कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना
इसे कहते हैं शालीनता। सज्जनता। बुढ़ापे की नैतिकता। बुढ़ापे का जा तुझे माफ किया वाला भाव। राजदीप सरदेसाई को भी कारण नहीं मिला कि आखिर आडवाणी ने सॉरी क्यों कहा। जब बोफोर्स कांड हुआ तो यही आरोप था कि पैसा कमाया गया और उसे विदेशी बैंकों में रखा गया। देश की जनता को यह भ्रम दिया गया कि यह पहला अवसर है जब रक्षा सौदे में पैसा खाया जा रहा है। जबकि जनता को शिक्षित किया जाना चाहिए था कि भाईयों हथियार खरीद में पैसा खाने की सुदीर्घ परंपरा है और हमने केवल परंपरा और दलाली संस्कृति का निर्वाह किया है। दूसरी बात यह है कि पैसा कमाया है तो कहीं न कहीं तो रखा जाएगा। भारत के किस बैंक में रखें ? पूरी दुनिया में चोरों ने एक देश तय किया है स्विट्जरलैंड जहां के बैंकों में पैसा रखा जा सकता है। खातेदार का नाम नहीं बताने की गारंटी है। दुनिया भर के दलाल, नेता, सेनापति से लेकर भारत के पी डब्लू डी के इंजीनियर जैसे सेवक सभी इन बैंकों में पैसा रखते हैं। अभी पिछले चुनावों में जब भाजपा को मुद्दों का टोटा था और आडवाणी जी को प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा करना था तो मुद्दों की तलाश की गई उसमें मंथन में यह बात निकली कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस लाया जाए तो देश का कल्याण हो जाएगा। मुद्दा उठाने वालों के बीच में यह राय बनी कि यदि अपन यह मामला उठा लेंगे तो सहज ही इस आरोप को बरका सकते हैं कि अपना भी पैसा स्विस बैंक में रखा है। दूसरे हमें भी मालूम है और उन्हें भी मालूम है कि स्विस बैंकों से पैसा न वापस आ सकता है और न पैसा रखने वालों का नाम पता चल सकता है। इसी आधार पर पैसा वहां रखा गया है वरना सारे चोरों के उनके खुदके देशों के बैंक क्या कम थे, वहां ही न रख लेते। दूसरा यह कि भारत के गरीबों को उल्टी सीधी रकम बोलकर चमकाया जाए। भारत के गरीब गुरबा के लिये लाख पचास हजार रूपये बहुत होते हैं। एक मोटर साईकिल के लिये भारत के वीर सपूत अपनी ब्याहता को जला कर मार डालते हैं। ऐसी महान संस्कृति वाले देश में यदि यह कहा जाए कि लाखों हजार करोड़ रूपये विदेशों में जमा हैं और उन्हें वापस लाया जाए तो जनता हमसे प्रभावित हो जाएगी। मगर क्या बताएं शाब जी कि भारत की जनता ने यह समझा कि भाजपा जिनका विरोध कर रही है उनके पास यह पैसा है। और पैसे वाली की इज्जत करने की भी हमारे यहां सुदीर्घ परंपरा है। सो जनता ने पैसे वालों की इज्जत की और कांग्रेस को जिता दिया। चुनाव में जिस तरह से पैसा खर्च होता है उससे भी यह पता चल जाता है कि चुनाव लड़ने वालों के पास भरपूर पैसा है और इसी चुनाव में झांेकने के लिए रखा गया है। जबसे चुनाव आयोग ने नियम कानून कड़े कर दिये हैं तबसे तो पैसा सीधे नकद ही बांटा जाता है। तो जनता का पैसा जनता के चुनाव में जनता पर खर्च हुआ। जिसके पास पैसा है वही चुनाव लड़ सकता है यह अलिखित नियम हमारे प्रजातंत्र में है।
अभी भाजपा ने एक कमेटी की जांच रिपोर्ट प्रकाशित कर दी जिसमें कहा गया है कि 25 लाख करोड़ रूपये काले धन के रूप में विदेशी बैंकों में जमा हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि सोनिया गांधी राजीव गांधी का भी पैसा स्विस बैंक में जमा है। सोनिया जी ने एक पत्र लिखकर आडवानी जी से कहा कि आपने हमारा नाम क्यों लिया ? दिस इज़ वैरी बैड। इसके जवाब में आडवाणी जी ने कहा- ’सारी’ आगे कहा बताया जाता है कि आडवाणी जी ने कहा कि सोनिया जी हमने तो पहले ही जांच रिपोर्ट पहले ही लीक कर दी थी वैसे भी उसमें छुपाने और लीक करने जैसा कुछ था नहीं। आपको उस लीकेज के समय ही जनता को बता देना चाहिए था कि आपका पैसा स्विस बैंक में नहीं है। बात इतनी आगे न बढ़ती।
अब कुछ और सवाल भी उठ रहे हैं। मसलन सोनिया जी ने चिठ्ठी क्यों लिखी ? फोन क्यों नहीं किया ? क्या फोन टेपिंग का डर था ? या इस बात का डर था कि भविष्य में आडवाणी जी कह दें कि सोनिया जी ये ये कहा जबकि उनने न कहा हो। सोनिया जी ने चिठ्ठी में ऐसा क्या लिखा कि आडवाणी जी एकदम भीगी बिल्ली बनकर माफी मांगने लगे। संभवतः चिठ्ठी में ये लिखा होगा।
प्रिय मिस्टर आडवाणी,
मुझे पता लगा है कि आपकी पार्टी ने एक जांच रिपोर्ट में यह कहा है कि मेरा और मेरे स्वर्गीय पति का बोफोर्स की दलाली में कमाया गया पैसा स्विस बैंक में रखा है। यह बात बहुत अनैतिक है और खेल के नियमों के विरूद्ध है। आप भी जानते हैं और हम तो खैर जानते ही हैं क्योंकि हम सरकार चला रहे हैं कि किसका कितना पैसा कहंा रखा है और वो पैसा कहां से आया है। आपने भी केन्द्र की सरकार चलाई है और यह बात आपको बताने की जरूरत नहीं है कि सरकार की ताकत क्या होती है। पैसा कमाने में बहुत मेहनत लगती है और बहुत बदनामी झेलना पड़ती है। पैसा जब्त करने में सरकार को कोई मेहनत नहीं करना पड़ती पर जिसका पैसा जब्त होता है उसे एक बार फिर बदनामी झेलना पड़ती है। इसीलिए हम सबकी भलाई इसी में है कि हम खेल के नियमों का पालन करें और पेनाल्टी किक लगाने का मौका न दें। मैं केवल कल तक इंतजार करूंगी। स्विस बैंकों में किसका पैसा जमा है इसकी सूची सरकार के पास है। कुछ नामों की जानकारी आपको एक छोटी से सूची में भेज रही हूं। मुझे विश्वास है कि सूची पढ़ने के बाद आपके मुंह से यकायक सॉरी सॉरी निकलने लगेगा।
आडवाणी जी ने चिठ्ठी पढ़ी और सॉरी कह दिया। ..........................................................................सुखनवर
Friday, February 25, 2011
Wednesday, September 8, 2010
भगवान की होम डिलीवरी
भगवान की होम डिलीवरी
टी वी में विज्ञापन चल रहा है। एक अभिनेता बाबा जी बना है। कह रहा है कि हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त करने का सीधा सादा रास्ता हाथ आ चुका है। आपने आज तक बहुत से विज्ञापन देखे होंगे पर इस विज्ञापन जैसा न देखा होगा। मुझे काफी दिनों से इस विज्ञापन का इंतजार था। जब सब बिक रहा है तो भगवान न बिकें ऐसा कैसे हो सकता है। हमारे देश में राजनेता धर्म की जैसी मार्केटिंग कर रहे हैं उससे ये तय था कि भगवान पर श्रद्धा बिकेगी। बस दाम का इंतजार था। वो भी लग गया। रू 3400 का लाकेट और रू 100 डाकखर्च। भगवान की होम डिलीवरी। रू 3500 दीजिये और सीधे हनुमान जी का रक्षा कवच लगा कर शान से घूमिये। कोई विपत्ति आई तो आपको कुछ नहीं करना है। हनुमान जी को आप एडवांस दे चुके हैं। वो पैसा लेकर दगाबाजी नहीं करेंगे। वो आपकी रक्षा करेंगे। विज्ञापन में काफी उदाहरणों और गवाहों के माध्यम से बताया गया है कि उन्हें कैसे लाभ हुआ। कोई छात्र परीक्षा पास हो गया, कोई शेयर बाजार में डूब गया था उबर गया, कोई की नौकरी खतरे में पड़ गई थी उबर गया सभी रू 3500 खर्च करने पर। ये हमारी भारतीय संस्कृति है। ये हमारे भारतीय संस्कृति के रक्षक हैं। इनकी दृष्टि में भगवान को बेचना कतई गलत नहीं है। धर्म का काम है। आखिर आडवाणी और उनकी पार्टी क्या कर रहे हैं। अभी सोनिया गांधी ने पलटवार किया। वे महाकाल पंहुची और पूजा की। कोई रोक न पाया। अब क्या कहेंगे। विदेशी विधर्मी महिला ने महाकाल की पूजा की तो भारतीय संस्कृति का फायदा हुआ या नुक्सान ।
यदि भगवान का सीधा आशीर्वाद मिल चुका है तो हमें कुछ लाख रक्षा कवच खरीद लेना चाहिये। भारतीय सेना के जो जवान सीमा पर हैं उन सबको ये लाकेट पहनाया जा सकता है। कश्मीर में आतंकवाद से निपटने में भी ये कारगर हो सकता है। गोली बंदूक का कोई झंझट नहीं। वहां से एके 47 चली यहां हनुमान लाकेट से रोक ली। वहां से हैंडग्रेनेड फेंका यहां से लाकेट ने छेका। कभी कभी लगता है कि जब सब लाकेट पहन सकते हैं तो हमारा दुश्मन भी पहन सकता है। तब क्या होगा। भगवान किसकी रक्षा करेंगे ? कुछ ही दिन में सारे आतंकवादी नागपुर मंे आर एस एस कार्यालय के सामने खड़े होकर आत्मसमर्पण कर देंगे। कहंेगे हम सन्यास लेते हैं सुदर्शन जी। जब आप 3500 रू में हमारी लाखों की राइफल बेकार कर देते हैं तो अब हम जी के क्या करेंगे।
सबसे अच्छी बात ये है कि इस लाकेट को सीधे हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त है ये बात बार बार जोर देकर कही जा रही है। इस दावे के पीछे कौन सा प्रमाण है ? पर हमारे देश में प्रमाण और तर्क की कोेई जरूरत नहीं है। एक दिन योजना बनाकर खबर फैला दी जाती है कि गणेश जी दूध पी रहे हैं। लाखों लोग मान लेते हैं। धर्म की राजनीति करने वाले राजनेता खुश होते हैं और इस बात को प्रमाणिक बनाते हैं कि हां गणेश जी दूध पी रहे हैं। पर सचाई पर बात नहीं करते। गणेश जी दूध पी रहे हैं तो पहले क्यों नहीं पी रहे थे और अब उस दिन के बाद से क्यों नहीं पी रहे हैं ? कोई तर्क नही। एक बाबाजी बना अभिनेता अभिनय करते हुए बार बार विश्वास दिला रहा है कि ये लाकेट हनुमान जी से सीधे आशीर्वाद प्राप्त है याने ये बाबा जी का रोज का संपर्क हनुमान जी से है। जितने लाकेट प्रतिदिन बनते हैं हनुमान जी आकर उसे अभिमंत्रित कर देते हैं। पाठकों को याद होगा कि तुलसीदास जी की रामचरितमानस को भगवान ने इसी शैली में अधिकृत किया था। क्या हनुमान जी भी इस बाजार की दुनिया में हिस्सेदार हो गये हैं और लाकेट बेचकर कमाई कर रहे हैं?
एक होता है श्री यंत्र। इसे घर के दरवाजे पर ठोंक लीजिये। बस सारी बाधायें समाप्त। बहुत सस्ता मिलता है। बड़ी श्रद्धा से लोग खरीदते हैं। श्री यंत्र से फायदा न हो तो वास्तु वाले दुकानदार आ जायेंगे। अपना दरवाजा उखड़वा लो। दायें हो तो बायें लगा लो। बायें हो तो पीछे लगा लो। आज कल तो किसी के घर जाओ और घर में मिस्त्री काम करता दिखे तो समझ लीजिये कि वास्तुदोष हो चुका है। वास्तु शास्त्री इस घर में घुस चुका है। वो घर को तुड़वा कर ही रहेगा। इससे लगता है कि अयोध्या के महल में काफी वास्तुदोष रहा होगा। रावण का महल भी काफी वास्तु दोष वाला होगा। सुग्रीव बाली का महल भी वास्तु दोष वाला रहा होगा। उस समय उन लोगों को भी समझ में आ गया होगा पर कुछ कर नहीं पाये। दरअसल इन महलों में जो चीफ इंजीनियर, सुपरवाइजर, चौकीदार वगैरा होते होंगे वो काफी भाग्यशाली रहे होंगे। बिना बाधा के काम करते होंगे क्योंकि उस समय वास्तुशास्त्री नहीं थे।
बहुत आश्चर्य है कि आजकल पी डब्लू डी और प्रधानमंत्री सड़क निर्माण योजना जैसे विभागों में चीफ आफ दी वास्तुशास्त्र, असिस्टेंट वास्तुशास्त्री, जूनियर वास्तुशास्त्री जैसे पद क्यों नहीं बने हैं। अभी जो पुल सड़क खराब निर्माण के कारण टूट जाते हैं वो वास्तु के सिर पर थोपे जा सकते हैं। जैसे पुल की दिशा गलत थी। सड़क पीली मिट्टी पर बनी थी। इसे काली मिट्टी पर बनाते और उपर से गोबर लीप देते तो सड़क पचास साल चलती। ..................................................सुखनवर
टी वी में विज्ञापन चल रहा है। एक अभिनेता बाबा जी बना है। कह रहा है कि हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त करने का सीधा सादा रास्ता हाथ आ चुका है। आपने आज तक बहुत से विज्ञापन देखे होंगे पर इस विज्ञापन जैसा न देखा होगा। मुझे काफी दिनों से इस विज्ञापन का इंतजार था। जब सब बिक रहा है तो भगवान न बिकें ऐसा कैसे हो सकता है। हमारे देश में राजनेता धर्म की जैसी मार्केटिंग कर रहे हैं उससे ये तय था कि भगवान पर श्रद्धा बिकेगी। बस दाम का इंतजार था। वो भी लग गया। रू 3400 का लाकेट और रू 100 डाकखर्च। भगवान की होम डिलीवरी। रू 3500 दीजिये और सीधे हनुमान जी का रक्षा कवच लगा कर शान से घूमिये। कोई विपत्ति आई तो आपको कुछ नहीं करना है। हनुमान जी को आप एडवांस दे चुके हैं। वो पैसा लेकर दगाबाजी नहीं करेंगे। वो आपकी रक्षा करेंगे। विज्ञापन में काफी उदाहरणों और गवाहों के माध्यम से बताया गया है कि उन्हें कैसे लाभ हुआ। कोई छात्र परीक्षा पास हो गया, कोई शेयर बाजार में डूब गया था उबर गया, कोई की नौकरी खतरे में पड़ गई थी उबर गया सभी रू 3500 खर्च करने पर। ये हमारी भारतीय संस्कृति है। ये हमारे भारतीय संस्कृति के रक्षक हैं। इनकी दृष्टि में भगवान को बेचना कतई गलत नहीं है। धर्म का काम है। आखिर आडवाणी और उनकी पार्टी क्या कर रहे हैं। अभी सोनिया गांधी ने पलटवार किया। वे महाकाल पंहुची और पूजा की। कोई रोक न पाया। अब क्या कहेंगे। विदेशी विधर्मी महिला ने महाकाल की पूजा की तो भारतीय संस्कृति का फायदा हुआ या नुक्सान ।
यदि भगवान का सीधा आशीर्वाद मिल चुका है तो हमें कुछ लाख रक्षा कवच खरीद लेना चाहिये। भारतीय सेना के जो जवान सीमा पर हैं उन सबको ये लाकेट पहनाया जा सकता है। कश्मीर में आतंकवाद से निपटने में भी ये कारगर हो सकता है। गोली बंदूक का कोई झंझट नहीं। वहां से एके 47 चली यहां हनुमान लाकेट से रोक ली। वहां से हैंडग्रेनेड फेंका यहां से लाकेट ने छेका। कभी कभी लगता है कि जब सब लाकेट पहन सकते हैं तो हमारा दुश्मन भी पहन सकता है। तब क्या होगा। भगवान किसकी रक्षा करेंगे ? कुछ ही दिन में सारे आतंकवादी नागपुर मंे आर एस एस कार्यालय के सामने खड़े होकर आत्मसमर्पण कर देंगे। कहंेगे हम सन्यास लेते हैं सुदर्शन जी। जब आप 3500 रू में हमारी लाखों की राइफल बेकार कर देते हैं तो अब हम जी के क्या करेंगे।
सबसे अच्छी बात ये है कि इस लाकेट को सीधे हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त है ये बात बार बार जोर देकर कही जा रही है। इस दावे के पीछे कौन सा प्रमाण है ? पर हमारे देश में प्रमाण और तर्क की कोेई जरूरत नहीं है। एक दिन योजना बनाकर खबर फैला दी जाती है कि गणेश जी दूध पी रहे हैं। लाखों लोग मान लेते हैं। धर्म की राजनीति करने वाले राजनेता खुश होते हैं और इस बात को प्रमाणिक बनाते हैं कि हां गणेश जी दूध पी रहे हैं। पर सचाई पर बात नहीं करते। गणेश जी दूध पी रहे हैं तो पहले क्यों नहीं पी रहे थे और अब उस दिन के बाद से क्यों नहीं पी रहे हैं ? कोई तर्क नही। एक बाबाजी बना अभिनेता अभिनय करते हुए बार बार विश्वास दिला रहा है कि ये लाकेट हनुमान जी से सीधे आशीर्वाद प्राप्त है याने ये बाबा जी का रोज का संपर्क हनुमान जी से है। जितने लाकेट प्रतिदिन बनते हैं हनुमान जी आकर उसे अभिमंत्रित कर देते हैं। पाठकों को याद होगा कि तुलसीदास जी की रामचरितमानस को भगवान ने इसी शैली में अधिकृत किया था। क्या हनुमान जी भी इस बाजार की दुनिया में हिस्सेदार हो गये हैं और लाकेट बेचकर कमाई कर रहे हैं?
एक होता है श्री यंत्र। इसे घर के दरवाजे पर ठोंक लीजिये। बस सारी बाधायें समाप्त। बहुत सस्ता मिलता है। बड़ी श्रद्धा से लोग खरीदते हैं। श्री यंत्र से फायदा न हो तो वास्तु वाले दुकानदार आ जायेंगे। अपना दरवाजा उखड़वा लो। दायें हो तो बायें लगा लो। बायें हो तो पीछे लगा लो। आज कल तो किसी के घर जाओ और घर में मिस्त्री काम करता दिखे तो समझ लीजिये कि वास्तुदोष हो चुका है। वास्तु शास्त्री इस घर में घुस चुका है। वो घर को तुड़वा कर ही रहेगा। इससे लगता है कि अयोध्या के महल में काफी वास्तुदोष रहा होगा। रावण का महल भी काफी वास्तु दोष वाला होगा। सुग्रीव बाली का महल भी वास्तु दोष वाला रहा होगा। उस समय उन लोगों को भी समझ में आ गया होगा पर कुछ कर नहीं पाये। दरअसल इन महलों में जो चीफ इंजीनियर, सुपरवाइजर, चौकीदार वगैरा होते होंगे वो काफी भाग्यशाली रहे होंगे। बिना बाधा के काम करते होंगे क्योंकि उस समय वास्तुशास्त्री नहीं थे।
बहुत आश्चर्य है कि आजकल पी डब्लू डी और प्रधानमंत्री सड़क निर्माण योजना जैसे विभागों में चीफ आफ दी वास्तुशास्त्र, असिस्टेंट वास्तुशास्त्री, जूनियर वास्तुशास्त्री जैसे पद क्यों नहीं बने हैं। अभी जो पुल सड़क खराब निर्माण के कारण टूट जाते हैं वो वास्तु के सिर पर थोपे जा सकते हैं। जैसे पुल की दिशा गलत थी। सड़क पीली मिट्टी पर बनी थी। इसे काली मिट्टी पर बनाते और उपर से गोबर लीप देते तो सड़क पचास साल चलती। ..................................................सुखनवर
Sunday, November 29, 2009
शेर कुत्ते बने
शेर कुत्ते बने
शेर कुत्तों के समान लड़ रहे हैं। एक दूसरे पर भोंक रहे हैं और जिस तिस को काटने को दौड़ रहे हैं। शेर चुनाव हार चुका है। शेर का भतीजा भी चुनाव हार चुका है। पर वो गर्व से फूल कर फटा जा रहा है। मीडिया ने उसे ऐसा हीरो बनाया जैसे उसकी सरकार बन गई हो। 13 सीटें जीतकर वो ऐंठ रहा है। जिनने सैकड़ों सीटें जीतीं और जो सरकार बना रहे हैं या बिगाड़ रहे हैं उनकी कोई पूछ नहीं है। जिनने शेर की पूंछ मरोड़ी उसकी पूछ है।
मीडिया के युवा उत्साही बता रहे हैं कि पिछले चालीस सालों से शेर का एकछत्र राज्य है। पहली बार यह छिन्न भिन्न हुआ है। ये एक छत्र राज्य कैसा है ? ये छत्रपति कहां से शेर बन गये ? ये मुम्बई के कपड़ा मजदूरों के विशाल और अजेय संगठन को तोड़ने के पैदा किये गये गंुडे थे। उस समय टेªड यूनियन का जमाना था। बम्बई से कामरेड एस ए डांगे ने अधिकतम मतों से संासद बनने का रिकार्ड बनाया था। बम्बई का कपड़ा मजदूर अपने हितों के लिये भी लड़ा और अंग्रेजों के खिलाफ भी लड़ा। ऐसे कपड़ा मिल मजदूर आंदोलन को तोड़ना था। इसके लिये बहुत कमीने आंदोलन की जरूरत थी। मुम्बई मराठियों की, दक्षिण भारतीयों को मारो, कपड़ा मिल मजदूरों के नेताओं की हत्या कर दो, कपड़ा मिल मजदूरों के आंदोलन को तोड़ो, कपड़ा मिल मालिकों से पैसा उलीचो और उनका काम करो इसके लिये शिवसेना बनाई गई थी। इसीलिये ये चुनाव नहीं लड़ती थी। जिनने बनवाई थी उनके खिलाफ ये चुनाव कैसे लड़ते ? आज भी इनका यही काम है। दुकानें, मकान जमीन खाली कराना, उनपर कब्जा करना, हर सौदे में कमीशन खाना। ये पवित्र राष्ट्रवादी कार्य ये करते हैं। ये अपनी मांद में घुसे बैठे रहते हैं। वहीं से दहाड़ते रहते हैं। इनसे डरता कौन है ? वो लोग जो सबसे डरते हैं। इनसे भी डरते हैं। सीधे सादे नौकरीपेशा लोग। काम धंधे से लगे लोग। रोजी रोटी कमाने में लगे लोग। जब तक सिर पर न आ जाये तब तक झगड़ा बरकाते हैं। सड़क पर यदि पत्थर पड़ा हो तो बरका कर चले जाते हैं। सामान्य मध्यमवर्गीय आचरण है। इससे मुम्बई के शेरों को ये लगता है कि मुम्बई में वे बहुत लोकप्रिय हैं। मुम्बई में किसी तरह जी रहे हिन्दी प्रदेशों के मजदूरों पर हमला करके ये शूरवीर बनते हैं। ये महाराष्ट्र तो दूर मुम्बई से भी बाहर नहीं निकलते। मुम्बई में बैठकर कश्मीर के उग्रवादियों को चुनौती देते हैं। हम तो उस दिन की राह देख रहे हैं जिस दिन ये शूरवीर श्रीनगर जाकर उग्रवादियों को चुनौती देंगे। मगर ये दिन कभी नहीं आएगा। मुम्बई के चुनाव परिणाम बार बार बताते हैं कि ये वहां चुनाव नहीं जीतते। अपनी गुंडागिरी को ये अपनी लोकप्रियता मानते हैं।
बहुत बार गंुडों डकैतों के गिरोहों में विद्रोह हो जाता है। कोई नौजवान उठ खड़ा होता है और कहता है कि अब मैं गद्दी सम्हालूंगा। अब तुम बूढ़े हो गये हो। जब हम कमाते हैं तो हम ही सरदार बनेंगे। बाल ठाकरे को चुनौती दी उसी के भतीजे ने। उसने कहा मैं सरदार बनूंगा। बाल ठाकरे का कहना था कि सरदार मेरा लड़का बनेगा। भतीजे का कहना था कि गुंडो की सरदारी भला आदमी नहीं कर सकता। उद्धव शरीफ आदमी है। उसके बस का नहीं है नंगों की सरदारी करना। मैं पैदायशी गुंडा हूं। मैं बनूंगा सरदार। बात नहीं मानी गई तो उसने अपना गिरोह अलग बना लिया।
हमारे देश में गंुडो से डरकर उनकी इज्जत करने का पुराना रिवाज है। फिर गुंडों के इलाके में रहने वाले पुलिस की अपेक्षा गुंडों की फीस चुकाना बेहतर समझते हैं। इसीलिये अमिताभ बच्चन भी बाल ठाकरे के घर हो आते हैं। करण जौहर जाकर गुंडे के पंाव पकड़ लेते हैं। भैया हमें धंधा करने दो बदले में अपनी फिरौती ले लो। अशोक चव्हाण कहते हैं कि करण जौहर हमारे पास क्यों नहीं आए। आते तो हम पूरी तरह से रक्षा करते। करण जौहर ही नहीं मुम्बई के बच्चे को भी पता है कि अशोक चव्हाण के भरोसे उनकी कितनी रक्षा होती। जब यूपी के लोग मुम्बई में गली गली हमलों का शिकार हो रहे थे, जब पूना और नासिक में लाइब्रेरी जलाई जा रहीं थीं और लेखक हमलों का शिकार हो रहे थे तब भी यही सरकार थी। इनने कितनी रक्षा की यह सबको पता है।
महाराष्ट्र का खेल पूरे देश को समझ में आ गया। पहले पिटवाओ फिर मरहम लगाओ। पीटने वाला बुरा बनेगा। मरहम लगाने वाला भला कहलायेगा। फिर महाराष्ट्र मंे तो जनता के पास कोई विकल्प भी नहीं था। उसे तो मरहम लगाने वाले को जिताना ही पड़ेगा। पीटने वाले को हराना ही पड़ेगा। मरहम वाले का काम बन गया। ये चुनाव तो निपट गया। अब पांच साल बाद देखेंगे। बहुत क्रू्र और बेशर्म राजनीति है।
-सुखनवर
शेर कुत्तों के समान लड़ रहे हैं। एक दूसरे पर भोंक रहे हैं और जिस तिस को काटने को दौड़ रहे हैं। शेर चुनाव हार चुका है। शेर का भतीजा भी चुनाव हार चुका है। पर वो गर्व से फूल कर फटा जा रहा है। मीडिया ने उसे ऐसा हीरो बनाया जैसे उसकी सरकार बन गई हो। 13 सीटें जीतकर वो ऐंठ रहा है। जिनने सैकड़ों सीटें जीतीं और जो सरकार बना रहे हैं या बिगाड़ रहे हैं उनकी कोई पूछ नहीं है। जिनने शेर की पूंछ मरोड़ी उसकी पूछ है।
मीडिया के युवा उत्साही बता रहे हैं कि पिछले चालीस सालों से शेर का एकछत्र राज्य है। पहली बार यह छिन्न भिन्न हुआ है। ये एक छत्र राज्य कैसा है ? ये छत्रपति कहां से शेर बन गये ? ये मुम्बई के कपड़ा मजदूरों के विशाल और अजेय संगठन को तोड़ने के पैदा किये गये गंुडे थे। उस समय टेªड यूनियन का जमाना था। बम्बई से कामरेड एस ए डांगे ने अधिकतम मतों से संासद बनने का रिकार्ड बनाया था। बम्बई का कपड़ा मजदूर अपने हितों के लिये भी लड़ा और अंग्रेजों के खिलाफ भी लड़ा। ऐसे कपड़ा मिल मजदूर आंदोलन को तोड़ना था। इसके लिये बहुत कमीने आंदोलन की जरूरत थी। मुम्बई मराठियों की, दक्षिण भारतीयों को मारो, कपड़ा मिल मजदूरों के नेताओं की हत्या कर दो, कपड़ा मिल मजदूरों के आंदोलन को तोड़ो, कपड़ा मिल मालिकों से पैसा उलीचो और उनका काम करो इसके लिये शिवसेना बनाई गई थी। इसीलिये ये चुनाव नहीं लड़ती थी। जिनने बनवाई थी उनके खिलाफ ये चुनाव कैसे लड़ते ? आज भी इनका यही काम है। दुकानें, मकान जमीन खाली कराना, उनपर कब्जा करना, हर सौदे में कमीशन खाना। ये पवित्र राष्ट्रवादी कार्य ये करते हैं। ये अपनी मांद में घुसे बैठे रहते हैं। वहीं से दहाड़ते रहते हैं। इनसे डरता कौन है ? वो लोग जो सबसे डरते हैं। इनसे भी डरते हैं। सीधे सादे नौकरीपेशा लोग। काम धंधे से लगे लोग। रोजी रोटी कमाने में लगे लोग। जब तक सिर पर न आ जाये तब तक झगड़ा बरकाते हैं। सड़क पर यदि पत्थर पड़ा हो तो बरका कर चले जाते हैं। सामान्य मध्यमवर्गीय आचरण है। इससे मुम्बई के शेरों को ये लगता है कि मुम्बई में वे बहुत लोकप्रिय हैं। मुम्बई में किसी तरह जी रहे हिन्दी प्रदेशों के मजदूरों पर हमला करके ये शूरवीर बनते हैं। ये महाराष्ट्र तो दूर मुम्बई से भी बाहर नहीं निकलते। मुम्बई में बैठकर कश्मीर के उग्रवादियों को चुनौती देते हैं। हम तो उस दिन की राह देख रहे हैं जिस दिन ये शूरवीर श्रीनगर जाकर उग्रवादियों को चुनौती देंगे। मगर ये दिन कभी नहीं आएगा। मुम्बई के चुनाव परिणाम बार बार बताते हैं कि ये वहां चुनाव नहीं जीतते। अपनी गुंडागिरी को ये अपनी लोकप्रियता मानते हैं।
बहुत बार गंुडों डकैतों के गिरोहों में विद्रोह हो जाता है। कोई नौजवान उठ खड़ा होता है और कहता है कि अब मैं गद्दी सम्हालूंगा। अब तुम बूढ़े हो गये हो। जब हम कमाते हैं तो हम ही सरदार बनेंगे। बाल ठाकरे को चुनौती दी उसी के भतीजे ने। उसने कहा मैं सरदार बनूंगा। बाल ठाकरे का कहना था कि सरदार मेरा लड़का बनेगा। भतीजे का कहना था कि गुंडो की सरदारी भला आदमी नहीं कर सकता। उद्धव शरीफ आदमी है। उसके बस का नहीं है नंगों की सरदारी करना। मैं पैदायशी गुंडा हूं। मैं बनूंगा सरदार। बात नहीं मानी गई तो उसने अपना गिरोह अलग बना लिया।
हमारे देश में गंुडो से डरकर उनकी इज्जत करने का पुराना रिवाज है। फिर गुंडों के इलाके में रहने वाले पुलिस की अपेक्षा गुंडों की फीस चुकाना बेहतर समझते हैं। इसीलिये अमिताभ बच्चन भी बाल ठाकरे के घर हो आते हैं। करण जौहर जाकर गुंडे के पंाव पकड़ लेते हैं। भैया हमें धंधा करने दो बदले में अपनी फिरौती ले लो। अशोक चव्हाण कहते हैं कि करण जौहर हमारे पास क्यों नहीं आए। आते तो हम पूरी तरह से रक्षा करते। करण जौहर ही नहीं मुम्बई के बच्चे को भी पता है कि अशोक चव्हाण के भरोसे उनकी कितनी रक्षा होती। जब यूपी के लोग मुम्बई में गली गली हमलों का शिकार हो रहे थे, जब पूना और नासिक में लाइब्रेरी जलाई जा रहीं थीं और लेखक हमलों का शिकार हो रहे थे तब भी यही सरकार थी। इनने कितनी रक्षा की यह सबको पता है।
महाराष्ट्र का खेल पूरे देश को समझ में आ गया। पहले पिटवाओ फिर मरहम लगाओ। पीटने वाला बुरा बनेगा। मरहम लगाने वाला भला कहलायेगा। फिर महाराष्ट्र मंे तो जनता के पास कोई विकल्प भी नहीं था। उसे तो मरहम लगाने वाले को जिताना ही पड़ेगा। पीटने वाले को हराना ही पड़ेगा। मरहम वाले का काम बन गया। ये चुनाव तो निपट गया। अब पांच साल बाद देखेंगे। बहुत क्रू्र और बेशर्म राजनीति है।
-सुखनवर
Saturday, September 26, 2009
बाघ घट रहे हैं
बाघ घट रहे हैं ये लोगों के लिये बड़ी चिन्ता का विषय है। अखबारों में संपादकीय लिखे जा रहे हैं। टी वी चैनल में सुंदर और सुंदरियां विलाप कर रही हैं और बाघोें के माता पिताओं को कोस रही हैं कि आप लोग परिवार नियोजन को इतनी गंभीरता से क्यों ले रहे हैं। वो मनुष्यों के लिये चलाया जा रहा है। आप लोग अपने ऊपर क्यों ले रहे हैं। मनुष्य पशु बन रहा है। ये चिन्ता का विषय नहीं है। पशु मनुष्य बन रहा है। ये चिन्ता का विषय है। यदि सभी बाघ भेड़िये मनुष्य हो गये तो मनुष्यों का क्या होगा। वे कहां जायेंगे।
मनुष्य इस मुगालते में बरसों से रहा है कि वह पशुओं से श्रेष्ठ है। आज तक कभी किसी पशु ने चुनौती नहीं दी कि मनुष्य तू हमसे श्रेष्ठ नहीं है। किसी वाद विवाद प्रतियोगिता में आजतक कोई पशु नहीं आया। मनुष्य अविजेय है। हर आदमी दूसरे आदमी को पशु कहता है पर कोई पशु किसी दूसरे पशु को मनुष्य नहीं कहता। इसीलिये तो वो पशु है। उसमें मनुष्य का एक भी गुण नहीं है। मार्क ट्वेन ने कहा कि यदि तुम किसी कुत्ते को रोटी दोगे तो वह तुम्हें काटेगा नहीं। आदमी और कुत्ते में यही फर्क है। फिर भी कुत्ते कुत्ते हैं और आदमी आदमी। कुत्ते आदमी नहीं हैं और आदमी कुत्ते नहीं हैं।
बाघ के लिए मनुष्य जाति में कोई इज्जत तो है नहीं। कभी अकेले में मिल जाए तो डर जरूर लगता है। मनुष्यों में डर के कारण इज्जत करने की प्रवृत्ति देख्ी गई है। इस लिहाज से यदि बाघ के लिए कोई इज्जत है तो भी वो कोई बड़ी गर्व की बात नहीं है। आप बाघ से डरते हैं उससे आपको जान का खतरा है इसीलिए आप उसकी इज्जत करते हैं आपको बड़ा खतरा है कि हाय ये बाघ इस दुनिया में नहीं रहेगा तो हम किससे डरेंगे।
बाघ के डरावनेपन में भी एक खूबसूरती तो है इसीलिए हम बाघ को बहुत सुंदर जानवर मानते हैं और उससे डरते हैं। मुहल्ले में कोई गुंडा रहता है तो उसे गुंडा नहीं कहते। उसे बड़े भाई कहते हैं। उसकी इज्जत करते हैं। और उसकी चिरौरी करते हैं। उसे निरंतर आभास दिलाते रहते हैं हम उसकी इज्जत करते हैं। वो भी समझता है कि ये मेरी इज्जत नहीं करते ये मुझसे डरते हैं। गुंडा मुहल्ले का बाध है और बाघ जंगल का गंुडा है। जैसे मुहल्ले में गुंडा नहीं होता तो मुहल्ला सूना लगता है वैसे जंगल में बाघ न रहे तो जंगल जंगल नहीं लगता।
इस जंगल के गंुडे के घटने से देश चिन्तित है। ये बाघ घट न पायें इसके लिए खास जंगल बनाये गये हैं। ये बाघ मर न पायें इसीलिये जंगल महकमा तैनात है जो दिन रात इनकी रक्षा में लगा है। इस महकमे में बड़े और छोटे तरह तरह के साहब हैं जो टी ए, डी ए, भोपाल, तबादला, इन्क्वायरी, चार्जशीट, साहब की विजिट, रेस्ट हाउस, सस्पेंशन, डांट डपट, ब्लड प्रेशर, डायबिटिज, बैडमिंटन, योगा, रामदेव, रविशंकर, इत्यादि के बीच बाघों की रक्षा का दायित्व सम्हाले हंै। वो लगातार इनकी आबादी बढ़ाने के लिए तरह तरह के तरीके अपना रहा है। हर रोज बाघ लाइन हाजिर होते हैं और अपनी गिनती करवाते हैं। वो निगरानी में रहते हैं। ये सब चल रहा था तभी किसी विघ्न संतोषी ने खबर फैला दी है कि पन्ना टाइगर रिजर्व में तो एक भी टाइगर नही है। एक भी यानी एक भी टाइगर नहीं है। तो टाइगर रिजर्व क्या है और उसमें तैनात लोग किसको रिजर्व कर रहे हैं। जंगल के जंगली अधिकारियों ने आश्चर्य प्रकट किया । आश्चर्य तो उन्हें भी नहीं हुआ पर उनने आश्चर्यचकित होने का लगभग विश्वसनीय अभिनय किया। साहबों की बैठकें हुईं। बैठकों में वनमंत्री ने बाघों के विलुप्त हो जाने पर चिन्ता प्रकट की। गुस्सा प्रकट किया कि जंगल केवल लकड़ी चोरी और आदिवासियों को बेदखल करने के लिए नहीं है। वरन् उनका एक और उपयोग है कि वहां बाघ को रोके रखना है। बाघ की जगह जंगल में है। बाघ जंगल मंे रहे शहर न आने पाये। यदि बाघ शहरों में रहने लगे तो मनुष्यों का रहना दूभर हो जायेगा। अस्तु बाघ भले मर जाये पर शहर न आने पाये। शहरों में हम मनुष्य रहते हैं। हम भी पहले जंगलों में रहते थे। बाघ के गले में हाथ डालकर घूमते थे। वो भी क्या दिन थे। अब तो सिर्फ याद बाकी है। उस याद को अब याद रहने दो। उसकी याद न दिलाओ। बाघ मरे या जिये उसके कारण हम न मरें। मंत्री जी के वचनों का पालन हुआ। कुछ तबादले हुए। कुछ लाइन अटैच हुए। फिर सब कुछ सब कोई भूल गये।
.............................................सुखनवर
अंदाज़े बयां और apnikahi.blogspot.com
Friday, June 5, 2009
कानून और व्यवस्था
बिहार में कुछ ट्रेनों के स्टाॅप कम कर दिये गये तो उससे ’गुस्साए’ ( ये टी वी के विद्वानों द्वारा उत्पादित शब्द है ) लोगों ने उत्साहपूर्वक अनेक बोगियों का दहन किया। स्टेशन को नष्ट कर दिया। उन्हें कोई रोकने वाला नहीं था। वहां टी वी चैनल वाले थे जो उसे पूरा शूट करते रहे। और जल्द ही पूरे देश में नेताओं की टिप्पणियों के साथ इस घटना का सचित्र उत्साहवर्धक प्रसारण कर दिया गया। पर क्योंकि वो मीडिया के लोग थे इसीलिए वे इस राष्ट्र के नागरिक तो थे नहीं कि इस गुंडागर्दी को रोकने की कोशिश करते। पूरे बिहार के उन सभी स्टेशनों में मातम छा गया जहां आग नहीं लगाई जा सकी। उप-द्रवियांे ( जी हां टी वी की न्यूज वाचिका यही उच्चारण कर रही थीं ) को भी बड़ा दुख हुआ कि वो अकर्मण्य माने गये। उनमें भी दम खम था। वो भी कुछ कर दिखा सकते थे। मगर समाचार के अभाव में चूक गये। उप द्रवियों के जो दृश्य दिखाये गये उनमें जो प्रेरणा और उत्साहवर्धन का भाव था वो देखते ही बनता था। छोटे छोटे लड़के तोड़ फोड़ और आगजनी में लगे थे। उनके अपने देश की संपत्ति स्वाहा कर रहे थे और आनंदित थे।
जिन लोगों की प्रतिक्रिया ली गई वे सभी रेल मंत्री हैं या रह चुके हैं। नितीश कुमार ने कहा कि सबको समझ लेना चाहिये कि कोई बिहार को हाथ न लगाए। लालू का कहना तो साफ था कि इसके लिए नितीश कुमार दोषी हैं। ममता बनर्जी जो अखिल बंगाल राष्ट्र की रेल मंत्री हैं उन्होंने ठीक ही कहा कि पहली बात तो मुझे बताया नहीं दूसरी बात की मैंने यह स्टाॅप बंद नहीं करवाये और तीसरी बात की जिसने ये स्टाॅप बंद करवाये हैं उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जायेगी। इस तरह राष्ट्रनेताओं ने अपना कर्तव्य पूरा किया। बाकी किसी ने प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। जरूरत भी क्या है ? ये बिहार का मामला है। जिस प्रदेश का है उसके नेता बोलें। हम क्यों बोलें? ये बात अलग है कि सभी प्रादेशिक पार्टियां और उनके नेता राष्ट्रीय हैं। जब अमेरिका से परमाणु समझौता हो रहा था तो भी सभी राष्ट्रीय नेता चुप थे। हो सकता है उनको लगा हो कि ये समझौता तो अन्तर्राष्ट्रीय है। हम तो राष्ट्रीय हैं। हम लोग क्या बोलें?
खास बात ये है कि किसी जिला स्तरीय नेता से लेकर किसी राष्ट्रीय नेता ने यह नहीं कहा कि ये आगजनी तोड़ फोड़ गलत है। पुलिस को उप द्रवियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करना चाहिये। लालू नितिश के बोलने में जो बिहारी गौरव रक्षा का भाव था वो तो देखते ही बनता था। ममता बनर्जी ने बंगाल से बाहर पड़ोस के बिहार राज्य के बारे में सोचा वही बहुत है। यदि उनमें थोड़ी भी राष्ट्रीय बुद्धि होती तो वे सबसे पहले अपने विभाग की ओर से नीतिगत बात कहतीं। ये किसी बाबू द्वारा लिया गया निर्णय नहीं है। रेलवे के अधिकारियों को यह विचार करना पड़ता है कि किस रेलगाड़ी को किस समय चलाया जाए। कहां स्टेशन बनाया जाए। किस स्थान पर बनाया गा स्टेशन अनुपयुक्त है इसीलिए उसे बंद कर दिया जाए। कहां स्टाॅप रखा जाए और कहां न रखा जाए। जो लेाग बिहार और उत्तर प्रदेश में यात्रा कर चुके हैं वे जानते हैं कि रेलवे के कितने नियमों का पालन होता है और इन प्रदेशों से गुजरने वाली ट्रेनों में यात्रियों की सुरक्षा की क्या स्थिति है।
पिछले वर्ष राजस्थान में गुर्जरों को आरक्षण दिये जाने के लिये जो आंदोलन किया गया उसमें निर्दयता से रेलवे की पटरियां उखाड़ी गईं। पुलिस को कुछ न करने के निर्देश मुख्यमंत्री ने दिये थे। अंत में सुप्रीम कोर्ट को निर्देश देना पड़े कि इस आंदोलन के नेताओं पर राष्ट्रीय संपत्ति के विनाश के लिए मुकदमा चलाया जाए। गुर्जरों के नेता बैंसला जी ने करोड़ों रूपये स्वाहा करवाये और फिर भाजपा की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़कर हारे। इस बहाने उन्होंने ये भ्रम दूर कर दिया कि वे गुर्जरों के नेता हैं। वे राष्ट्रवादियों के नेता हैं। कलई खुल गई। बिहार में भी जब सुप्रीम कोर्ट कहेगा तभी उप द्रवियों पर मुकदमा चलेगा। ये वही मंत्री गण और भूतपूर्व मंत्री गण हैं जिन पर कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
राजनीति आज जिस मोड़ पर आ खड़ी हुई है वहां नेता नेतृत्व नहीं करता। वो उप द्रवियों के पीछे चलता है। उप द्रवियों तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं। तुम चलो हम आते हैं। गलत को गलत बोलने वाला कोई नहीं है। बीच सड़क में कोई घर बनाये तो उसे मना नहीं किया जाएगा। जब घर तोड़ा जायेगा तो अंादोलन होगा कि गरीब का घर तोड़ा जा रहा हैै। उसे दूसरा घर दो। ऐसे ही छुटभैये नेता विधायक बनते हैं और फिर मंत्री बनाये जाते हैं। ऐसे ओछे लोग ओछा ही काम करेंगे।
..........सुखनवर
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बिहार में कुछ ट्रेनों के स्टाॅप कम कर दिये गये तो उससे ’गुस्साए’ ( ये टी वी के विद्वानों द्वारा उत्पादित शब्द है ) लोगों ने उत्साहपूर्वक अनेक बोगियों का दहन किया। स्टेशन को नष्ट कर दिया। उन्हें कोई रोकने वाला नहीं था। वहां टी वी चैनल वाले थे जो उसे पूरा शूट करते रहे। और जल्द ही पूरे देश में नेताओं की टिप्पणियों के साथ इस घटना का सचित्र उत्साहवर्धक प्रसारण कर दिया गया। पर क्योंकि वो मीडिया के लोग थे इसीलिए वे इस राष्ट्र के नागरिक तो थे नहीं कि इस गुंडागर्दी को रोकने की कोशिश करते। पूरे बिहार के उन सभी स्टेशनों में मातम छा गया जहां आग नहीं लगाई जा सकी। उप-द्रवियांे ( जी हां टी वी की न्यूज वाचिका यही उच्चारण कर रही थीं ) को भी बड़ा दुख हुआ कि वो अकर्मण्य माने गये। उनमें भी दम खम था। वो भी कुछ कर दिखा सकते थे। मगर समाचार के अभाव में चूक गये। उप द्रवियों के जो दृश्य दिखाये गये उनमें जो प्रेरणा और उत्साहवर्धन का भाव था वो देखते ही बनता था। छोटे छोटे लड़के तोड़ फोड़ और आगजनी में लगे थे। उनके अपने देश की संपत्ति स्वाहा कर रहे थे और आनंदित थे।
जिन लोगों की प्रतिक्रिया ली गई वे सभी रेल मंत्री हैं या रह चुके हैं। नितीश कुमार ने कहा कि सबको समझ लेना चाहिये कि कोई बिहार को हाथ न लगाए। लालू का कहना तो साफ था कि इसके लिए नितीश कुमार दोषी हैं। ममता बनर्जी जो अखिल बंगाल राष्ट्र की रेल मंत्री हैं उन्होंने ठीक ही कहा कि पहली बात तो मुझे बताया नहीं दूसरी बात की मैंने यह स्टाॅप बंद नहीं करवाये और तीसरी बात की जिसने ये स्टाॅप बंद करवाये हैं उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जायेगी। इस तरह राष्ट्रनेताओं ने अपना कर्तव्य पूरा किया। बाकी किसी ने प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। जरूरत भी क्या है ? ये बिहार का मामला है। जिस प्रदेश का है उसके नेता बोलें। हम क्यों बोलें? ये बात अलग है कि सभी प्रादेशिक पार्टियां और उनके नेता राष्ट्रीय हैं। जब अमेरिका से परमाणु समझौता हो रहा था तो भी सभी राष्ट्रीय नेता चुप थे। हो सकता है उनको लगा हो कि ये समझौता तो अन्तर्राष्ट्रीय है। हम तो राष्ट्रीय हैं। हम लोग क्या बोलें?
खास बात ये है कि किसी जिला स्तरीय नेता से लेकर किसी राष्ट्रीय नेता ने यह नहीं कहा कि ये आगजनी तोड़ फोड़ गलत है। पुलिस को उप द्रवियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करना चाहिये। लालू नितिश के बोलने में जो बिहारी गौरव रक्षा का भाव था वो तो देखते ही बनता था। ममता बनर्जी ने बंगाल से बाहर पड़ोस के बिहार राज्य के बारे में सोचा वही बहुत है। यदि उनमें थोड़ी भी राष्ट्रीय बुद्धि होती तो वे सबसे पहले अपने विभाग की ओर से नीतिगत बात कहतीं। ये किसी बाबू द्वारा लिया गया निर्णय नहीं है। रेलवे के अधिकारियों को यह विचार करना पड़ता है कि किस रेलगाड़ी को किस समय चलाया जाए। कहां स्टेशन बनाया जाए। किस स्थान पर बनाया गा स्टेशन अनुपयुक्त है इसीलिए उसे बंद कर दिया जाए। कहां स्टाॅप रखा जाए और कहां न रखा जाए। जो लेाग बिहार और उत्तर प्रदेश में यात्रा कर चुके हैं वे जानते हैं कि रेलवे के कितने नियमों का पालन होता है और इन प्रदेशों से गुजरने वाली ट्रेनों में यात्रियों की सुरक्षा की क्या स्थिति है।
पिछले वर्ष राजस्थान में गुर्जरों को आरक्षण दिये जाने के लिये जो आंदोलन किया गया उसमें निर्दयता से रेलवे की पटरियां उखाड़ी गईं। पुलिस को कुछ न करने के निर्देश मुख्यमंत्री ने दिये थे। अंत में सुप्रीम कोर्ट को निर्देश देना पड़े कि इस आंदोलन के नेताओं पर राष्ट्रीय संपत्ति के विनाश के लिए मुकदमा चलाया जाए। गुर्जरों के नेता बैंसला जी ने करोड़ों रूपये स्वाहा करवाये और फिर भाजपा की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़कर हारे। इस बहाने उन्होंने ये भ्रम दूर कर दिया कि वे गुर्जरों के नेता हैं। वे राष्ट्रवादियों के नेता हैं। कलई खुल गई। बिहार में भी जब सुप्रीम कोर्ट कहेगा तभी उप द्रवियों पर मुकदमा चलेगा। ये वही मंत्री गण और भूतपूर्व मंत्री गण हैं जिन पर कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
राजनीति आज जिस मोड़ पर आ खड़ी हुई है वहां नेता नेतृत्व नहीं करता। वो उप द्रवियों के पीछे चलता है। उप द्रवियों तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं। तुम चलो हम आते हैं। गलत को गलत बोलने वाला कोई नहीं है। बीच सड़क में कोई घर बनाये तो उसे मना नहीं किया जाएगा। जब घर तोड़ा जायेगा तो अंादोलन होगा कि गरीब का घर तोड़ा जा रहा हैै। उसे दूसरा घर दो। ऐसे ही छुटभैये नेता विधायक बनते हैं और फिर मंत्री बनाये जाते हैं। ऐसे ओछे लोग ओछा ही काम करेंगे।
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Wednesday, May 27, 2009
मंत्री पद की वासना
चुनाव हो चुके हैं। मंत्रिमंडल बनना है। पार्टियों की शक्ति देखिये। कांग्रेस के 200, बीजेपी के 150 और उसके बाद सीधे समाजवादी पार्टी के तीसरे नंबर पर 23 चैथे नंबर पर मायावती 20 और तृणमूल कांग्रेस पांचवें नंबर पर 19 सांसदों के साथ। द्रमुक और राष्ट्रवादी कंाग्रेस पार्टी के केवल 8 सांसद हैं। मगर गठबंधन सरकार है तो मंत्री पद के लिए रूठना मनाना चल रहा है। द्रमुक में तो बहुत ही अंदरूनी संघर्ष चल रहा है। वे करूणानिधि हैं। उन्होंने तीन महिलाओं पर तरस खाया और उन्हें अपनी पत्नी बनाया। अब उनके बाल बच्चों पर तरस खाने के दिन आ गये हैं। तीनों केा बराबरी का हिस्सा चाहिए संपत्ति में। दुर्भाग्य से यह संपत्ति भारत सरकार है। तृणमूल कांग्रेस के लिए यह देश प बंगाल है। वे भारत सरकार की रेल मंत्री बनेंगी पर रेल चलेगी बंगाल में। इस समय विजय का दर्प इस कदर सिर पर सवार है कि बस चले तो प बंगाल सरकार को तोप से उड़ा दें। राष्ट्रवादी कांगे्रस क्यों बनीं ? ये सभी कांग्रेसी हैं। पवार ने किसी गणित में सोनिया गंाधी के विदेशी मूल के होने का मुद्दा उठाया। फिर राष्ट्रवादी हो गये। झगड़ा महाराष्ट्र का था। कालचक्र घूमा तो उन्हीं सोनिया जी के साथ मिलकर यूपीए में कृषि मंत्री बने बैठे हैं। इनसे कोई पूछ नहीं सकता कि क्यों महाशय जब सोनिया जी के साथ हैं तो फिर आपकी अलग से कांग्रेस क्यों ?
हमारे देश में मंत्री पद योग्यता का सूचक नहीं है। कौन किसका कितना और क्या बिगाड़ सकता है इसका पैमाना है। शरद पवार या द्रमुक या तृणमूल सरकार का बहुत कुछ बिगाड़ सकते हैं इसीलिए इन्हें 200 सांसद वाली कांग्रेस पार्टी से ज्यादा मंत्री पद चाहिये। आप देखेंगे कि कोई पार्टी ये नहीं कहती कि हमें गृहमंत्री या रक्षा मंत्री या वित्त मंत्री बनाया जाये। इन्हें रेल, कृषि , कोयला, पेट्रोलियम, जैसे विभाग चाहिए। इन विभागों के बारे में कहा जाता है कि इनमें सात पुश्तों तक के कल्याण की व्यवस्था हो जाती है। किसी विभाग का मंत्री बनने के लिए किसी विशेष योग्यता की जरूरत नहीं है। आपकी पार्टी को दस मंत्री पद दिये गये हैं। बन जाइये मंत्री। मंत्री बनते ही सांसद को कारें, बंगला, आॅफिस, एसी हवाई यात्रा, इत्यादि सुविधायें मिल जाती हैं जो सामान्य भारतीय आदमी के लिए एक सपना है। कुछ साहब मिल जाते हैं जो सर सर करते रहते हैं। जीवन सफल हो जाता है।
अधिकांश मंत्रियों का मंत्रित्व काल सुविधाओं को भोगने में चला जाता है। अधिकारी भी यही चाहते हैं कि आप देशाटन कीजिये और उद्घाटन ,सम्मान वगैरह करिये कराइये। विभाग के कामों में टांग मत अड़ाइये। विभाग में यदि ऊपरी कमाई है तो आपको भरपूर हिस्सा मिलेगा ताकि आप अगला चुनाव लड़ सकें और पिछले चुनाव की लागत निकाल सकें। बाकी चुप रहें। खुद खायें और दूसरों को खाने दें।
यदि कोई मंत्री वास्तव में कुछ करना चाहता है तो उसे अनुभव चाहिये, ज्ञान चाहिये और अपने मातहत अधिकारियों से ज्यादा बुद्धि और विवेक चाहिये। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी यही चाहते हैं कि इस तरह से थोक में बने मंत्री अपनी दुनिया में रहें और सत्ता की दुनिया में टांग न अड़ायें। इसीलिए मंत्रीगण झूठे वादे करने वाले बेदर्दी बालमा कहलाते हैं। वे झूठे वादे न करें तो और क्या करें ? वो तो पार्टी में अपनी ताकत के कारण अपने कोटे में से मंत्री बने हैं। यदि योग्य होते तो किसी अच्छे काम में न लग गये होते।
हमारे देश में एक जादू और होता है। समय समय पर मंत्रिमंडल में फेरबदल होता है। इसके कारण तरह तरह के होते हैं। पर परिणाम एक ही होता है। एक विभाग के अयोग्य मंत्री को दूसरे विभाग का मंत्री बना दिया जाता है। वो वहां भी कुछ नहीं करते थे। यहां भी कुछ नहीं करंेगे। बड़ा हास्यास्पद लगता है ये सुनना कि कल तक जो कपड़ा मंत्री थे आज आदिवासी कल्याण के मंत्री हो गये। रातोंरात उनकी विद्वत्ता का क्षेत्र बदल गया।
मनमोहन सिंह जी का पिछला मंत्रीमंडल बड़ा जोरदार था। उसमें सभी मंत्री गण स्वतंत्र थे। उनके कामों में प्रधानमंत्री का कोई हस्तक्ष्ेप नहीं रहता था। अर्जुन सिंह ने आरक्षण आदि पर अनेक बड़े फैसले लिए। कभी ऐसा लगा नही कि ये मनमोहन सरकार के मंत्री हैं। विरोध में जो आंदोलन हुए वो भी अर्जुन सिंह के विरूद्ध हुए। निर्णयों की घोषणा भी अर्जुन सिंह जी ने की। इसका परिणाम ये हुआ कि जो निंदा हुई वो अर्जुन सिंह की हुई और जो प्रशंसा हुई वो प्रधानमंत्री और कांग्रेस की हुई। एक डा रामदौस थे। वे स्वास्थ्य मंत्री थे। वे एम्स में मनचाहे निर्णय लेते रहे। मगर पता नहीं चला कि ये मनमोहन सरकार के मंत्री हैं और प्रधानमंत्री के नीचे काम करते हैं। एकदम आजाद। लालू की रेल चाहे जहां चलती रही चाहे पटरी हो चाहे न हो मगर प्रधानमंत्री एकदम खामोश। इसीलिये यूपीए गठबंधन बहुत मजबूत रहा।
मंत्री पद पाकर सांसदों और विधायकों को जनता से दूर कर दिया जाता है। आप मंत्री हैं। आपकी सुरक्षा होगी। आप सबसे दूर रहिये। किसी से मिलिये नहीं। आप लालबत्ती में चलिए। आगे एक जीप में साइरन बजेगा। पीछे पुलिस की गाड़ी दौड़ेगी। परिणाम ये होगा कि आप मंत्री पद की मायावी दुनिया में खो जायेंगे और तब तक खोये रहेंगे जबतक आप अगला चुनाव न हार जायें या अगले बार मंत्री न बनाये जायें। ..........................................सुखनवर
हमारे देश में मंत्री पद योग्यता का सूचक नहीं है। कौन किसका कितना और क्या बिगाड़ सकता है इसका पैमाना है। शरद पवार या द्रमुक या तृणमूल सरकार का बहुत कुछ बिगाड़ सकते हैं इसीलिए इन्हें 200 सांसद वाली कांग्रेस पार्टी से ज्यादा मंत्री पद चाहिये। आप देखेंगे कि कोई पार्टी ये नहीं कहती कि हमें गृहमंत्री या रक्षा मंत्री या वित्त मंत्री बनाया जाये। इन्हें रेल, कृषि , कोयला, पेट्रोलियम, जैसे विभाग चाहिए। इन विभागों के बारे में कहा जाता है कि इनमें सात पुश्तों तक के कल्याण की व्यवस्था हो जाती है। किसी विभाग का मंत्री बनने के लिए किसी विशेष योग्यता की जरूरत नहीं है। आपकी पार्टी को दस मंत्री पद दिये गये हैं। बन जाइये मंत्री। मंत्री बनते ही सांसद को कारें, बंगला, आॅफिस, एसी हवाई यात्रा, इत्यादि सुविधायें मिल जाती हैं जो सामान्य भारतीय आदमी के लिए एक सपना है। कुछ साहब मिल जाते हैं जो सर सर करते रहते हैं। जीवन सफल हो जाता है।
अधिकांश मंत्रियों का मंत्रित्व काल सुविधाओं को भोगने में चला जाता है। अधिकारी भी यही चाहते हैं कि आप देशाटन कीजिये और उद्घाटन ,सम्मान वगैरह करिये कराइये। विभाग के कामों में टांग मत अड़ाइये। विभाग में यदि ऊपरी कमाई है तो आपको भरपूर हिस्सा मिलेगा ताकि आप अगला चुनाव लड़ सकें और पिछले चुनाव की लागत निकाल सकें। बाकी चुप रहें। खुद खायें और दूसरों को खाने दें।
यदि कोई मंत्री वास्तव में कुछ करना चाहता है तो उसे अनुभव चाहिये, ज्ञान चाहिये और अपने मातहत अधिकारियों से ज्यादा बुद्धि और विवेक चाहिये। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी यही चाहते हैं कि इस तरह से थोक में बने मंत्री अपनी दुनिया में रहें और सत्ता की दुनिया में टांग न अड़ायें। इसीलिए मंत्रीगण झूठे वादे करने वाले बेदर्दी बालमा कहलाते हैं। वे झूठे वादे न करें तो और क्या करें ? वो तो पार्टी में अपनी ताकत के कारण अपने कोटे में से मंत्री बने हैं। यदि योग्य होते तो किसी अच्छे काम में न लग गये होते।
हमारे देश में एक जादू और होता है। समय समय पर मंत्रिमंडल में फेरबदल होता है। इसके कारण तरह तरह के होते हैं। पर परिणाम एक ही होता है। एक विभाग के अयोग्य मंत्री को दूसरे विभाग का मंत्री बना दिया जाता है। वो वहां भी कुछ नहीं करते थे। यहां भी कुछ नहीं करंेगे। बड़ा हास्यास्पद लगता है ये सुनना कि कल तक जो कपड़ा मंत्री थे आज आदिवासी कल्याण के मंत्री हो गये। रातोंरात उनकी विद्वत्ता का क्षेत्र बदल गया।
मनमोहन सिंह जी का पिछला मंत्रीमंडल बड़ा जोरदार था। उसमें सभी मंत्री गण स्वतंत्र थे। उनके कामों में प्रधानमंत्री का कोई हस्तक्ष्ेप नहीं रहता था। अर्जुन सिंह ने आरक्षण आदि पर अनेक बड़े फैसले लिए। कभी ऐसा लगा नही कि ये मनमोहन सरकार के मंत्री हैं। विरोध में जो आंदोलन हुए वो भी अर्जुन सिंह के विरूद्ध हुए। निर्णयों की घोषणा भी अर्जुन सिंह जी ने की। इसका परिणाम ये हुआ कि जो निंदा हुई वो अर्जुन सिंह की हुई और जो प्रशंसा हुई वो प्रधानमंत्री और कांग्रेस की हुई। एक डा रामदौस थे। वे स्वास्थ्य मंत्री थे। वे एम्स में मनचाहे निर्णय लेते रहे। मगर पता नहीं चला कि ये मनमोहन सरकार के मंत्री हैं और प्रधानमंत्री के नीचे काम करते हैं। एकदम आजाद। लालू की रेल चाहे जहां चलती रही चाहे पटरी हो चाहे न हो मगर प्रधानमंत्री एकदम खामोश। इसीलिये यूपीए गठबंधन बहुत मजबूत रहा।
मंत्री पद पाकर सांसदों और विधायकों को जनता से दूर कर दिया जाता है। आप मंत्री हैं। आपकी सुरक्षा होगी। आप सबसे दूर रहिये। किसी से मिलिये नहीं। आप लालबत्ती में चलिए। आगे एक जीप में साइरन बजेगा। पीछे पुलिस की गाड़ी दौड़ेगी। परिणाम ये होगा कि आप मंत्री पद की मायावी दुनिया में खो जायेंगे और तब तक खोये रहेंगे जबतक आप अगला चुनाव न हार जायें या अगले बार मंत्री न बनाये जायें। ..........................................सुखनवर
Thursday, May 21, 2009
आचार संहिता के पालन हेतु चुनाव
अंदाजे़ बयां और
आचार संहिता के पालन हेतु चुनाव
पुराने जमाने में जब आफसेट प्रिंटिंग भी नहीं आई थी, जब एक्जिट पोल नहीं होते थे, जब लोग चुनाव का मतलब कांग्रेस को वोट देना समझते थे उस समय अखबारों में मतगणना के दिन एक ही हैडलाइन रहा करती थी ’आज पेटी का राजा बाहर आयेगा’। चुनाव में शुरूआत में अलग अलग चुनाव चिन्हों की पेटियां होती थी। फिर एक ही पेटी में सारे वोट डाले जाने लगे। अब इलेक्ट्रानिक वोटिंग का जमाना आ गया है। अब चुनाव लड़ने लड़ाने के लिये इतने कानून बन गये हैं कि चुनाव शहरी लोगों का शगल और ग्रामीण लोगों की मुसीबत बन गया है। शहरी गरीबों के लिये जरूर चुनाव कुछ कमाई करवा जाता है। इस बार के चुनाव का सबसे बड़ा उम्मीदवार आचार संहिता थी। लगता था कि चुनाव इसीलिये हो रहे हैं कि आचार संहिता का पालन हो। उम्मीदवार प्रचार करके देर रात जब घर लौटता था तो पुलिस गिरफ्तार करने के लिए खड़ी रहती थी कि आपने दिन भर में इतने बार आचार संहिता का उल्लघंन कर दिया है। चलिये थाने और जमानत कराईये। हर उम्मीदवार ने दो वीडियो शूटर रखे थे। एक अपने लिये और दूसरा विरोधी उम्मीदवार के लिये। सभी के कार्यकर्ता इसी में व्यस्त थे कि दूसरे की शिकायत करना है।
आचार संहिता के चक्कर में हुआ ये कि पता ही नहीं चला कि चुनाव हो गये। झंडे नहीं लगा सकते, सभा नहीं कर सकते, जुलूस नहीं निकाल सकते, बैनर नहीं लगा सकते, दीवार पर लिख नहीं सकते, किसी का भला नहीं कर सकते, नल बंद हो तो पानी नहीं आ सकता, पानी आ रहा हो तो बंद नहीं कर सकते, नाली-सड़क नहीं बना सकते यानी आप कुछ भी करेंगे तो आचार संहिता भंग हो जायेगी। जो सरकारी कर्मचारी वैसे ही कुछ नहीं कर रहा था उसे एक आदर्श कारण मिल गया कुछ न करने का। आचार संहिता लगी है भाई साहब, होश में तो हो, आपका काम कर दिया तो अभी अंदर हो जायेंगे। जवाब देना मुश्किल हो जायेगा कि काम किया क्यों ? और तो और कोई आदमी किसी को पांच सौ के नोट के बदले सौ के पांच नोट नहीं दे सकता। तुरंत पैसा बांटने के आरोप में बंधा नजर आयेगा।
ये विचार करने का समय है कि चुनाव होते क्यों हैं ? क्या मतदाता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि उसके इलाके से कौन कौन चुनाव लड़ रहा है? उनका चुनाव चिन्ह क्या है? वो क्यों चुनाव लड़ रहे हैं? उनका घोषणा पत्र क्या है? उसे भाषण देना, जनता के मुद्दे उठाना आता है क्या ? वो संसद में जाकर क्या करना चाहता है ? संसद की हर सीट पर दस से पन्द्रह लाख मतदाता होते हैं। एक व्यक्ति आखिर किस तरह से अपने मतदाताओं को अपने बारे में बता सकता है ? मतदान के अंाकड़े बताते हैं कि औसतन पचास प्रतिशत लोगों ने मतदान किया। यानी जो लोग जीते हैं उनकी जीत में देश के आधी आबादी की कोई रूचि नहीं है। इतना मजबूत लोकतंत्र है। टी वी में बड़े बड़े लोग अंग्रेजी और हिन्दी में समझा रहे हैं कि आप वोट जरूर दें। कैसे दंे ? आप तो पता भी नहीं चलने दे रहे कि कौन कौन खड़ा है। एक एक संसदीय क्षेत्र इतना बड़ा है कि दुनिया में कई देश उनसे छोटे हैं। इसमें यदि एक पर्चा भी बंटवायें तो लाखों रूपये खर्च होते हैं। लेकिन खर्च की सीमा तय है। चुनाव लड़ना अब किसी सामान्य आदमी का काम नहीं रह गया है। सामान्य पार्टी का भी नहीं। आपके पास करोड़ों रूपया हो तभी चुनाव लड़ने की कल्पना कीजिये। अब पार्टियां भी उसी को टिकिट देती हैं जिसकी चुनाव लड़ने की औकात हो। पास से पैसा लगा सके। जब लगायेगा तभी तो बनायेगा। इसीलिये अब हर प्रत्याशी की संपत्ति करोड़ों रूपये में दिखना कोई ताज्जुब की बात नहीं लगती। उमा भारती की पार्टी ने चुनाव नहीं लड़ा। उमा भारती ने साफ कहा कि हमारे पास पैसा नहीं है। हम चुनाव नहीं लड़ सकते। अभी अभी विधान सभा चुनावों में पूरी पूंजी लुट चुकी है।
मीडिया के मुंह में ख्ूान लग चुका है। चुनाव को नीरस बनाने में मीडिया का बहुत योगदान रहा। अव्वल तो उम्मीदवार और पार्टी के बारे में बिना पेमेन्ट कुछ छापना ही नहीं है। और पेमेन्ट नहीं मिला तो विरोध में ही छापना है। जो पार्टी राज्य सरकार चला रही है। उससे संबंध अच्छे रखना है। उससे विज्ञापन मिलते हैं। इलेक्ट्राॅनिक मीडिया तो घटियापन और ओछेपन की सभी ऊंचाईयों को छू चुका है। उनके लिये चुनाव किसी आइटम सांग से कम नहीं था। उनके लिए कुछ सिरफिरों का जूता चलाना वरदान साबित हुआ। उसी की रिपोर्टिंग करते हुए समय निकालते रहे। देश का भला चाहने वालों को टी वी का चैबीस घंटे चलना बंद करवाना होगा। जनता को कुछ सोचने समझने के लिए अवकाश दिया जाना बहुत जरूरी है। प्रभाष जोशी ने जनसत्ता में सप्रमाण लिखा है कि इस बार प्रिंट मीडिया ने किस बेशर्मी से उम्मीदवारों को ब्लेकमेल किया है। आज जरूरत है कि सभी राजनीतिज्ञ इस ब्लेकमेल को उजागर करें और हिम्मत के साथ इससे निपटें। ................................................................................सुखनवर
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आचार संहिता के पालन हेतु चुनाव
पुराने जमाने में जब आफसेट प्रिंटिंग भी नहीं आई थी, जब एक्जिट पोल नहीं होते थे, जब लोग चुनाव का मतलब कांग्रेस को वोट देना समझते थे उस समय अखबारों में मतगणना के दिन एक ही हैडलाइन रहा करती थी ’आज पेटी का राजा बाहर आयेगा’। चुनाव में शुरूआत में अलग अलग चुनाव चिन्हों की पेटियां होती थी। फिर एक ही पेटी में सारे वोट डाले जाने लगे। अब इलेक्ट्रानिक वोटिंग का जमाना आ गया है। अब चुनाव लड़ने लड़ाने के लिये इतने कानून बन गये हैं कि चुनाव शहरी लोगों का शगल और ग्रामीण लोगों की मुसीबत बन गया है। शहरी गरीबों के लिये जरूर चुनाव कुछ कमाई करवा जाता है। इस बार के चुनाव का सबसे बड़ा उम्मीदवार आचार संहिता थी। लगता था कि चुनाव इसीलिये हो रहे हैं कि आचार संहिता का पालन हो। उम्मीदवार प्रचार करके देर रात जब घर लौटता था तो पुलिस गिरफ्तार करने के लिए खड़ी रहती थी कि आपने दिन भर में इतने बार आचार संहिता का उल्लघंन कर दिया है। चलिये थाने और जमानत कराईये। हर उम्मीदवार ने दो वीडियो शूटर रखे थे। एक अपने लिये और दूसरा विरोधी उम्मीदवार के लिये। सभी के कार्यकर्ता इसी में व्यस्त थे कि दूसरे की शिकायत करना है।
आचार संहिता के चक्कर में हुआ ये कि पता ही नहीं चला कि चुनाव हो गये। झंडे नहीं लगा सकते, सभा नहीं कर सकते, जुलूस नहीं निकाल सकते, बैनर नहीं लगा सकते, दीवार पर लिख नहीं सकते, किसी का भला नहीं कर सकते, नल बंद हो तो पानी नहीं आ सकता, पानी आ रहा हो तो बंद नहीं कर सकते, नाली-सड़क नहीं बना सकते यानी आप कुछ भी करेंगे तो आचार संहिता भंग हो जायेगी। जो सरकारी कर्मचारी वैसे ही कुछ नहीं कर रहा था उसे एक आदर्श कारण मिल गया कुछ न करने का। आचार संहिता लगी है भाई साहब, होश में तो हो, आपका काम कर दिया तो अभी अंदर हो जायेंगे। जवाब देना मुश्किल हो जायेगा कि काम किया क्यों ? और तो और कोई आदमी किसी को पांच सौ के नोट के बदले सौ के पांच नोट नहीं दे सकता। तुरंत पैसा बांटने के आरोप में बंधा नजर आयेगा।
ये विचार करने का समय है कि चुनाव होते क्यों हैं ? क्या मतदाता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि उसके इलाके से कौन कौन चुनाव लड़ रहा है? उनका चुनाव चिन्ह क्या है? वो क्यों चुनाव लड़ रहे हैं? उनका घोषणा पत्र क्या है? उसे भाषण देना, जनता के मुद्दे उठाना आता है क्या ? वो संसद में जाकर क्या करना चाहता है ? संसद की हर सीट पर दस से पन्द्रह लाख मतदाता होते हैं। एक व्यक्ति आखिर किस तरह से अपने मतदाताओं को अपने बारे में बता सकता है ? मतदान के अंाकड़े बताते हैं कि औसतन पचास प्रतिशत लोगों ने मतदान किया। यानी जो लोग जीते हैं उनकी जीत में देश के आधी आबादी की कोई रूचि नहीं है। इतना मजबूत लोकतंत्र है। टी वी में बड़े बड़े लोग अंग्रेजी और हिन्दी में समझा रहे हैं कि आप वोट जरूर दें। कैसे दंे ? आप तो पता भी नहीं चलने दे रहे कि कौन कौन खड़ा है। एक एक संसदीय क्षेत्र इतना बड़ा है कि दुनिया में कई देश उनसे छोटे हैं। इसमें यदि एक पर्चा भी बंटवायें तो लाखों रूपये खर्च होते हैं। लेकिन खर्च की सीमा तय है। चुनाव लड़ना अब किसी सामान्य आदमी का काम नहीं रह गया है। सामान्य पार्टी का भी नहीं। आपके पास करोड़ों रूपया हो तभी चुनाव लड़ने की कल्पना कीजिये। अब पार्टियां भी उसी को टिकिट देती हैं जिसकी चुनाव लड़ने की औकात हो। पास से पैसा लगा सके। जब लगायेगा तभी तो बनायेगा। इसीलिये अब हर प्रत्याशी की संपत्ति करोड़ों रूपये में दिखना कोई ताज्जुब की बात नहीं लगती। उमा भारती की पार्टी ने चुनाव नहीं लड़ा। उमा भारती ने साफ कहा कि हमारे पास पैसा नहीं है। हम चुनाव नहीं लड़ सकते। अभी अभी विधान सभा चुनावों में पूरी पूंजी लुट चुकी है।
मीडिया के मुंह में ख्ूान लग चुका है। चुनाव को नीरस बनाने में मीडिया का बहुत योगदान रहा। अव्वल तो उम्मीदवार और पार्टी के बारे में बिना पेमेन्ट कुछ छापना ही नहीं है। और पेमेन्ट नहीं मिला तो विरोध में ही छापना है। जो पार्टी राज्य सरकार चला रही है। उससे संबंध अच्छे रखना है। उससे विज्ञापन मिलते हैं। इलेक्ट्राॅनिक मीडिया तो घटियापन और ओछेपन की सभी ऊंचाईयों को छू चुका है। उनके लिये चुनाव किसी आइटम सांग से कम नहीं था। उनके लिए कुछ सिरफिरों का जूता चलाना वरदान साबित हुआ। उसी की रिपोर्टिंग करते हुए समय निकालते रहे। देश का भला चाहने वालों को टी वी का चैबीस घंटे चलना बंद करवाना होगा। जनता को कुछ सोचने समझने के लिए अवकाश दिया जाना बहुत जरूरी है। प्रभाष जोशी ने जनसत्ता में सप्रमाण लिखा है कि इस बार प्रिंट मीडिया ने किस बेशर्मी से उम्मीदवारों को ब्लेकमेल किया है। आज जरूरत है कि सभी राजनीतिज्ञ इस ब्लेकमेल को उजागर करें और हिम्मत के साथ इससे निपटें। ................................................................................सुखनवर
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