Wednesday, September 14, 2011

सन्यासी की बारात उर्फ आडवाणी की रथयात्रा

भाइयो,
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि आज का हमारा यह प्रशिक्षण वर्ग तब आरंभ हो रहा है जबकि आडवाणी जी एक बार फिर रथयात्रा की घोषणा कर चुके हैं। उन्होंने घोषणा करके हम सबको चौंका दिया। हममें से किसी को मालूम नहीं था कि उनके मन में क्या पक रहा है। अचानक उन्होंने घोषणा कर दी। उनकी उम्र 84 वर्ष है। वो इस देश का कल्याण करना चाहते हैं। वो देश का प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। वो देश के प्रधानमंत्री तब ही बनेंगे जब हमारी पार्टी सत्ता में आएगी। इसके लिए वो रथयात्रा करने का निश्चय कर चुके हैं। आपको सबको याद ही होगा कि सन्1992 में जो रथयात्रा उन्होंने की थी उसकी याद करके आज भी लाखांे लोग सिहर उठते हैं। ऐसी अकल ठिकाने लगाई थी आडवाणी जी ने। रथयात्रा का प्रताप ही ऐसा होता है।
आप लोगों ने देखा ही होगा कि जब भी कोई घटना होती है तो सबसे पहले आडवाणी जी सरकार से इस्तीफा मांगते हैं। इसका कारण उनके अंदर छुपी बैचेनी है। वो देश को अपने आपके के रूप में एक काबिल प्रधानमंत्री देना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि ये सरकार जल्द से जल्द गिर जाए ताकि उनकी बारी आए। इसमे ंबुरा क्या है। हर कोई अपना भला सोचता है। पिछले बार उन्होंने एनडीए की बैठक बुलाकर अपने को भावी प्रधानमंत्री घोषित करवा दिया था। कई लोगों ने उन्हें गलत समझा वो कुर्सी के भूखे नहीं हैं। वो इतिहास बनाना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि भूतपूर्व प्रधानमंत्रियांे में उनका भी नाम हो। पुराने जमाने से प्रधानमंत्री बनने के लिए लोगों ने क्या क्या नहीं किया। कई बन गये कई नहीं बन पाये। जो बन गये वो अमर हो गये। बाकी सब अमरसिंह हो गए। चौधरी चरण सिंह और चन्द्रशेखर चाहे जैसे बने चाहे जितने दिन के लिए बने लेकिन कहलाएंगे तो भूतपूर्व प्रधानमंत्री। और एक बाबू जगजीवनराम थे। जिंदगी दे दी उन्होंने कांग्रेस के लिए मगर इंदिरा जी ने ऐसा रास्ता रोका कि प्रधानमंत्री बनने की हसरत लिए वो दुनिया से चले गए।
अब राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बातें चल रही हैं। ये कोई उम्र है प्रधानमंत्री बनने की। राहुल गांधी को खुद सोचना चाहिए कि जब आडवाणी जी जैसे सीनियर आदमी प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश रखते हैं तो उन्हें बन जाने दें। मगर नहीं साहब गांव गांव घूम रहे हैं। प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। अरे जब तुम इतनी कम उम्र में प्रधानमंत्री बनना चाहते हो तो आडवाणी जी 84 साल में प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो उसमें क्या बुराई है ? कुछ तो सोचो।
पार्टी में भी कोई कम दुश्मन तो हैं नहीं। अब जैसे तैसे कुछ सर्वे वगैरह करवा कर हमने ऐसा माहौल बनाया कि हमारी पार्टी सत्ता में आने वाली है। तो दुश्मनों ने हल्ला करना शुरू कर दिया कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाएंगे। यानी अभी खीर पकी नहीं और खाने वालों में झगड़ा शुरू। सोचो आडवाणी जी को कितना बुरा लगा होगा। उनका ही जूनियर उनका ही प्रतिद्वंद्वी। वो तो नरेन्द्र मोदी को समझा दिया गया है कि जब समय आएगा तब देखेंगे अभी से मचलना मत। पहले सरकार बनाने की नौबत तो आए। अब आडवाणी जी सामने रहेंगे तो नरेन्द्र मोदी की हिम्मत है क्या कि प्रधानमंत्री बन जाए।
हम सब को भी उन पर दया आती है। आदमी जिंदगी भर काम करे और जब इनाम लेने का मौका आए तो वरिष्ठता के नाम पर कुर्सी दूसरे को थमा दी जाए। अब देखिए राम मंदिर आंदोलन आडवाणी जी के नेतृत्व में चला। अटलजी कहीं गए नहीं। दिल्ली में बैठे गोलमोल बातें करते रहे। जब चुनाव हुए, पार्टी जीती तो प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार। अरे उन्हें खुद ही कह देना था कि आडवाणी को बनाओ सारी मेहनत उसी की है। मगर उन्हेें गृहमंत्री बना दिया। वो तो आडवाणी जी ने लड़झगड़ कर अपने को उपप्रधानमंत्री बनवा लिया तो ठीक रहा वरना गृहमंत्री को कौन याद करता। गृहमंत्री तो बूटा सिंह भी रह चुके हैं। उप ही सही प्रधानमंत्री तो कहलाए।
हम सबने तो बहुत मना किया कि अब रथयात्रा से कुछ नहीं होने वाला। जहां अपनी सरकारें हैं वहां हमारे मुख्यमंत्रियों ने कोई कम गुल नहीं खिलाए हैं। इसीलिए जबरन फजीहत नहीं कराओ। मगर माने नहीं कहते हैं कि हम तो पुरानी रथयात्रा वाले सुनहरे दिन वापस लाएंगे। अभी सन्यास ले रहे थे अब बारात निकाल रहे हैं। कुछ समझ नहीं आता इन बुजुर्गों का। ............सुखनवर
15 09 2011

Monday, September 12, 2011

अमरसिंह भी अंदर

अनेक मुहावरे हैं जैस होम करते हाथ जले जिनका मायने ये होता है कि आप किसी का भला करने गये और खुद मुसीबत में पड़ गये। अब एक नया मुहावरा बन सकता है कि आप अमर सिंह हो गये। ये तो वही हुआ कि भला करने गये और अमर सिंह हो गये। अमरसिंह एक उद्योगपति हैं। काफी पैसा हो जाने से आदमी अमरसिंह हो जाता है। और अमरसिंह हो जाने से आदमी को यह मुगालता हो जाता है कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर स्थापित है और वह शेषनाग मैं हूं। या ये दुनिया मैं चला रहा हंू। या मेरे बिना पत्ता नहीं खड़कता। आजकल मीडिया चैनलों के कारण भी बहुत लोगों को ये गुमान हो जाता है कि इस धरा पर जो कुछ हो रहा है वो उनकी इजाजत से हो रहा है।
जब पहली बार यू पी ए सरकार बनीं तो सोनिया जी ने एक पार्टी दी। सारे यूपीए दलों को बुलाया। वाम दलों को भी बुलाया। सब लोग पार्टी में अंदर थे। अमरसिंह और मुलायम सिंह भी पंहुचे। उन्हंे सोनिया जी ने बुलाया ही नहीं था। पर वामदलों ने कह दिया था कि तुम लोगों को तो बुलाना चाहिए। तुम लोग आ जाना। मगर गेट पर घुसने नहीं मिला। इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है। मगर वाह अमर सिंह। गेट से भगाए जाने को भी झेल गये। बोले हमें भोज में घुसने न मिले तो भी सोनिया जी हमारी नेता हैं। अमरसिंह के पास भांति भांति के गणित रहते हैं। उनने हिसाब लगा लिया कि अभी बुराई मोल लेना ठीक नहीं। उनने ये शिक्षा नहीं ली कि बिना बुलाये खाने पर नहीं जाना चाहिए। आत्मसम्मान की दो रोटी ज्यादा बेहतर हैं।
अमेरिका से परमाणु संधि पर जब विवाद हुआ तो वामदलों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सरकार अल्पमत में आ गई। अमरसिंह तत्काल सक्र्रिय हो गये। उन्हांेने बिना देर किए सरकार को बहुमत में लाने के लिए प्रयास शुरू कर दिये। उनके प्रयास सफल हुए। सरकार बच गई। जब शादी हो जाती है तो बहुत बार बिचौलिए के योगदान को नकार दिया जाता है। आज पूछा जा रहा है कि अमरसिंह की तो सरकार थी नहीं फिर उसे बचाने के लिए अमरसिंह ने पैसे क्यों लगाए। बातबहादुर अमरसिंह गंभीर रूप से बीमार होने के बावजूद आज तिहाड़ जेल में पंहुच चुके हैं। अमरसिंह की हालत बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की सी है। दीवाना आज जेल में है। जिस सरकार को उनने बचाया था वो आज भी है। वो सरकार बेदाग और अमरसिंह दागदार।
अमिताभ बच्चन जब मुसीबत मंे थे तब अमरसिंह ने उनकी सहायता की। वे उनके परिवार के सदस्य बन गये। यहां तक कि समाजवादी पार्टी के प्रचार के लिए निकल पड़े। जया बच्चन सांसद बन गईं। आज अमरसिंह अमिताभ बच्चन के परिवार से बाहर हैं। जया बच्चन समाजवादी पार्टी के अंदर हैं।
हमारे यहां बहुत से प्रांतीय दल राष्ट्रीय दलों से ज्यादा शक्तिशाली हैं मगर राष्ट्रीय मामलों में प्रांतीय दल और उनके नेता चुप रहते हैं। ये राष्ट्रीय सरकार में शामिल होते हैं मगर केवल मलाई खाने के लिए। मठा पीने का काम मुख्य दल को करना होता है। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा। यूपीए हो या एनडीए। जब परमाणु संधि पर विवाद चला तो लगा देश में केवल दो पक्ष हैं कांग्रेस और वामदल। बाकी सब चुप। उनके प्रांत का मामला नहीं है। उनका प्रांत तो जैसे भारत में है ही नहीं।
अमरसिंह पहले मुलायम सिंह के प्रशंसक बने। फिर सलाहकार बने। फिर मालिक बनने की कोशिश करने लगे। उन्हें लगा कि समाजवादी पार्टी उनकी हाई स्कूल छाप अंग्रेजी से चल रही है। समाजवादी पार्टी मुलायमसिंह की प्रोप्राइटरशिप कन्सर्न है। अमरसिंह उसे पार्टनरशिप में बदलना चाहते थे। मुलायमसिंह जी के सुपुत्र पार्टी का नेजा सम्हाल चुके हैं। समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह की बनाई हुई पार्टी है। वो बिना किसी अमरसिंह के सत्ता में आ चुकी है। इसीलिए आज अमरसिंह कहीं नहीं है। पहले भी उनके साथ कोई नहीं है। आज भी उनके साथ कोई नहीं है।
भारत की जनता को इन सब लोगों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्यांेकि अंदर क्या पकता है ये हम आप नहीं जानते।
.............................................सुखनवर
09 09 2011

Thursday, September 1, 2011

ब्रेंडेड आंदोलन का इवेंट मैनेजमेंट

ब्रेंडेड आंदोलन का इवेंट मैनेजमेंट
ये अच्छा हुआ कि पिछले दिनों देश से भ्रष्टाचार खत्म हो गया। जिस दिन रंग गुलाल हुई और खुशियां मनाईं गईं उस दिन के बाद से सारे भ्रष्टाचारी साधू हो गये। बहुत दिनांे से सब लोग परेशान थे कि देश से भ्रष्टाचार कैसे खत्म होगा। कब खत्म होगा ? पिछले बार भ्रष्टाचार खत्म हो ही गया था। जयप्रकाश जी ने खत्म कर दिया था। मगर फिर ऊग आया। जड़ों में मठा नहीं डाला गया था। कुछ दिन दबा रहा फिर निकल आया। उस समय जयप्रकाश जी आगे थे। भ्रष्टाचार से परेशान लोग उनके पीछे थे। इस बार भ्रष्टाचार के पुनर्जन्म की कोई गुंजाइश नहीं है। पुराना जमाना और था। उस समय भ्रष्टाचार से लड़ने के तरीके भी पुराने थे। इवेन्ट मैनेजमेंट नाम की कोई चीज नहीं थी। टी वी नहीं था। 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनल नहीं थे। इतने ओजस्वी टी वी वाले नहीं थे। अब तो टी वी वालों को देखकर लगता है कि क्या जरूरत किसी अदालत की। क्या जरूरत किसी वकील की। उत्साह से ऐसे भरे हुए कि हकलाने लगते हैं, लड़ने लगते और मुंह से झाग छोड़ने लगते हैं।
इसको कहते हैं योजनाबद्ध तरीके से काम करना। क्रमवार काम करना। एक के बाद एक कदम उठाना। अपने टाइम टेबिल पर काम करना। चौतरफा मार करना। पूरे देश में एक साथ आंदोलन। आंदोलन का झंडा होना चाहिए तो ठीक है और कोई झंडा क्यों रहे तिरंगा ही ठीक रहेगा। मगर ये क्या है लोग तिरंगा सीधे पकड़े रहते हैं। आप लोग ऐसा कीजिए कि इस इवेंट के लिए इसे ऊपर नीचे लहर के समान लहराइये। आजकल ब्रेंड के साथ ब्रंेड एम्बेसेडर, बें्रड फ्लैग, ब्रेंड कास्ट्यूम, बैं्रड स्लोगन सबकी जरूरत होती है। सारी व्यवस्था हो चुकी है। ब्रंेड स्लोगन रखो। वंदे मातरम। भ्रष्टाचार से लड़ाई का ये कैसा स्लोगन ? देखिये बहस मत करिये। हमें काम करने दीजिए। दादा जी के पीछे बैकड्राप में गांधी का बड़ा सा पोट्रेट रखो। एक दम सीधे पब्लिक के दिमाग में जाना चाहिए। एक वो गंाधी एक ये गांधी। मगर ब्रैंड एम्बेसेडर कौन रहेगा। जैसा आंदोलन है उसी टाइप का होना चाहिए। पता करो कौन हो सकता है जो कुछ दिन अनशन भी कर सके। अड़ियल हो, किसी की न माने।
पता चला कि महाराष्ट्र के एक गांव में एक लड़ाकू आदमी रहता है। कई बार अनशन कर चुका है। रामदेव टाइप नहीं निकलेगा कि तीन दिन में हवाइयां उड़ने लगें। महाराष्ट्र में कई मंत्रियांे को हटवा चुका है। अख्खड़ आदमी है। किसी की नहीं सुनता। बस एक मुश्किल है। राष्ट्रीय स्तर का नहीं है। प्रांतीय स्तर का है। चलो कोई बात नहीं। उन्हंे ही पकड़ो। मगर ध्यान रखना-आंदोलन और बातचीत हम करेंगे। हम तीनों की यह प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है। ये हमारी कंपनी का इवेंट है। इसमें जो चाहे वो आए लेकिन अपनी सीमा में रहे। जो और लोग हैं उनको भगाओ। अपमान कर दो खुद भाग जाएंगे। दादा को आगे रखो। इवेंट के हिसाब से सौ जोड़ी सफेद कुर्ता पाजामा और टोपी तो दादा के लिए रखो। आंदोलन के समय हर चार घंटे में उनकी ड्रेस बदलो। हमेशा एकदम झक सफेद ड्रेस दिखना चाहिए। टी वी पर अच्छा दिखेगा। गांधी से इनकी तुलना करवाओ। तीन चार बार राजघाट ले चलेंगे। वहां बिल्कुल गांधी टाइप मुद्रा में एक फोटो सैशन करवा देना। दादा तो महाराष्ट्र वाली टोपी पहनता है। ऐसा करो टोपी को भी ब्रेंड बनाओ। उसमें लिखो आइ एम अन्ना। बहस मत करो यार। एकाध लाख टोपी बनवा कर बंटवा दो। पैसे को मुंह मत देखा। ये क्यों क्यों मत पूछा करो।
देश का मतलब होता है दिल्ली। यहीं पर सारे टी वी वाले हैं। उनको सबसे पहले साथ में लो। दिल्ली के स्कूलों में सौ डेढ़ सौ बसंे लगवा दो। बच्चों केा ढ़ो ढ़ो कर लाएंगी। बच्चों को दे दो मोमबत्ती और तिरंगा। मंुह पे पुतवा दो तिरंगा जैसे क्रिकेट मैच हो रहा हो। माहौल खिंच जाएगा। और बात समझ लो अपना मुद्दा है। जनलोकपाल बिल। इसके बारे में पब्लिक से कोई बात नहीं करना है। इस बिल पर कोई बहस हमें करना ही नहीं है। ये बिल क्या है ये किसी को पता नहीं चलना चाहिए। बस मुद्दा ये उठाओ कि इसमें प्रधानमंत्री को आना चाहिए। इसी पर बहस चलने दो। सरकार को उधेड़ के रख दो। जनता के बीच ये संदेश चला जाना चाहिए कि देश में तीन भ्रष्टाचारी हैं। प्रधानमंत्री, कपिल सिब्बल और चिदंबरम। सरकार भ्रष्ट है मतलब केन्द्र की कांग्रेस सरकार भ्रष्ट है। दस बारह दिन तो ये दादा अनशन खींच ले जाएगा। नहीं भी खींच पाएगा तो भी अपना काम तो बन जाएगा। यदि तबियत काफी बिगड़ गई तो बिगड़ जाए। अपना काम बन जाए फिर इनका जो होना होगा सो होगा। पूरे आंदोलन को इतनी ऊंचाई पर ले जाना है कि फिर आगामी तीस साल तक कोई आंदोलन न हो पाये। जनता का सारा गुस्सा प्रेशर कुकर की सीटी के समान निकल जाए। .....................................सुखनवर
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01 09 2011






अंग्रेजी बोलने वालों का संघर्ष


बुधिया खाना बना रही थी। सामने टी वी चल रहा था। बच्चे खेलते हुए बाहर चला गया। उसेन देखा कि एक बहुत सफेद झक्क कपड़े पहने दादा जी टोपी लगाकर बैठे हैं। उनके सामने हजारों लोग तिरंगा झंडा लहरा रहे हैं। ऐसा तो टी वी चाहे जब दिखता रहता है। पर आज खास बात ये थी कि ये दादाजी बैठे थे और सामने लोग तिरंगा लिये थे। दादा जी भाषण दे रहे थे। वो मालूम नहीं क्या बोल रहे थे। कुछ समझ नहीं आ रहा था। पर बाकी लोग बहुत जोर जोर से नारे लगा रहे थे सो लग रहा था कि जरूर कोई बड़ी बात कह रहे होंगे। उसका बड़ा लड़का घर आया तो उसने पूछा कि ये क्या हो रहा है। लड़के ने बताया कि बहुत अच्छा काम हो रहा है। अपने सब्जी के ठेले में से पुलिस वाला जो सब्जी उठा ले जाता है उस पर रोक लगने वाली है। वो जो डंडा फटकार कर हमसे पैसा वसूलता है वो भी अब खत्म होने वाला है। राशन दुकान वाला चाहे जब कह देता है कि राशन नहीं है मिट्टी का तेल नहीं है वो भी खत्म होने वाला है।
बुधिया बहुत खुश हुई। उसने लड़के से पूछा कि ये लोग ये बात तो कह नहीं रहे। फिर तू कैसे कह रहा है कि ये लोग पुलिसवाले राशनवाले का अत्याचार खत्म करने वाले हैं। लड़के ने बताया कि ऐसे सारे कामों को भ्रष्टाचार कहते हैं। ये खत्म होने वाला है। बुधिया को विश्वास नहीं हुआ। लड़के ने बताया कि अबकी बार जरूर खत्म हो जाएगा क्योंकि अब अंग्रेजी बोलने पढ़ने लिखने वाले लोग ये कह रहे हैं। हम लोगों की सुनता कौन है। जब अंग्रेजी में बात कही जाती है, जब अंग्रेजी बोलने वाले बच्चे बूढ़े ये बात कहते हैं तो उसका वजन होता है। ये लोग सफेद रंग की टी शर्ट पहने हैं। उसमें अंग्रेजी में लिखा है। काले लाल गोले बने हैं। इस सबका मतलब होता है अम्मा तू नहीं समझेगी। ये लोग बहुत ज्ञानी हैं। इन लोगों ने खुद अपना कानून लिखा है। उसे बनवाने वाले हैं।
बुधिया को फिर भी समझ नहीं आया। उसे समझ नहीं आया कि अभी किस कानून में लिखा है कि झूठ बोलो। बेईमानी करो। फिर भी दुनिया कर रही है। इन्हें कोई रोकता क्यांे नहीं ? अभी हमारी सब्जी नहीं बिक पाती है। मुश्किल से घर चल रहा है उस पर से एक बड़ी दुकान खुल गयी है चमचमाती हुई उसमें कार में बैठ कर लोग जाते हैं और सब्जी खरीदते हैं। हम दो पैसा कमा रहे थे तो ये भी इन अमीरों से नहीं देखा गया।
लड़के ने समझाया कि अम्मा उनका मतलब दूसरा है। वो बड़े लोग हैं। उन्हें बड़ा खेल खेलना पड़ता है। उनके खेल करोड़ों के होते हैं। उन्हें करोड़ों खिलाना पड़ते हैं। उनके लिए वो भ्रष्टाचार है। ये लोग एक दूसरे को जेल डालते रहते हैं। सारा नियम कानून वो ही समझते हैं। वही तोड़ते हैं। वही जेल जाते हैं। वही मुकदमा लड़ते हैं। वही कानून बनाते हैं। वही तोड़ते हैं। इन बड़े धंधे वालों को ये करोड़ों देना बहुत अखर रहा है। इसीलिए अब एक और कानून बना रहे हैं। हम लोगों के लिए तो पहले से कानून है। हमारी ठुकाई तो उसी कानून से होती है। पिछले साल पुलिस ने बापू जी को अंदर कर दिया था। एक साल लग गया उनको छुड़वाने में। कितना पैसा लगा। उसी अदालत में कितना पैसा लगा वकील को दिया बाबू को दिया। पुलिस को दिया। तब कहीं जाकर छूट पाये बापू।
अच्छा हुआ अभी ये नया कानून नहीं बना है। छोटी अदालत, मंझली अदालत, बड़ी अदालत और कहते हैं कि एक सबसे बड़ी अदालत दिल्ली में है। अपन लोगों के लिये तो अपने शहर की अदालत ही ठीक है। अपन कभी दिल्ली गये तो उस अदालत में तो घुसने भी नहीं मिलेगा। अब ये अंग्रेजी बोलने वाले आपस में लड़ रहे हैं। अभी कुछ दिन बाद एक दिन शहर बंद होगा। अम्मा उस दिन की रोटी पानी का इंतजाम करना पड़ेगा। उस दिन की कमाई तो गई। .................................सुखनवर
26 08 2011

Wednesday, August 24, 2011

सपना

अरे ये क्या हो रहा है भाई। वकील लोग हड़ताल पर हैं। क्यों हैं हड़ताल पर। कह रहे हैं अब हम अन्ना के साथ हैं। अब हम भ्रष्टाचारियों के मुकदमे नहीं लड़ेंगे। और तो और ये जो अदालतों में बैठे बाबू लोग खुले आम रिश्वत लेते हैं उन्होंने भी कह दिया है कि अब हम देश के लिए भूखे मरेंगे और रिश्वत नहीं लेंगे। वो लेंगे कैसे जब देने वाले सब देशभक्त हो गए हैं। वो देंगे ही नहीं। वो रिश्वत देने के बजाए अनशन कर देंगे। बाबू घर आ जाएगा और तारीख बढ़ाकर कागज दे जाएगा।
पुलिस वाला खड़ा रहेगा पर किसी रिक्शेवाले से पैसा नहीं झटकेगा। जनता बेखौफ होकर थाने में घुसेगी। उसे मालूम है कि उसकी शिकायत सुनने के बजाए उसे शिकायत करने के जुर्म में अंदर नहीं किया जाएगा। जुआरी जुआ खेलना बंद कर देंगे। सटोरिये सट्टा खिलाना बंद कर देंगे। जब जुआ सट्टा चोरी बंद हो जाएगी तो पुलिस थाने तो मंदिर हो जाएंगे। पुलिस वाले सभी पुजारी हो जाएंगे। हर थाने में वैसे भी मंदिर है ही। उसी में थानेदार साहब का दफतर लग जाएगा। थाने जाएंगे तो पैसे खर्च नहीं होंगे। हर पुलिस वाला अपनी तनखाह में से ही गुजर करेगा। इसे कहते हैं ईमानदारी की कमाई। किसी ने यदि किसी खाकी वर्दी वाले को भ्रष्ट करने की कोशिश की तो आमरण अनशन शुरू कर दिया जाएगा।
कलेक्टोरेट जाइये। आर टी ओ जाइये। पी डब्लू डी जाइये। नगर निगम जाइये। चारों तरफ साधू ही साधू। कोई बेइमान रिश्वतखोर ढूंढे ही नहीं मिल रहा। सब साधू कह रहे हैं बताइये आपका क्या काम है ? आपस में छीना झपटी कर रहे हैं। नहीं हम करेंगे आपका काम। नहीं हम करेंगे आपका काम। खबरदार जो हमें पैसा दिखाने की कोशिश की। आप हमें भ्रष्टाचारी बनाना चाहते हैं। कहां रहते हैं आप। हम आपके घर के सामने आमरण अनशन कर देंगे। हमारे डिपार्ट को बदनाम करने की कोशिश न करें। अब हम देश के लिए काम करेंगे। अब हमें ईमानदारी से काम करने में बिलकुल शर्म नहीं आती।
सड़कें सीमेन्ट से बनने लगीं। उधड़ना बंद हो गयीं। ठेकेदारों ने कमीशन देना बंद कर दिया। इंजीनियरांें ने कमीशन लेना बंद कर दिया। भवन पुल सभी बिलकुल मजबूत। कोई छूट नहीं। ईमानदारी से काम करना होगा। वरना वरना क्या - आमरण अनशन।
स्कूलों में फीस घट गई। बोले जरूरत से ज्यादा फीस नहीं लेंगे। जितना पढ़ायेंगे उतनी ही फीस लेंगे। किताबों और ड्रेस में कमीशन नहीं खायेंगे। बच्चों के मां बाप से अच्छा व्यवहार करेंगे। हर बच्चे को बराबर का समझेंगे। उनके के साथ भेदभाव नहीं करेंगे।
अस्पतालों में डाक्टर केवल नौकरी करेंगे। प्राइवेट प्रेक्टिस नहीं करेंगे। मरीज को अपने घर नहीं बुलायेंगे। अस्पतालों में असली दवाएं मिलेंगी और मरीजों को बाहर से नहीं लेना पड़ंेगी। उल्टी सीधी दवाईयां नहीं लिखी जाएंगी। मरीजों को जबरन अस्पताल में भर्ती नहीं किया जाएगा। बिना जरूरत आई सी सी यू में भर्ती नहीं किया जाएगा। बेमतलब ऑपरेशन नहीं किया जाएगा। मरीजों ने भी कह दिया कि मेडिकल बिल लेने के लिए अस्पताल में भर्ती नहीं होंगे।
अब कोई लड़की दहेज के कारण बिना शादी के नहीं रह जाएगी। लड़कों के मां बाप ने तय कर लिया है कि अपने लड़कों की शादी में दहेज नहीं लेंगे।
आप हंस रहे हैं ? आप क्यों हंस रहे हैं ? वैसे आप ठीक सोच रहे हैं। आपको अपने आप पर हंसना चाहिए। अन्ना के भरोसे न रहिये। अपने को बदलिये। वरना यूं ही सपना देखिये। ...........................सुखनवर
17 08 2011

ठप्प करने वालों का धर्म


हमारे भाजयुमो के लड़के संसद की तरफ बढ़ रहे थे। कुछ हजार लोग थे। उन्होंने कुछ बेरिकेड तोड़े थे और कुछ पत्थर फेंके थे। वो आगे बढ़ रहे थे। बढ़ते चले जा रहे थे। यदि पुलिस न रोकती तो संसद पर पंहुच जाते। संसद में बहस करने के लिए सांसद तो थे ही। ये क्यों बढ़ रहे थे ? इनके इरादे साफ थे। इनने छुपाए भी नहीं थे। हर पार्टी की युवा शाखा को इसी काम में लगाया जाता है। चढ़ जा बेटा सूली पर भला करेंगे राम। तो युवा अपने काम में लग चुके थे। पुलिस तो पूरे संसद के सत्र के दौरान ही तैयार रहती है। उसने पानी की बंदूक चलाई। फिर लाठियां भांजी। जुलूस तितर बितर हो गया। शाहनवाज खान ने तुरंत चिदंबरम पर आरोप लगाया कि इसी आदमी ने हमारे लड़कों को पुलिस से पिटवाया। बहुत गुस्से में थे। उनने कह दिया कि अब चिदंबरम के स्तीफे के नीचे किसी बात से हम नहीं मानेंगे। उनने अपने स्तीफे की बात नहीं की जबकि लड़कों को पिटने के लिए भेजा तो उन्हीं ने था।
अखबारांे मे छपा और टी वी चैनलों ने खैर अपना आग लगाने का खेल पूरी ताकत से खेला ही कि सबका निशाना सोनिया और शीला हैं। दरअसल आज के समय में कुल मिलाकर भाजपा इस दौरान महिला नेताओं से परेशान है। उत्तर प्रदेश में मायावती नाक में दम किए है। बंगाल में ममता ने दगा दे दिया। अपने ही घर में उमा ने क्या कम कुहराम मचाया। उधर जयललिता घास नहीं डालती। वो अलग से नरेन्द्र मोदी को भर बुला लेती है। जबकि भाजपा की नेता स्वयं महिला हैं।
मगर सारा गुस्सा सोनिया पर क्यों ? शीला पर क्यों ? 2004 में हमारे स्व प्रमोद महाजन जी ने सब सैट कर दिया था। पंडितों ज्योतिषियों से पूछ लिया था। सर्वे करवा लिया था, जीत रहे थे। अरबों रूपये खर्च कर दिये थे। शाइनिंग इंडिया का अभियान चला रखा था। सरकार अपनी थी। जलवा ही कुछ और था। मगर ये सोनिया गांधी ने चुनाव में उतर कर सब कबाड़ा कर दिया। हम कहते रहे । विदेशी महिला है। हिन्दी आती नहीं। भारतीय संस्कृति को जानती नहीं है। विधवा है। मगर क्या बताएं साहब सब किया धरा मिट्टी में मिल गया। अच्छी भली सरकार चल रही थी। समय से पहले चुनाव करवा लिए कि चुनाव तो जीत ही रहे हैं। मगर बैठे ठाले सरकार से बाहर हो गए। अब कहते हैं कि हमारी सरकार इतनी अच्छी थी। लोग पूछते हैं कि फिर हार क्यों गए ?
शीला दीक्षित की कहानी भी सोनिया जी से कुछ कम नहीं है। हर बार चुनाव जीत रही हैं। दिल्ली में मेटो चलना शीला दीक्षित की उपलब्धि मानी जाती है। दिल्ली में कभी भाजपा की सरकार थी ये बात लोग भूल चुके हैं। दिल्ली में इतने अतिक्रमण तोड़े गए। दुकानें और घर तोड़े गए उसके बाद भी लोगों ने शीला दीक्षित को जिताया। शीला दीक्षित और सोनिया जी की खासियत है कि वो मीडिया को घास नहीं डालती। मीडिया के छोकरे अपने ओछे प्रश्नों को लेकर घूमते रहते हैं और वे कार में आगे बढ़ जाती हैं। बहुत बार तो वो डांटती भी हैं कि जाइये रिपोर्ट पढ़ कर आइये फिर बात कीजिए। मीडिया यदि जिम्मेदार हो जाए तो देश का काफी भला हो जाए।
संसद सत्र शुरू हुआ तो घोषित किया गया कि मंहगाई पर घेरेंगे। फिर कहा कि कामनवेल्थ घोटाले पर घेरेंगे। फिर टू जी स्पेक्टम पर घेरेंगे। तीनों पर घेराबंदी होती रही। समय निकल गया। अब वही उदास संसद है। उंघते हुए कुछ गिनेचुने सांसद। उनके बीच में कुछ रूटीन सवाल जवाब। संसद मेें कोई थ्रिल नहीं बचा। अब इंतजार है कि इसी बीच कोई घटना घट जाए तो उसी बहाने कुछ सक्रियता हो जाए।
हर संसद सत्र के पहले अब रणनीति बनती है कि आगामी सत्र में क्या होना है। अब इसे घोषित कर देना चाहिए कि रणनीति इस बात की बनती है कि कैसे कुछ नहीं होने देना है। जब संसद का सत्र नहीं चलता तब मांग होती है कि विशेष सत्र बुलाया जाए। जब सत्र होता है तब उसे ठप्प कर दिया जाता है। दरअसल अब चर्चा करने वाले लोग बचे नहीं हैं। अब ठप्प करने वाले बचे हैं तो अपना धर्म पूरा कर रहे हैं।-------------सुखनवर 12 08 2011

युवा लेखक के बिन मांगे सुझाव

एक युवा कॉलम लेखक चेतन भगत ने भाजपा को पांच बिना मांगे सुझाव दिये हैं। उनमें से एक तो बहुत ही जबरदस्त है। ये सुझाव वैसा ही है जैसे ये सवाल कि क्या आपने चोरी करना छोड़ दिया है ? सुझाव ये है कि भाजपा को एक साफसुथरी भ्रष्टाचार मुक्त पार्टी बनना चाहिए। इसके लिए उसे हर साल दस नेताओं के नाम घोषित करना चाहिए और उन्हें पार्टी से निकाल देना चाहिए। कुछ ही सालों में भाजपा एक नई साफसुथरी पार्टी बन जाएगी। यदि भाजपा इस सुझाव को माने नहीं केवल विचार ही करे तो उसका परिणाम क्या होगा ? पार्टी यह स्वीकार करेगी कि वो भ्रष्ट है। वो इतनी भ्रष्ट है कि उसमें से हर साल दस भ्रष्ट लोगों को नाम घोषित कर निकाला जा सकता है। भ्रष्टों की संख्या इतनी अधिक है। यहां पार्टी की मुश्किल ये है कि लोकायुक्त से लेकर आम जन तक हर कोई कह रहा है कि येदियुररप्पा भ्रष्ट हैं पर उन्हें पार्टी की तो छोड़ो मुख्यमंत्री से तक हटाया नहीं जा पा रहा है। किसी को भ्रष्ट कहना और फिर उस कारण उसे पार्टी से निकालना कितना कठिन होता है ये तो भ्रष्ट ही जानता है। भ्रष्ट की गति भ्रष्ट जाने। और फिर अंतिम फैसला तो अदालत का होता है। अदालत के फैसले के बिना आप किसी को कैसे भ्रष्ट कह सकते हैं। तो ये कहना तो बहुत ही कठिन है कि ये दस लोग भ्रष्ट हैं। आखिर ये निर्णय कौन करेगा कि फलां लोग भ्रष्ट हैं। जो लोग निर्णय करेंगे वो भ्रष्ट नहीं हैं इसका निर्णय कौन करेगा।
फिर भाजपा के ऊपर भी कोई है। वो सर्वशक्तिमान है। हर पार्टी का हाई कमांड है। हाई कमांड के निर्णय को चुनौती नहीं दी जा सकती। चाहे कांग्रेस का हो या भाजपा का हो या कम्युनिष्ट पार्टी का। ये हाई कमांड पार्टी हित में जनता से ऊपर होकर सोचता है। पार्टी के शीर्ष नेताओं की बैठककक्ष के पीछे एक अंधेरा बंद कमरा होता है। नेता गण अपना निर्णय लिखकर उस कमरे के अंदर रख देते हैं। थोड़ी देर में हाईकमांड का निर्णय आ जाता है। ये कब क्या निर्णय कर ले। कोई भरोसा नहीं। डी एम के के हाई कमांड के निर्णय के कारण ही आज उसके नेता जेल में हैं।
दूसरा सुझाव और जबरदस्त है। वो ये कि पार्टी अपना प्रधानमंत्री घोषित करे। ये कहने से काम नहीं चलेगा कि हमारे पास बहुत लोग हैं। यदि ये युवा लेखक आडवाणी जी को मिल जाता तो पिट ही जाता। इसे भाजपा के बारे में इतना भी ज्ञान नहीं है और ये भाजपा को सुझाव देने चला है। क्या इसे मालूम नहीं कि पिछले चुनाव में आडवाणी जी बिना जीत की गुंजाइश के स्पेशल मीटिंग बुलाकर अपने आप को प्रधानमंत्री घोषित करवा चुके हैं। फिर सन्यास ले चुके हैं। फिर सन्यासी चोला उतार कर फंेक चुके हैं। वे जबतक हैं तब तक भाजपा में कोई प्रधानमंत्री बनने की सोच भी नहीं सकता। और फिर टीम में दस लोग दौड़ रहे हैं और आप दौड़ को बीच में रोक के एक को फर्स्ट कह दोगे तो बाकी लोग काहे को दौड़ेगे ? ये तो खेल भावना के विपरीत है। जब तक नाम घोषित नहीं है तब तक हर किसी के मन में आस है। आज नाम घोषित हो जाएगा तो बाकी लोग कहेंगे कि भैया आप को प्रधानमंत्री बनना है तो आप मेहनत करो जिता लो चुनाव।
चेतन भगत ने ये सुझाव भाजपा को ही क्यों दिये गये हैं ? दरअसल चेतन भगत को भाजपा से बहुत आशाएं हैं। उन्हें लगता है कि भाजपा में एक आदर्श दक्षिणपंथी पार्टी होने के पूरे गुण हैं। यदि भाजपा रिपब्लिकन पार्टी या डेमोक्रेटिक पार्टी टाइप की कोई पार्टी हो जाए तो देश को अमेरिका बनने से कौन रोक सकता है। वैसे भी मेरा भारत महान। आखिर हम इस देश में क्यों रह रहे हैं ? अमेरिका क्यों नहीं जा रहे। ताकि एक दिन ये देश अमेरिका हो जाए। बाजू में चीन भी अमेरिका बनने में लगा हुआ है। चारों तरफ दुनिया के देश अमेरिका बनने में लगे हुए हैं। हमारे देश में समस्या ये है कि पंथ का कोई झगड़ा नहीं है। नीतियों में कोई मतभेद नहीं है। इसलिए मतभेद के मुद्दे हैं परिवारवाद, सोनिया गंाधी, राहुल गांधी बस। इससे ज्यादा कुछ नहीं। दिक्कत ये कि ये मुद्दे नहीं हैं व्यक्ति हैं। और कांग्रेस को चुनाव जिता ले जाते हैं। .........................सुखनवर 29 07 2011