयां हजारों प्रतिशत मुनाफे में बेची जा रही हैं। आप क्या करेंगे ? क्या दवाओं की प्यारी प्यारी देशी विदेशी कंपनियांे  के अंधाधुध दामों पर प्रतिबंध लगाएंगे ? कितने दिनों में ?
साठ सालों में देश बरबाद हो गया पर सन् 1947 में देश में कितने स्कूटर, कितनी मोटर साइकिलें और कितनी कारें थीं ? अब कितनी हैं ? करोड़ों में। कितने कम्प्यूटर थे ? कितने लड़के लड़कियां विदेशों में नौकरी करते थे ? कितने विदेशों में पढ़ते थे ? कितने मोबाइल और कितने टी वी थे। कितने न्यूज चैनल थे।
मेरा कहना है कि झूठ बोलो। जम कर बोलो। राजनीतिज्ञ हो। मगर किसके सामने बोल रहे हो। अभी तो तुमने केवल विरोधी की निंदा की है। विकास के नाम पर क्या करोगे ये भी तो बताओ। अभी तो तुम घोषणापत्र ही नहीं बना पाये।  02 04 2014

Monday, May 13, 2013

क्योंकि भारत एक गरीब देश है।


    अरे हां भाई मैंने इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री को बता दिया। छोड़ दिया मंत्री पद। क्या करता। ये सी बी आई को अपनी कार्यकुशलता साबित करने के लिए मैं ही मिला था ? उधर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सी बी आई को स्वतंत्र होना चाहिए और इधर इनने अपनी स्वतंत्रता की बानगी दिखा दी। मैंने कुछ दिन रास्ता देखा कि मामला शांत हो जाएगा मगर काहे को। रोज नई गिरफतारियां हो रही हैं। ये आजकल के लड़के सचमें कुछ बताते नहीं हैं और क्या क्या कर बैठते हैं। अब मुझे तो भाईसाहब कुछ समझ न आया कि ये हो क्या रहा है। मेरी और मनमोहन जी की हालत यूं समझिये कि बिलकुल एक सी हो गई। वो भी सकते में और मैं भी सकते मे। इस बार मैंने उनका फार्मूला अपनाया। चुप रहा आया। चुप रहने से बात आगे नहीं बढ़ती। कोई कुछ भी कहे चुप रहो। समय काटो। मीडिया भी परेशान हो जाता है। जब हम कुछ बोलेंगे नहीं तो हमारे बारे में कितना कहोगे ? अंत में थक जाओगे।
    अब देखा आपने मैं तो अभी अभी रेल मंत्री बना। इसके पहले तो दूसरे ही रेल मंत्री बनते रहे। सब चुप हैं। कोई कुछ नहीं बोल रहा। किसी ने नहीं कहा कि भाई कांग्रेसी रेल मंत्री को ऐसा नहीं करना चाहिए। रेल मंत्रालय में ये परंपरा नहीं है। रेल मंत्रालय में तो पैसा चलता ही नहीं है। हम लोग तो इसीलिए रेल मंत्री बना करते हैं कि अपने गांव तक रेल बिछवा लें। इससे ज्यादा कुछ नहीं। कोई उनसे ये सवाल नहीं पूछता कि आपको केवल रेल उद्योग के कल्याण की इतनी ललक क्यों रही है। क्यों आपको रेल मंत्रालय ही चाहिए। डी एम के को संचार मंत्रालय ही क्यों चाहिए ? अब समझ में आ रहा है कि सबको देश सेवा के लिए रेल विभाग ही क्यों चाहिए। वो तो ये भांजे भतीजों और सी बी आई के चक्कर में मैं फंस गया वरना आज तक इस मामले में कोई फंसा क्या ? हुआ ये कि कई लोग बनना चाहते थे मेम्बर वगैरह। जो बन गया सो बन गया। जो नहीं बना उसने कहा कि मैं नहीं बना तो क्या हुआ पर मैं खेल तो बिगाड़ सकता हूं। अब इस खेल बिगाड़ के चक्कर में मेरा खेल तो बिगाड़ दिया। मैंने तो इनका कुछ नहीं बिगाड़ा था।
    अब हो ये रहा है कि मेरी कंपनियों की बैलेंस शीट दिखाई जा रही है टी वी पर। बताया जा रहा है कि किस तरह मेरी कंपनियों ने मुनाफा कमाया। ये चैनल वाले खुद तो अपनी कंपनियां चला रहे हैं। मुनाफा कमा रहे हैं। पेड न्यूज के जरिये तक पैसा कमा रहे हैं। काला धन कमा रहे हैं और मुझे आरोपी बना रहे हैं। अरे भई धंधा मुनाफा कमाने के लिए ही किया जाता है। खैरात बांटने के लिए नहीं। अंबानी मुनाफा कमा रहे हैं तो वो उद्योगपति और मेरी कंपनी मुनाफा कमाए तो मैं भ्रष्ट। वाह रे न्याय। मेरा अपराध ये है कि मैं राजनीति में हूं। जो मुनाफाखोर राजनीति में नहीं हैं वो बड़े फायदे में हैं। वो पाक साफ बने हुए हैं जबकि राजनीति उन्हीं के लिए और उन्हीं के मुनाफे के लिए हो रही है।
    भारत एक गरीब देश है। गरीब देश के लोगों की सोच ही गरीब है। गरीब आदमी जब पैसे के बारे में सोचेगा तो कितना सोच पायेगा। उसके लिए लाख पचास हजार बहुत होते हैं। तो ये गरीब आदमी समझ ही नहीं सकते कि हम लोग दिल्ली मुम्बई में कौनसा खेल खेलते हैं। जो लेन देन हम करते हैं उतने पैसे यदि ये गरीब लोग देख भी लें तो मर जाएं। उनकी आंखे चुंधियाएंगी नहीं फूट जाएंगी। संसद में इने गिने सांसद हैं जो गरीब हैं। ये ही कम्युनिष्ट वगैरा। ये तो इतने गरीब हैं कि ये अपनी तनखाह भी पार्टी फंड में दे देते हैं। इन्हें पैसे से प्यार नहीं है। इसीलिए पैसे को इनसे प्यार नहीं है। रहे आओ गरीब।  इन्हें हमने नमूने के लिए रखा है। क्योंकि भारत एक गरीब देश है। ये हमें दुनिया को बताना है। सैकड़ों करोड़ रूपयों के मालिक सांसदों की कमी नहीं है। और क्यों हो साहब। आज कल एक एक लोकसभा चुनाव में दस बीस करोड़ खर्च हो जाते हैं। कौन गरीब आदमी चुनाव लड़ सकता है और मैं तो कहता हूं क्यों लड़े गरीब आदमी चुनाव। वो जीत कर भी क्या कर लेगा। उसके मतलब का कौन सा काम है संसद में। हमें धंधा करना है। पैसा कमाना है। हम संसद में रहेंगे तो हम आगे बढ़ेंगे। देश आगे बढ़ेगा। हमें जी डी पी मतलब है इन्हें जी पी एफ से।
    अब समय आ गया है कि हम गंदी पार्टी पालिटिक्स छोड़ दें। ये कांग्रेस भाजपा का झगड़ा अब खत्म होना चाहिए। सबको मौका मिलना चाहिए। हमें मौका मिल चुका है। काफी दिन हो गये हैं। अब दूसरों को मौका मिलना चाहिए। हमारी जो किस्मत में था हमने पाया। अब हमें एक दूसरे की राह का रोड़ा नहीं बनना चाहिए। उनकी किस्मत का भी उन्हें मिलना चाहिए। वो लोग भी तंग आ गये गये हैं संसद का काम रोक कर। अब रोल बदलना होगा। उनकी तड़फ देखी नहीं जाती। उनकी मुश्किल ये है कि वो एक दो बार देश चला चुके हैं। उनके मुंह में उसका स्वाद है। वो उन्हें सोने नहीं देता। इसीलिए वो संसद रोकते हैं। इस्तीफा मांगते हैं। वो रोज भविष्यवाणी करते हैं। ये सरकार गिर जाएगी। कमजोर सरकार है। पर सरकार है कि चले जा रही है। ऐसे ही चलती रहेगी क्योंकि भारत एक गरीब देश है। भारत का आदमी परम योगी है। वो एक बार वोट देकर निश्चिंत हो जाता है। और वोट देने में वो बहुत उदार है। हम उसे सिखाते भी नहीं और वो सीखता भी नहीं। वो जाति धर्म प्रदेश के प्रति समर्पित है। होना भी चाहिए। इसी में हमारी भलाई है।
    जनाब ये लोकतंत्र है। लोकतंत्र में आप किसी को समझा कर बुद्धि की बातें करके वोट नहीं ले सकते। करोड़ों लोगों से वोट लेना है। एक एक को समझाने बैठे तो हो चुका काम। इसीलिए लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि मूर्ख बनाओ। धड़ल्ले से झूठ बोलो। भावनाओं को भड़काओ। चुनाव जीत जाओगे। क्योंकि मैंने कहा न जी भारत एक गरीब देश है। 

Tuesday, May 7, 2013

जांच और निष्कर्ष


    जांच जांच होती है। और जब भी जुर्म होता है तो उसकी जांच होती है। जांच के लिए जुर्म का होना जरूरी है। इसमें कोई छूट नहीं दी जा सकती। हां यदि जांच करने - करवाने की विकट इच्छा हो और जुर्म न हो तो प्राकृतिक न्याय यही कहता है कि जुर्म करवा दिया जाए। इस तरह के प्रायोजित जुर्म में बहुत सफाई रहती है और मामला एकदम चुस्त बनता है। जांच में कोई नुक्स नहीं निकलता और न्याय एकदम पुख्ता और दो टूक होता है। और यही लोकतंत्र या जो भी तंत्र देश में मौजूद हो उसकी सफलता और शुचिता को बनाए रखता है। आखिर अपराधी को सजा हो ये कौन नहीं चाहता। यदि अपराधी जुर्म से पहले ही तय हो जाए तो बहुत सुविधा हो जाती है। न्याय पुखता, त्वरित और दोषमुक्त होता है। अपराधी को भी लगता है कि हां वो अपराधी है। जब इतने बड़े बड़े लोग कह रहे हैं तो उसने जुर्म किया ही होगा। 
    जांच के लिए जांच की मांग बहुत जरूरी है। यदि मांग न की जाए और जांच हो जाए तो ऐसा लगता है कि चोरी की जा रही है। ऐसे मौके वैसे कभी आते नहीं हैं जब बिना मांग किए जांच हो जाए। मजा भी तब आता है जब कुछ ना नुकुर हो। कुछ हुज्जत हो। कुछ मान मनौव्वल हो। जांच बहुत मुलायम भी हो सकती है और बहुत कड़ी जांच भी की जा सकती है। जांच के बारे में ये खास तौर पर देखा गया है कि यह बहुत लंबी चलती है। कभी कभी तो इतनी लंबी चलती है कि लोग भूल जाते हैं कि जांच शुरू भी हुई थी। जांच करने वाले भी भूल जाते हैं कि वो जांच कर रहे थे। वो कुछ नई जांच में उलझ चुके होते हैं। रोज जुर्म होते हैं रोज जांच होती है।
    अब न्याय बहुत सख्त हो चुका है। यूं ही टालू जांच कर मामला दबाया नहीं जा सकता। अदालत जांच से संतुष्ट नहीं होती तो फिर जांच करने का आदेश दे सकती है। ये भी हो सकता है कि वो जांच करने वाले से संतुष्ट न हो। तब नई एजेंसी को जांच सौंपी जा सकती है। वो भी जांच करके अपनी रिपोर्ट दे सकती है। हो सकता है कि उससे न्याय संतुष्ट हो जाए। हो सकता है न्याय संतुष्ट  न हो। या आंशिक संतुष्ट हो।  तब फिर यही प्रक्रिया दोहराई जा सकती है। जल्दी कोई है नहीं। ये भी जरूरी नहीं है कि जांच से जांच करवाने वाला ही असंतुष्ट हो। कोई भी असंतुष्ट हो सकता है। यहां तक कि वो पार्टी भी असंतुष्ट हो सकती है जिसका जुर्म, जांच, वादी, प्रतिवादी, किसी से कोई वास्ता न हो। लोकतंत्र है। सबको अपनी तरह से असंतुष्ट होने का हक है।  
    जांच से पहले जांच का निष्कर्ष तय हो जाता है। जब तक जांच के निष्कर्ष का मिलान इस पूर्व निर्धारित निष्कर्ष से नहीं हो जाता तब तक जांच होती जाती है। यह निष्कर्ष हर किसी का अलग अलग हो सकता है। इसीलिए जांच रिपोर्ट पंहुचते ही पुनः जांच या नई एजेन्सी से जांच की मांग उठ खड़ी होती है। कुछ लोग यह मांग भी कर सकते हैं कि अंतिम जांच से पहले जांच करने वालों की जांच क्यों न की जाए।
    न्याय को गुस्सा भी आ सकता है। जांच के निष्कर्ष में यदि कोई निर्दोष पाया गया और उसे छोड़ दिया गया तो भी न्याय फिरसे उसी एजेन्सी को जांच कर कह सकती है फिर से जांच करो और इसे अपराधी बनाओ। अंदर करवाओ। जांच एजेन्सी बेचारी है। वो हुक्म की गुलाम है। उसे नौकरी करना है। वो फिर जांच करती है। और रिपोर्ट पेश कर देती है। सरकार पिछले बार भी सबूत नहीं थे। इस बार भी सबूत नहीं हैं। पर आदेशानुसार पुनः जांच की गई और आदेशानुसार व्यक्तिविशेष को अपराधी बना दिया गया है। हुजुर अब देखें । कुछ जम रहा है या नहीं। न्याय का अहम तुष्ट हो जाता है। वो रिलेक्स होकर पुनः न्याय करने लगता है।
    जांच के दौरान सत्ता में भी परिवर्तन होते रहते हैं। इसका सीधा असर मामले पर पड़ता है। कभी कभी फरियादी अपराधी बना दिया जाता है और अपराधी बेचारा बन जाता है। पर जांच निष्पक्ष होती है क्योंकि एजेन्सी का काम निस्पृह रूप अनवरत जांच करना है। वो अपना काम लगातार करती रहती है। जांच की रिपोर्ट आती रहती हैं। लंबी रिपोर्ट की छोटी समीक्षा रिपोर्ट बनती है। फिर समीक्षा रिपोर्ट की बिन्दुवार रिपोर्ट बनती है। फिर निष्कर्ष का मौका आता है। निष्कर्ष निकालने वाला दुविधा में है। न्याय न जाने मन में क्या सोच कर बैठा है। कहीं ऐसा न हो कि निष्कर्ष न्याय को पसंद न आए और वो सबकुछ बदल डाले। ऐसे मौके पर जो कि आते ही रहते हैं निष्कर्षदाता का शब्द चातुर्य काम आता है। वो निष्कर्ष लिख देता है और पता भी नहीं चलता कि उसने निष्कर्ष लिख दिया है। पढ़ने वाला चकित है। क्या बात है। निष्कर्ष है भी और नहीं भी। सभी संतुष्ट हैं। यहां तक कि अपराधी को भी लगने लगता है कि हां ठीक ही तो कहा है कि शायद यह अपराधी होता यदि इसके खिलाफ वो सबूत होते जो अब तक खोजे जाने  हैं और कहीं गहरे छुपे हैं पर परिस्थितिजन्य साक्ष्य अपराधी के अपराधी होने की पुष्टि करता दिखाई देता है हालांकि निस्संदेह वह संदेह का लाभ पाने का अधिकारी प्रतीत होता है।    
    न्याय भी इंसान है। वो भी अखबार पढ़ता है। टी वी देखता है। वो भी भावनाओं में बहता है। उसमें भी राष्ट्रीय भावनाएं जोर मारती हैं। वो भी भ्रष्टाचार का विरोधी है। इस चक्कर में कभी कभी भावनाओं की ऐसी बाढ़ आती है अन्याय और न्याय के बीच दूरी खत्म हो जाती है। कानून की मोटी किताबें और वकीलों के महीन तर्क रखे रह जाते हैं और भावनाएं बह निकलती हैं। भावनाओं की बाढ़ में तर्क और नियम बह जाते है।
    हम खुश रहते हैं। क्योंकि हमारी जांच नहीं हो रही है। हम अपराधी नहीं हैं। पर जो अपराधी है क्या वो सचमुच अपराधी है?
07 05 2013

Thursday, April 25, 2013

जुर्म और सज़ा : एक बैठक की रिपोर्ट

    मीटिंग में बहुत गहमागहमी थी। काफी दिनों मीटिंग नहीं हुई थी। आज हो रही थी तो कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है। कार्यकर्ताओं को बता दिया गया था कि कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है इसीलिए आंदोलन बंद है। दूसरे जल्दी जल्दी आंदोलन करने से वो बात पैदा नहीं होती। अब जब खबरचियों ने खबर दी कि एक बहुत संवेदनशील और संभावनायुक्त मुद्दा मिल चुका है। दिसंबर से अब तक काफी समय भी गुजर चुका है तो मीटिंग बुला ली गई। काफी रात हो चली थी। पर मीटिंग थी के चली जा रही थी। कुछ कार्यकर्ताओं को स्टोर रूम भेज दिया गया था। मोमबत्तियों के बक्से निकालने और प्लेकार्ड्स तैयार करने के लिए। कुछ गंवार कार्यकर्ता आ गये थे जो हिन्दी में प्लेकार्ड्स बनाने लगे थे। उन्हें मार के भगा दिया गया। अच्छी और मंहगी अंग्रेजी बोलने वाले कुछ युवक युवतियों को एसएमएस किया गया। वो जल्दी में काफी कम कपड़े पहनकर आए और काम पर लग गये। पेन्टर्स को खबर कर दी गई। उन्होंने कहा कि हम लोगों ने संदेश मिलते ही विषय विशेष पर पेन्टिंग बनाना शुरू कर दी हैं। कुछ गिटार बजाने वालों को भी खबर की गई। उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले से कुछ दर्दनाक अंग्रेजी गाने तैयार कर रखे हैं वो स्टेज मिलते ही उन्हें बजाने लगेंगे। टोपियों के बारे में बताया गया कि पिछले आंदोलनों में इतनी टोपियां बन चुकी हैं कि आगामी दस साल तक चलती रहेंगी। आदेश दिया गया कि उन टोपियों में विषय के संदर्भ में कुछ लिख दिया जाए। यदि उनमें फलों के नाम आम बिही केला इत्यादि लिखे हों तो उन्हें मिटा कर गर्मागर्म विषय पर कुछ लिखा जाए।
    सभी चैनलों के चैनलिये वहां मीटिंग में बैठे थे और अपनी भूमिका जानना चाह रहे थे। उन्हें कहा गया कि आप आगामी दस  दिनों तक अपना पूरा समय खाली रखें। हम पूरा मसाला देंगे। आपका एक मिनिट भी खाली नहीं जाएगा। विज्ञापन एजेंटों से बात कर लें। बहुत अच्छा रेट मिलेगा। आंदोलन मसालेदार रहेगा। इमोशन और ऐग्रेशन से भरपूर। दर्शकों को मजा आ जाएगा। चाट पकौडे़ आइसक्रीम वालों के प्रतिनिधि भी आ पंहुचे थे। उन्हें कहा गया कि ये अन्ना वाला जश्नदार आंदोलन नहीं है। हम लोग आपके ठेलों वगैरह की गारंटी नहीं ले सकते। आप लोग अपनी रिस्क पर धंधा करें क्योंकि पब्लिक तो भरपूर रहेगी।
    काम बांटना शुरू किया गया। मोहल्ला कमेटियों को कहा गया कि सुबह दस बजे से इंडिया गेट पंहुचा जाए। मगर यह प्रस्ताव रद्द हो गया। विरोध में कहा गया कि इंडिया गेट पंहुचते ही राष्ट्रपति से दो दो हाथ करने का मन करने लगता है। हम राष्ट्रपति  का कुछ बिगाड़ भी नहीं सकते और राष्ट्रपति भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। हमारी असली लड़ाई सोनिया  और शीला दीक्षित से है। उन्हें ही घेरा जाए। इस पर कई कार्यकर्ताओं ने कहा कि पिछले आंदोलन में दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बच गया था। ये हमारा अपमान है। इस बार उसे नहीं छोड़ेंगे। चैनलियों ने कहा कि हमारे कैमरे हर अधिकारी मंत्री का पीछा करते रहेंगे। आप लोग भी उनका पीछा करिये। जो भी मिल जाए उसे इतना चिढ़ाइये कि वो भड़क जाए। बस काम बन जाएगा। कोई बड़ा अधिकारी पकड़ में न आए तो सिपाही से ही लड़ जाइये मगर न्यूज जोरदार बनना चाहिए। इसकी जिम्मेदारी कुछ सिद्धहस्त महिलाओं को दी गई। सिद्धहस्त महिलाओं से कहा गया कि वो रात भर अभ्यास कर लें और जितना हो सके अंग्रेजी में लड़ाई करें क्योंकि साउथ वगैरह के चैनलों को कवर करने में दिक्कत होती है।
    तय किया गया कि जंतर मंतर तो पंहुचा ही जाए साथ ही सोनिया जी और शीला दीक्षित के घरों पर भी पंहुचा जाए। झगड़ा इसी से बढेगा। किसी उत्साही कार्यकर्ता ने कहा कि राजघाट चला जाए। कार्यकर्ता की इस मूर्खता पर लोग जी भर के हंसे। उसे समझाया गया कि पिटाई के बाद राजघाट ही जाएंगे। उसके पहले गांधी जी का कोई रोल इस आंदोलन में नहीं है। कार्यकर्ताओं को आदेश दिया गया कि पिछले आंदोलन से सबक लिया जाए और आंसू गैस, वाटर जैट इत्यादि की नौबत न आए क्योंकि अंततः पिटे हुए लोग घर चले जाते हैं और हम लोग नए नए लोग पिटने के लिए कहां से लाएंगे। कार्यकर्ताओं को हिदायत दी गई कि बैरिकेटों से इस तरह से जूझें कि जैसे चीन की दीवार हो और बैरिकेट ही हमारे असली दुश्मन हैं। उस पार पुलिस सामने की ओर ढकेलते हुए और इस पार आंदोलनकारी अपने सामने की ओर ढकेलते हुए। इस बीच कुछ खिलाड़ी रूल तोड़ के बैरिकेट के ऊपर चढ कर दौड़ लगा देंगे। इससे आंदोलन बहुत क्रांतिकारी दिखाई पड़ेगा। इस पर सुझाव दिया गया कि कुछ पुतले बनवा लिये जाएं। सूचना दी गई कि इसकी चिंता न करें स्टोर में 168 पुतले रखे हैं। और वे किसी का भी पुतला दिख सकने की ताकत रखते हैं।
    चैनल वालों ने सूचित किया कि शाम को प्राइम टाइम के लिए हमने काफी हमलावर किस्म के बहस करने वाले तय किये है। इनकी आक्रामक बहसों से दर्शकों को बहुत मजा आएगा। मीटिंग में बैठे लोगों ने शिकायत की कि कई बार बहस करने वाले अक्ल की बात करने लगते हैं यह ठीक नहीं है। चैनलियों ने कहा कि ध्यान रखा जाएगा कि ऐसा कोई तत्व न आ पाए और बहस शुद्ध राजनैतिक और तू तू मैं मैं से भरपूर हो। मुद्दे पर बात कम से कम हो।
    आंदोलन के बारे में तय किया गया कि यह कई स्तरों पर होगा। अस्पताल में हमला किया जाए। बच्ची को जिस भी अस्पताल में हो वहां से हटवाया जाए। यदि एम्स में हो तो विदेश भेजा जाए आदि। मीटिंग में वरिष्ठ लोगों ने आम लोगों को समझाया कि हर आंदोलन में किसी एक व्यक्ति को खलनायक बनाना होता है। उसी को लक्ष्य करके आंदोलन होता है। इस आंदोलन में ये व्यक्ति पुलिस कमिश्नर, शीला दीक्षित, मनमोहन सिंह  या सोनिया गंाधी बनाई जा सकती है। आंदोलन ने बेहतरीन माहौल बनाया तो मनमोहन सिंह से भी इस्तीफा मांगा जा सकता है। दुनिया में हमारा नाम होगा कि हमने ऐसे मामले में प्रधानमंत्री को लपेट लिया। भारत का लोकतंत्र कितना मजबूत है। एक मुद्दा यह भी था कि बलात्कारी को क्या सजा दी जाए। फांसी पिछले आंदोलन में हो चुकी है। अब कुछ नई सजाओं के बारे में सोचा जाए। जैसे एक की जगह पांच बार फांसी। खौलते तेल में डालना। बधिया करना। पत्थरों से मारना। नौजवानों का विचार था कि सबसे बड़ी सजा ये है कि फांसी बिना सोचे विचारे बिना सबूत, बिना गवाहों के और बिना मुकदमा चलाए तुरंत दे दी जाए। क्योंकि अब हम और इंतजार नहीं कर सकते। बहुत हो चुका। नौजवान इतने तैश में आ गये कि गुस्से के मारे मोमबत्ती लेकर चल पड़े।   
                                                ........सुखनवर

Sunday, April 14, 2013

विकास पुरूष का चिन्तन

मित्रों और बहनों (हिन्दू)
    देखिये अपना एजेंडा विकास का है। मैं विकास पुरूष हूं। बल्कि महाविकास पुरूष हूं। मैंने ही अपने को बताया है। हालत ये कर दी है कि अखबार पढ़ेंगे तो लगेगा पूरे देश में एक ही प्रदेश है और एक ही मुख्यमंत्री है। मैने आदेश दिया है कि अब से  प्रतिदिन की मेरी दिनचर्या प्रकाशित हो और शाम को सभी चैनलों पर उस पर बहस हो कि आज मैंने क्या कहा और उसका मतलब क्या है। मैं तो स्पष्ट कहता हूं मित्रो, मुझे अपना विकास करना है। मुझे प्रधानमंत्री बनना है।
    मैं तो संघ प्रचारक था। हम लोग जब गणवेश पहनते हैं तो स्वयंसेवक रहते हैं और जब उतार देते हैं तो राजनीति में आ जाते हैं। मैं मुख्यमंत्री बना दिया गया। मैंने जिम्मेदारी निभाई। कांग्रेस को निपटाया। भाजपा और संघ में अपने विरोधियों को निपटाया। 2002 में मुसलमानों को निपटाया । मित्रों, इसका गणित समझिये आप। मुश्किल से दस बारह सीट पर मुसलमान फर्क डाल सकते हैं पर घृणा का ऐसा बाजार गर्म किया कि सारे गुजरातियां में हिन्दू गर्व समा गया। ये फसल काफी सालों तक कटती रहेगी। अब तो कई मुसलमान टोपी लिए घूम रहे हैं मुझे पहनाने के लिए। मैंने नहीं पहनी तो मैं बुरा पर जो पहनाने आए थे उनकी तो सोचिये।
    मैं चाहता हूं कि जैसे मैं गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया गया वैसे ही अब देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाऊं। इसके लिए मुझे भाजपा में अपनी विजय पताका फहराना है। अब भाजपा में मुश्किल ये है एक तो वो बुजुर्गवार बैठे हैं। वो जब तक हैं तब तक आस नहीं छोड़ेंगे। उनके साथ बहुत से छुटभैये लगे हैं जो कहते हैं कि मुझे गुजरात के बाहर न निकलने दिया जाए। मित्रों, ये पार्टी की अंदरूनी राजनीति है। इसकी मुझे चिन्ता नहीं है। दूसरे मेरे पास पैसा है और मुझे पैसा खर्च करना आता है।
    आजकल कैसे कपड़े पहने जाएं, कैसे बाल बनाए जाएं, कैसे हाव भाव रखे जाएं इसके लिए सलाहकार मिलते हैं। किस मुद्दे पर कैसे बोला जाए, इसका भी तैयार मसविदा आ जाता है। इवेंट मैनेजमेंट के छोकरे छोकरियां सब कर देते हैं और बहुत सस्ते में कर देते हैं। आजकल आप लोग देख रहे होंगे कि मेरी संवाद अदायगी में कितने उतार चढ़ाव और भाव आते जाते हैं। इसके लिए कई वरिष्ठ अभिनेताओं को नौकरी पर रखा है। मित्रो, मैे आपको बताऊं, हर कोई खरीदा जा सकता है। ये जो टी वी चैनलों पर अखंड मोदी पाठ हो रहा है ये कोई फ्री में नहीं हो रहा है। हर काम का मैं पूरा भुगतान करता हूं। मैं कभी कभी सोचता हूं कि इन लोगों का इतना नाम है। इतने बड़े बड़े पत्रकार और बु़िद्धजीवी कहलाते हैं मगर दो कौड़ी में बिकने का तैयार हैं। सुबह शाम फोन करते हैं मोडी जी मोडी जी। मैं भी बहलाता रहता हूं। इनमें आपस में प्रतियोगिता करा दी है। जो बेहतर करेगा उसे ज्यादा पैसा दूंगा। खूब मजा आ रहा है।
    मैंने कुछ नकली लड़ाईयां आयोजित करा दी हैं। जैसे नितिश कुमार बनाम मोदी। नितिश और शरद पुराने समाजवादी हैं। समाजवादियांे की खासियत है। ये हमें भला बुरा कहते हैं और हमारे संयोजक हैं। हमारे साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं। सुविधा ये है कि समाजवादी कभी समाजवादी का साथ नहीं देता। नहीं तो मुलायम, लालू, नितिश शरद सभी तो समाजवादी है। इन्हें मुझसे बड़ी शिकायत है तो रही आए। मुझे मालूम है वक्त आने पर ये मेरे पीछे खड़े रहेंगे। दुनिया भर में जब भी मौका आया तो समाजवादी दक्षिण पंथियों के साथ ही गये। 
    मेरे विरोधी समझते हैं कि गुजरात के दंगे मेरा रिकॉर्ड खराब कर देंगे। मैंने मीडिया के बुद्धिजीवियों को बोल दिया है। ज्योंही कोई 2002 के दंगे का नाम ले त्योंही तुम कहो कि कांग्रेस ने 1984 का दंगा करवाया था। उसका क्या ? बस इसके बाद बहस भटक जाएगी। अरे असली दंगे हमारे बुजुर्गवार के कमाल से 1992 में हुए थे। राम मंदिर आंदोलन के समय में। उसका तो कोई नाम नहीं लेता। अब वो बड़े संत बने रामनामी चादर ओढ़े घूम रहे हैं पर मन में यही है कि प्रधानमंत्री बन जाएं। क्या बूढा हो जाने से सारे पाप धुल जाते हैं ?
    मुझे लोकतंत्र से परेशानी नहीं है। उसको तो मैं सिद्ध कर चुका हूं। भाजपा और कांग्रेस में मेरे विरूद्ध कोई न उठ पाये इसकी व्यवस्था कर रखी है। परेशानी है तो न्यायपालिका से है। ये सिद्ध नहीं हो पा रहे। इनके खिलाफ बोल भी नहीं सकते। न्यायपालिका केवल गुजरात में होती तो मैं समझ लेता मगर दिल्ली में भी बैठी है। इसलिए मुश्किल हो रही है। कानून के लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है। इतना सम्मान है जो कानून मुझे पसंद नहीं है उसे तोड़ता नहीं बदल देता हूं। मुझे गुजरात का लोकायुक्त कानून पसंद नहीं है। मैंने नया कानून बना दिया। विकास के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं। कुछ भी मतलब कुछ भी। 
    मित्रो, एक राज्य सरकार का काम एक बड़े नगर निगम के समान होता है। कुछ कल्याणकारी कार्यक्रम चलाना होते हैं। कुछ सड़कें पुल आदि बनाना होते हैं। बिजली पानी की व्यवस्था करना होती है। इसे अपने आइ ए एस लोग फाइलों में ला लाकर पेश करते हैं। इसे करवा लो तो सरकार चल जाती है। ज्यादा से ज्यादा विधायकों को मंत्री बना दो वो व्यस्त रहते हैं और उखाड़ पछाड़ नहीं करते। पार्टी और सरकार चल जाती है। मोटे तौर पर मुख्यमंत्री का काम एक बड़े जिले के कलेक्टर का ही है। मेरी कुशलता इसी बात में है कि मैं वही सब कर रहा हूं पर गुणगान मेरा होता है क्योंकि मैं हर बिकाऊ को खरीदना जानता हूं।
    मीडिया को मैंने एजंडा दिया है कि राहुल बनाम मोदी युद्ध घोषित करो। मैंने राहुल को कांग्रेस का प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया और पीट दिया। बेचारा नया लड़का है। घबरा गया। कहने लगा है कि मैं तो देशसेवा करूंगा। उनकी माता जी तो वैसे भी नहीं बोलतीं। दूसरे मैं जानबूझकर ऐसे घटिया हमले करता हूं कि कोई जवाब दे ही नहीं सकता। देश में बहस ऐसी चलवा दी है जैसे अमेरिकी राष्टपति का चुनाव हो रहा हो जिसमें हर मतदाता को राहुल या मोदी में से एक को वोट देना है। इससे सुविधा ये हो जाती है कि असल मुद्दों पर बहस नहीं होती। मित्रो मेरा काम इसी से बनेगा। 
   

Thursday, March 29, 2012

वो बेचारी


    वो भाग रही थी। वो भाग भाग कर छुप रही थी। वो छुप छुप कर भाग रही थी। मैं उसके पीछे था। वो मेरे आगे थी। वो डरी हुई थी। मैं शेर बना हुआ था। दौड़ लगातार जारी थी। वो अचानक बस में घुस गई। मैं पीछे दौड़ा। बस चली गई। मैं आटो से भागा। उसे पकड़ा मगर वो बस से उतरकर लोकल ट्रेन में चढ़ गई। मैं भी उसी ट्रेन मंे चढ़ गया। वो उतरी मैं उतरा। मैं भागा वो भागी। थोड़ी देर में मैं भूल गया कि मैं उसके पीछे दौड़ रहा था। अब वो मेरे पीछे दौड़ने लगी। मैं भागने लगा। ये भागादौड़ी जारी रही। मैं हांफने लगा। उसकी सांस चढ़ गई। वो थक कर चूर हो गई थी। वो थकी थी। मैं फिर तरो ताजा था।
मैंने उससे पूछा: तू भाग क्यांे रही थी।
उसने कहा: छुपने के लिये, तुमसे बचने के लिए।
मैं: लेकिन क्यों
वो: आजकल मैं हर किसी से बचती फिरती हूं
मैं: क्यों
ैवो: क्योंकि आज कल हर कोई मेरा मरद बना फिर रहा है
मैं: ऐसा कैसे हो सकता है तुम कोई हूर की परी हो जो हर कोई तुम्हारा दीवाना बना फिर रहा है।
वो: मैं क्या हूं ये तो मैं नहीं जानती पर इन सब लोगों को अच्छे से जान गई हूं जो मेरे मरद बनने की कोशिश में हैं
मैं: मगर तुम्हारे भागने से क्या होगा क्या ये लोग तुम्हें छोड़ देंगे ?
वो: नहीं बिलकुल नहीं। ये लोग मुझे छोड़ ही नहीं सकते। मेरे भरोसे इनकी दुकानदारी चल रही है। मुझे छोड़ देंगे तो इनकी दुकानें बंद नहीं हो जाएंगीं। ये मरते दम तक मेरे पीछे पड़े रहेंगे।
मैं: मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तुम किनकी बात कर रही हो।
वो: देखो हर पांच साल में मैं स्वयंवर रचाती हूं। जो लोग मुझे पाना चाहते हैं वो स्वयंवर में आते हैं। सबको आजादी है। मगर ये लोग नहीं आते। जो स्वयंवर में जीत जाता है मैं उसके साथ रहती हूं। जो लोग स्वयंवर मैं शामिल नहीं होते वो जीते हुए को पांच साल कोसते हैं और कहते रहते हैं कि मेरी शादी झूठी है।
मैं: अरे देवी जी मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा आप क्या कह रही हैं। पांच साल। स्वयंवर। हार जीत। स्वयंवर में भाग न लेना।
वो: आपको समझ में आएगा भी नहीं। क्योंकि आप भी इन फरेबियों के साथ हैं।
मैं: मैं किसी फरेबी के साथ नहीं हूं। मैं आम नागरिक हूं। मैं सचाई के साथ हंूं।
वो: तो फिर एक बार आंखें खोलो और मुझे देखो मैं जनता हूं
मैं: हां हां कुछ कुछ पहचान में तो आईं
वो: मैं जनता हंू। हर कोई दावा करता है कि जनता ये जानना चाहती है। जनता ये सवाल पूछ रही है। कुछ लोग और कुछ चैनलों के स्वयंभू विचारक प्रस्तोता ये दावा करते हैं कि वो मेरी ओर से सवाल पूछ सकते हैं। किसी को भी कटघरे में खड़ा कर सकते हैं। किसी पर कुछ भी आरोप लगा सकते हैं। मैं ये बताना चाहती हूं कि ये जो कोई भी हों मैं नहीं हूं। ये लोग मेरे प्रतिनिधि नहीं हैं। ये मेरे सवाल नहीं उठा रहे। ये कुछ अपने सवाल उठा रहे हैं।
मैं: तो तुम्हारे सवाल क्या हैं
वो: मेरे सवाल बहुतेरे हैं। मैं पूछती हूं कि दवाईयां इतनी मंहगी क्यों हैं ? इलाज इतना मंहगा क्यों है। जो दवाई 2 पैसे में बनती है वो बीस रूपये में क्यों बिकती है। गरीब आदमी के लिए कानून और न्याय इतना मंहगा और पंहुच के बाहर क्यों है ? हर आदमी के लिए सम्मान से जीने लायक रोटी कपड़ा मकान क्यों नहीं है ? पुलिस इतनी अत्याचारी क्यों है? क्यों अन्ना का अनशन मायने रखता है और इरोम शर्मिला का अनशन मायने नहीं रखता। क्यों ममता बनर्जी के हर शर्त मंजूर है और क्यों इरोम शर्मिला की कोई बात मंजूर नहीं। क्याों मातृभाषाओं की हत्या की जा रही है ? क्यों अपनी मातृभाषा बोलने वाला अपमानित है और क्यों अंग्रेजी बोलने वाला गौरवान्वित है। क्यों पंडे पुजारी व्यापारी संत ज्योतिषी जनता पर लादे जा रहे हैं और क्यों विज्ञान के पीछे सब लठ्ठ लेकर दौड़ रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या पर रोक क्यों नहीं है। क्यों सारा देश कांक्रीट के जंगल में बदला जा रहा है। चौबीस डिब्बों की टेन में दो जनरल डिब्बे क्यों होते हैं ? क्यों जनता इन डिब्बों में ठूंसी जाती है और सफर करने को मजबूर होती है। क्यों देश का मजदूर किसान चर्चा से गायब है? क्यों देश की गरीब जनता के दुख दर्द किसी चैनल किसी आंदोलन का मुद्दा नहीं हैं ?
    इसीलिए जो बोले की वो जनता है। जो कहे कि जनता जानना चाहती है। जनता पूछ रही है। वो झूठा है। मक्कार है।

    ........सुखनवर
29 03 2012

Friday, March 16, 2012

जिम्मेदारी की भावना

अब देखिये साहब कि हमारी पार्टी देश में नंबर दो की पार्टी है। हमने पांच राज्यों में चुनाव लड़ा। एक दो जगह हम जीते या जीतते रह गए। जहां हम जीते वहां की किसी ने चर्चा नहीं की मगर उत्तर प्रदेश में हम हार गए तो हर कोई हमें टोंच रहा है। क्यों हार गए। पहले तो सरकार बनाने की बात कर रहे थे। अब बिलकुल चुप बैठे हो घर मंे छुप कर। अरे हार गए तो हार गए। अब कोई हारने के लिए चुनाव लड़ता है क्या ? हमने भी लड़ा। जैसे औरों ने लड़ा। अब हार जीत महत्वपूर्ण नहीं रह गई है। अब महत्वपूर्ण है मैदान में बने रहना। वामपंथियों ने यही तो गलती की है। मैदान से ही भाग गए। अब तो साहब क्या बताएं कोई पूछता तक नहीं है कि वामपंथी कितनी सीट लड़ रहे हैं। वो अपनी दो चार सीटें लड़कर हार हूर कर पॉलिट ब्यूरो की मीटिंग करने लगते हैं। मगर हम क्या खा के वामपंथियों का मजाक उड़ाएं ? अयोध्या तो उत्तर प्रदेश में है। भगवान राम तो हमारे हैं। लोग रास्ता चलते पूछ लेते हैं चिढ़ाने के लिए ’क्यों भई राममंदिर बनने की कोई तारीख मुकरर्र हुई की नहीं ?’
ये बात तो साहब सच है कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती। एक बार माहौल बन गया था तो जीत गए थे। मगर बस एक ही बार तो चढ़ी काठ की हांडी। उसके बाद से दो नंबर तीन नंबर चार नंबर की लड़ाई चल रही है। वो तो भला हो इन टी वी वालों का। हर चैनल वाला रोज शाम को कुश्ती का जंगी मुकाबला आयोजित करता रहा। तो खबरों मंे हम लोग बने रहे। बिना बात की बात पर बहस करते, कीचड़ उछालते दिन कटते रहे। यूपी के साथ एक और मुश्किल है। इसकी विशालता। इसका क्या करें। आपको मालूम है कि नहीं कि यदि यूपी भारत का एक प्रांत न होकर स्वतंत्र देश होता तो दुनिया का पांचवां बड़ा देश होता। इस विशाल प्रदेश में एक दिक्कत ये है कि कोई प्रांत का वासी तो है ही नहीं। कोई यादव है तो कोई लोधी है तो कोई जाटव है। अब भैया हमारी तो बुनियाद ही है कि हिन्दू मुसलमान के फसाद में कुछ खा कमा लेें। मगर यहां तो कोई हिन्दू है ही नहीं। दूसरे मुसलमान इतनी तादात में हैं कि जीती बाजी पलट दें। इसीलिए हम लोग नरेन्द्र मोदी को कहें कि हे हिन्दू हृदय सम्राट दया करें और उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए न आएं। आप गुजरात ही सम्हाले रहें। यही बहोत है। यहां आपकी शकल दिखी नहीं कि हमारी दो चार सीटें गईं।
आपको बताएं कि ये उत्तर प्रदेश का चुनाव क्या है साला महासमर है। देश के किसी प्रदेश में इतनी मेहनत नहीं लगती जितनी यहां लगती है। हर कार्ड निकालो और खेलो। उमा भारती तक को मैदान में उतार दिया। पिटी गोट क्या कर लेती। उनकी क्या हैसियत है ये उनने खुद ही नाप लिया है। अब वापस किसी तरह पार्टी में आ गईं तो इससे वोटर को क्या फर्क पड़ता है। उनके कहे से कौन वोट देगा। उधर कल्याण सिंह नाम का एक वोट कटवा मैदान में उतर गया। उमा भारती आ गईं तो दो चार बड़े नेता घर बैठ गए। कह दिया कि अब उन्हीं से प्रचार करा लो। हम लोग तो मूर्ख हैं जो यू पी में इतने दिनों से पार्टी चला रहे हैं।
सबसे बढ़िया बात तो ये हुई भैया कि उधर चुनाव हारे और इधर राहुल गंाधी ने कह दिया कि ओ के मैं हार की जिम्मेदारी लेता हूं। नहीं लेते तो भी तो हारे ही रहते। मायावती से किसी ने पूछा भी नहीं और उनने कोई हार की जिम्मेदारी नहीं ली। वो किससे कहें हर बात की जिम्मेदारी तो उनने वैसे ही ले रखी है। उनकी पार्टी में केवल एक मेम्बर है। मायावती खुद। बाकी कोई की हिम्मत है कि कह सके कि बसपा उसकी है। जैसे तृणमूल कांग्रेस में एक मेम्बर है। ममता बैनर्जी। जैसे एडीएमके में एक मेम्बर है जयललिता। इनके यहां कभी पार्टी की मीटिंग नहीं होती। वैसे सचाई तो यही है कि कांग्रेस में भी एक ही मेम्बर है। सोनिया गंाधी। कितना महान लोकतंत्र है। विधायक दल की बैठक होती है। सारे विधायक मिलकर एक आदमी नहीं चुन पाते मुख्यमंत्री के लिए। वे सोनिया जी को अधिकृत कर देते हैं। और जब सोनिया जी मुख्यमंत्री की लाटरी निकाल देती हैं तो यही अनुशासित विधायक सड़क पर उतर आते हैं।
आप लोगो को मालूम भी नही होगा कि उत्तर प्रदेश में हमारी पार्टी का अध्यक्ष कौन है। चुनाव हारने के बाद उन्होंने एक दो दिन इंतजार किया। जब किसी ने उनसे कुछ न पूछा, न हार के कारण पूछे न स्तीफा मांगा तो उन्होंने अचानक बयान दे दिया कि मैं पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेता हूं और इस्तीफा देता हूं। फिर भी किसी ने कुछ नहीं कहा। न इस्तीफे पर कुछ कहा न जिम्मेदारी पर कुछ कहा। हमने कहा कि भाई चुनाव का मैच ड्रा नहीं होता। इसमें तो कोई एक ही जीतेगा। बाकी तीन को हारना ही है। काहे हलाकान हो रहे हो। अब लोकसभा के चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेने की तैयारी करो। और अपनी पार्टी की हार को ज्यादा भावुकता में मत लो। ..........................................सुखनवर

16 03 2012

Tuesday, March 6, 2012

फर्म की मालकिन का लड़का

अब क्या है कि साहब हम तो इसी फर्म में काम करते करते बूढ़े हो गये। तरक्की भी हुई। ऐसा नहीं है कि बस निचले दर्जे के कार्यकर्ता बने रहे। शुरू में तो सबकोई छोटे दर्जे वाले ही रहते हैं। फिर धीरे धीरे फर्म में पकड़ बढ़ाई। कामधाम समझ में आया तो फिर राह निकलती गई। छोटे से कार्यकर्ता से आज फुल साइज नेता हैं। इलाके में पकड़ है। पकड़ है मतलब हम लोगों का काम करा देते हैं। सेवा भाव। लोग मानते हैं। अब तो उम्र ज्यादा हो गई है तो उसका भी फायदा मिलता है। वरिष्ठ नेता।
वरिष्ठ नेता हैं तो लोग उम्मीद करते हैं कि हमको पूछा जाए। हमसे सलाह ली जाए। मगर अपने को ऐसी कोई गलतफहमी नहीं है। अपने को मालूम है कि नौकर नौकर होता है। मालिक मालिक होता है। अपने को ये भी मालूम है कि अपने को कभी मालिक बनना नहीं है। मालिक बनने की कोशिश करोगे तो नौकर भी न रह पाओगे। तो अपनी इसी साफ समझ का नतीजा है कि अपने हाथ में लड्डू ही लड्डू हैं। कमा रहे हैं। इतना कमा चुके हैं कि सात पीढ़ी खा सकती हैं मगर आप कभी हमारी हालत देखो ऐसा लगेगा कि दस पांच रूपये दान कर दो। बेचारा है। ये तरीका है। दीन हीन बने रहने से ही आदमी विश्वासपात्र बन पाता है। जब तक बड़े आदमी के सामने छोटे नहीं बनोगे तब तक बड़े आदमी को कैसे लगेगा कि वो बड़ा आदमी है ?
अब आपको अपनी फर्म की बात बतायें। फर्म पुरानी है। जिनकी थी वो कबके मर खप गये। उनके जमाने में तो फिर भी कुछ पुराने लोगों की पूछ थी। फिर नए लोगों ने फर्म सम्हाली। नए लोगों ने फर्म बनायी तो थी नहीं उन्हें तो बनी बनाई मिली। तो उन्हें लगा कि फर्म चलाने का मतलब है फर्म में काम करने वाले सारे नौकर चाकरों को हांको और काम कराओ। किसी को पुचकार दो किसी को फटकार दो। तो साहब ये दौर भी चलता रहा। नए मालिकों को भी लगा कि ये तो अच्छा है। ये नौकर लोग तो चीं नहीं बोलते। चाहे जो करो भागते भी नहीं हैं और मन लगा कर काम करते हैं। ऊपर से दिनरात मालिकों का जिन्दाबाद बोलते हैं। कभी कभी इक दुक्का लोगों का जमीर जाग गया। उन्हें आत्मसम्मान की सूझने लगी। फर्म छोड़कर बैठ गये। किसी ने अपनी खुद की फर्म डाल ली। साल दो साल चली फिर माफी आफी मांग के वापस आ गये। हमारी फर्म की एक खास बात है। रूठे को मनाते नहीं और लगे तो एकाध धक्का और दे देते हैं मगर माफी मांग ले तो माफ भी कर देते हैं।
साहब बड़ी फर्म है। पूरे देश में ग्राहक हैं। पूरे देश में सेल्समैन हैं। कभी किसी स्टेट में कब्जा हो जाता है तो कभी किसी स्टेट से छूट भी जाता है। पहले तो पूरे देश में एक छत्र राज्य था जनाब। हम सबके जलवे थे। फिर फर्म की पालिसी में कुछ फेर बदल हुआ तो जनता को लगा कि नई फर्मों को मौका देना चाहिए। तो जब से ये अलग अलग राज्य बने और हमारे मालिक लोगों की पकड़ कमजोर हुई। समय के साथ अपने को बदला नहीं तो हो गई दुर्गत। अब जिनको दरवाजे में खड़े नहीं होने देते थे उनके साथ साझेदारी फर्म बनाना पड़ रही है। दो कौड़ी के लोग अब ठाठ के साथ हमारे मालिकों के साथ बैठते हैं और वो कुछ नहीं कर पाते। अब यही तो होता है साहब यहां धंधा बिगड़ा उधर ग्राहक भागा। जो हमारे ग्राहक थे जो हमारे सेल्समैन थे वो दूसरों का मंजन बेच रहे हैं। हमी को धंधा सिखा रहे हैं। अब हम नौकर लोग समझते सब हैं मगर क्या करें किसके सामने रोना रोयें। सामने देख रहे हैं कि फर्म की लुद्दी सुट रही है मगर चुप हैं। क्या करें।
मगर साहब अपने देश की ग्राहकी भी अजीब है। एक बार उसी साबुन को मना कर देंगे दूसरी बार उसी साबुन से घिस धिस के नहाएंगे। वाह रे देश। आप तो जानते हैं कि दो बार हमारी फर्म की दुकान में ताला लग चुका है। मगर फिर हमारी फर्म चल निकली। बस कुछ नहीं। हमारी मालकिन घर से निकलीं। उनने कहा देखती हूं कैसे हमारा साबुन नहीं बिकता। अरे साहब क्या बताएं आपकों जनता तो टूट पड़ी। हम खरीदेंगे हम खरीदेंगे। अब हम सब सेल्समैन लोग भी भौंचक। अरे वाह यार अपनी फर्म तो फिर चल गई। बस फिर क्या था हम लोगों ने भी अपनी दुकानें खोल लीं। ग्राहक आने लगे।
अभी क्या हुआ कि मालकिन का लड़का बड़ा हो गया। सीधा साधा है। मालकिन ने सोचा है कि आगे से फर्म का काम भैया सम्हालेंगे। आप सब लोग बढिया मेहनत करो। तो हमें कौन बुराई है। भैया खूब आगे बढ़ंे फर्म सम्हालें। न हमारी फर्म है न हम फर्म के मालिक। आप लोग हाई कमान हो। जैसा कहो। हमें आपने कभी इस लायक बनने नहीं दिया कि हमारे कारण फर्म का साबुन बिके। आपकी फर्म आपका मुनाफा। हम तो मालिकों का हुकुम मानते हैं। नौकर आदमी।
हमने भी कहना शुरू कर दिया है कि भैया ही फर्म के मालिक बनें। वो हमें सिखायें कि साबुन कैसे बेचें। हमें उनका मार्गदर्शन चाहिए। हम उनके दिखाए रास्ते पर चलेेंगे।
चमचागिरी की हद है भैया। हमें तो अपने पर शर्म आती है मगर क्या करें हमारी रोजी रोटी तो फर्म से है। तो भैया जी जिन्दाबाद।

Thursday, December 15, 2011

अन्ना के ईमानदार चेले

अन्ना के ईमानदार चेले
हमारे शहर में एक मजदूर नेता थे। वो अभी भी हैं पर अब उनके पास मजदूर नहीं हैं। वे मजदूरविहीन हैं और शरीर की अशक्तता और आदत से मजबूर हैं। जब वे शबाब पर थे तो समय समय पर उन्हें भी शहर बंद कराना होता था। उनकी ताकत कम थी। उनके चेले सभी सरकारी मुलाजिम थे। जो शहर बंद नहीं करवा पाते थे। उस समय उन्होंने एक फार्मूला निकाला। निकाला क्या एक बार अचानक निकल गया। वो बंद के एक दिन पहले मशाल जुलूस निकालते थे। मशाल जुलूस जब शहर के बीच से गुजरता था तो व्यापारी डर जाते थे। लगता था कि ये मशालें यदि आग लगाने के काम में लगा दी गईं तो अपना सत्यानाश हो जाएगा। बस दूसरे दिन व्यापारी अपनी दुकानें बंद रखते थे। बंद सफल हो जाता था। ये फार्मूला काफी दिन चला। फिर लोगों को समझ आ गया कि ये मामला क्या है। उसके बाद मजदूर नेता का बंद नहीं हुआ।
अन्ना का अनशन भी शहर बंद करने के पहले के मशाल जुलूस जैसा है। इस बार 11 दिसंबर वाला छुट्टी वाला अनशन था। काफी कम भीड़ थी। लोग भी एक दिन के मेले में नहीं जाते। दो तीन दिन तो माहौल बनाने में निकल जाते हैं। फिर ठंड के दिन। सप्ताह भर काम करने के बाद सुस्ताने को एक दिन मिला। उसमें अन्ना जी के यहां जाओ। घर में टी वी पर न देख लो। सो लोग रजाईयों के अंदर लुके हुए टी वी पर भ्रष्टाचार मिटाते रहे। अन्ना के चेले बहुत होशियार हैं। उन्हें समझ में आ गया कि ठंड में जनता भ्रष्टाचार का विरोध नहीं करेगी। विरोध ठंडा पड़ जाएगा। इसीलिए कहा गया कि यदि ठंड ज्यादा पड़ी तो अनशन बंबई में होगा। बंबई में तो होगा पर रालेगण सिद्धी में क्यों न हो ? क्योंकि वहां रामलीला मैदान वाला माहौल नहीं बनेगा। मीडिया का मसाला तो चाहिए पर दिल्ली में।
मैं काफी दिनों से खोज रहा हूं कि कोई ऐसा आदमी मिले जो चाहता हो कि भ्रष्टाचार फले फूले। हर कोई भ्रष्टाचार के विरोध में है। कल मैं सब्जी खरीद रहा था तो सब्जी वाला बोल रहा था कि वो भी भ्रष्टाचार के विरोध में है। वो अन्ना का समर्थक निकला। मुझे तो अपने आप से बहुत ग्लानि हुई। ये सब्जीवाला तो मुझसे कहीं आगे है। एक मैं हूं जो कुछ नहीं कर रहा हूं और एक ये सब्जीवाला है जो भ्रष्टाचार के विरूद्ध डट कर खड़ा है। बहरहाल मैंने एक किलो आलू लिए और घर आ गया। घर में आकर देखा कि आलू एक किलो से कम थे। आलू वाले ने डंडी मार दी थी। मैंने देखा कि उसने कई सड़े आलू अच्छे आलुओं के बीच रख दिये थे। मैं उसकी बातों में उलझा रहा और वो अपना काम करता रहा।
संवाद माध्यमों के लोग सबसे उत्साह के साथ अन्ना के साथ हैं। बल्कि ये कहा जाए कि ये आंदोलन मीडिया के भरोसे ही चल रहा है। मगर मीडिया अपने ब्रेक कर कर के विज्ञापन के पैसे कमाए जा रहा है। पिछले चुनावों से पैसा दो समाचार छपवाओ वाला काम भी चालू हो गया है। पेड न्यूज। मगर अन्ना के साथ हैं।
सवाल ये है कि भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन भ्रष्टों के विरूद्ध क्यों नहीं है। आंदोलन मनमोहन सिंह और राहुल के विरूद्ध क्यों है। चिदंबरम और सिब्बल के विरूद्ध क्यों है। जो लोग समाज के घोषित अपराधी हैं। सिद्ध भ्रष्ट हैं आंदोलन उनके विरूद्ध क्यों नहीैं उनके घरों के सामने प्रदर्शन क्यों नहीं। उनके कार्यालयों के सामने प्रदर्शन क्यों नहीं। कुछ विभाग ऐसे हैं जिनमें यदि घर का कोई आदमी भरती हो जाता है तो पूरे मोहल्ले में मिठाई बंटती है। कहा जाता है कि तनखाह तो ठीक है पर ऊपरी कमाई इतनी है कि सात पुश्तें सुख से रहंेगीै। ऐसे विभागों के सिद्ध भ्रष्टों के विरूद्ध आंदोलन क्यों नहीं ?
ंहमारे समाज में सब जानते हैं कि भ्रष्ट कौन है। किस किस विभाग में भ्रष्टाचार के मौके ज्यादा हैं। फिर भ्रष्टाचार की ताली एक हाथ से नहीं बजती। केवल पैसा खाया नहीं जाता। पैसा खिलाया भी जाता है। पैसा खिलाने वाला इतना भोला बन जाता है जैसे उसका कोई दोष नहीं है। सारा दोष खाने वाले का है। ईमानदार वो है जिसे बेईमान होने का मौका नहीं मिला। बेचारा ईमानदार।
.................................सुखनवर