Thursday, March 29, 2012

वो बेचारी


    वो भाग रही थी। वो भाग भाग कर छुप रही थी। वो छुप छुप कर भाग रही थी। मैं उसके पीछे था। वो मेरे आगे थी। वो डरी हुई थी। मैं शेर बना हुआ था। दौड़ लगातार जारी थी। वो अचानक बस में घुस गई। मैं पीछे दौड़ा। बस चली गई। मैं आटो से भागा। उसे पकड़ा मगर वो बस से उतरकर लोकल ट्रेन में चढ़ गई। मैं भी उसी ट्रेन मंे चढ़ गया। वो उतरी मैं उतरा। मैं भागा वो भागी। थोड़ी देर में मैं भूल गया कि मैं उसके पीछे दौड़ रहा था। अब वो मेरे पीछे दौड़ने लगी। मैं भागने लगा। ये भागादौड़ी जारी रही। मैं हांफने लगा। उसकी सांस चढ़ गई। वो थक कर चूर हो गई थी। वो थकी थी। मैं फिर तरो ताजा था।
मैंने उससे पूछा: तू भाग क्यांे रही थी।
उसने कहा: छुपने के लिये, तुमसे बचने के लिए।
मैं: लेकिन क्यों
वो: आजकल मैं हर किसी से बचती फिरती हूं
मैं: क्यों
ैवो: क्योंकि आज कल हर कोई मेरा मरद बना फिर रहा है
मैं: ऐसा कैसे हो सकता है तुम कोई हूर की परी हो जो हर कोई तुम्हारा दीवाना बना फिर रहा है।
वो: मैं क्या हूं ये तो मैं नहीं जानती पर इन सब लोगों को अच्छे से जान गई हूं जो मेरे मरद बनने की कोशिश में हैं
मैं: मगर तुम्हारे भागने से क्या होगा क्या ये लोग तुम्हें छोड़ देंगे ?
वो: नहीं बिलकुल नहीं। ये लोग मुझे छोड़ ही नहीं सकते। मेरे भरोसे इनकी दुकानदारी चल रही है। मुझे छोड़ देंगे तो इनकी दुकानें बंद नहीं हो जाएंगीं। ये मरते दम तक मेरे पीछे पड़े रहेंगे।
मैं: मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तुम किनकी बात कर रही हो।
वो: देखो हर पांच साल में मैं स्वयंवर रचाती हूं। जो लोग मुझे पाना चाहते हैं वो स्वयंवर में आते हैं। सबको आजादी है। मगर ये लोग नहीं आते। जो स्वयंवर में जीत जाता है मैं उसके साथ रहती हूं। जो लोग स्वयंवर मैं शामिल नहीं होते वो जीते हुए को पांच साल कोसते हैं और कहते रहते हैं कि मेरी शादी झूठी है।
मैं: अरे देवी जी मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा आप क्या कह रही हैं। पांच साल। स्वयंवर। हार जीत। स्वयंवर में भाग न लेना।
वो: आपको समझ में आएगा भी नहीं। क्योंकि आप भी इन फरेबियों के साथ हैं।
मैं: मैं किसी फरेबी के साथ नहीं हूं। मैं आम नागरिक हूं। मैं सचाई के साथ हंूं।
वो: तो फिर एक बार आंखें खोलो और मुझे देखो मैं जनता हूं
मैं: हां हां कुछ कुछ पहचान में तो आईं
वो: मैं जनता हंू। हर कोई दावा करता है कि जनता ये जानना चाहती है। जनता ये सवाल पूछ रही है। कुछ लोग और कुछ चैनलों के स्वयंभू विचारक प्रस्तोता ये दावा करते हैं कि वो मेरी ओर से सवाल पूछ सकते हैं। किसी को भी कटघरे में खड़ा कर सकते हैं। किसी पर कुछ भी आरोप लगा सकते हैं। मैं ये बताना चाहती हूं कि ये जो कोई भी हों मैं नहीं हूं। ये लोग मेरे प्रतिनिधि नहीं हैं। ये मेरे सवाल नहीं उठा रहे। ये कुछ अपने सवाल उठा रहे हैं।
मैं: तो तुम्हारे सवाल क्या हैं
वो: मेरे सवाल बहुतेरे हैं। मैं पूछती हूं कि दवाईयां इतनी मंहगी क्यों हैं ? इलाज इतना मंहगा क्यों है। जो दवाई 2 पैसे में बनती है वो बीस रूपये में क्यों बिकती है। गरीब आदमी के लिए कानून और न्याय इतना मंहगा और पंहुच के बाहर क्यों है ? हर आदमी के लिए सम्मान से जीने लायक रोटी कपड़ा मकान क्यों नहीं है ? पुलिस इतनी अत्याचारी क्यों है? क्यों अन्ना का अनशन मायने रखता है और इरोम शर्मिला का अनशन मायने नहीं रखता। क्यों ममता बनर्जी के हर शर्त मंजूर है और क्यों इरोम शर्मिला की कोई बात मंजूर नहीं। क्याों मातृभाषाओं की हत्या की जा रही है ? क्यों अपनी मातृभाषा बोलने वाला अपमानित है और क्यों अंग्रेजी बोलने वाला गौरवान्वित है। क्यों पंडे पुजारी व्यापारी संत ज्योतिषी जनता पर लादे जा रहे हैं और क्यों विज्ञान के पीछे सब लठ्ठ लेकर दौड़ रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या पर रोक क्यों नहीं है। क्यों सारा देश कांक्रीट के जंगल में बदला जा रहा है। चौबीस डिब्बों की टेन में दो जनरल डिब्बे क्यों होते हैं ? क्यों जनता इन डिब्बों में ठूंसी जाती है और सफर करने को मजबूर होती है। क्यों देश का मजदूर किसान चर्चा से गायब है? क्यों देश की गरीब जनता के दुख दर्द किसी चैनल किसी आंदोलन का मुद्दा नहीं हैं ?
    इसीलिए जो बोले की वो जनता है। जो कहे कि जनता जानना चाहती है। जनता पूछ रही है। वो झूठा है। मक्कार है।

    ........सुखनवर
29 03 2012

Friday, March 16, 2012

जिम्मेदारी की भावना

अब देखिये साहब कि हमारी पार्टी देश में नंबर दो की पार्टी है। हमने पांच राज्यों में चुनाव लड़ा। एक दो जगह हम जीते या जीतते रह गए। जहां हम जीते वहां की किसी ने चर्चा नहीं की मगर उत्तर प्रदेश में हम हार गए तो हर कोई हमें टोंच रहा है। क्यों हार गए। पहले तो सरकार बनाने की बात कर रहे थे। अब बिलकुल चुप बैठे हो घर मंे छुप कर। अरे हार गए तो हार गए। अब कोई हारने के लिए चुनाव लड़ता है क्या ? हमने भी लड़ा। जैसे औरों ने लड़ा। अब हार जीत महत्वपूर्ण नहीं रह गई है। अब महत्वपूर्ण है मैदान में बने रहना। वामपंथियों ने यही तो गलती की है। मैदान से ही भाग गए। अब तो साहब क्या बताएं कोई पूछता तक नहीं है कि वामपंथी कितनी सीट लड़ रहे हैं। वो अपनी दो चार सीटें लड़कर हार हूर कर पॉलिट ब्यूरो की मीटिंग करने लगते हैं। मगर हम क्या खा के वामपंथियों का मजाक उड़ाएं ? अयोध्या तो उत्तर प्रदेश में है। भगवान राम तो हमारे हैं। लोग रास्ता चलते पूछ लेते हैं चिढ़ाने के लिए ’क्यों भई राममंदिर बनने की कोई तारीख मुकरर्र हुई की नहीं ?’
ये बात तो साहब सच है कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती। एक बार माहौल बन गया था तो जीत गए थे। मगर बस एक ही बार तो चढ़ी काठ की हांडी। उसके बाद से दो नंबर तीन नंबर चार नंबर की लड़ाई चल रही है। वो तो भला हो इन टी वी वालों का। हर चैनल वाला रोज शाम को कुश्ती का जंगी मुकाबला आयोजित करता रहा। तो खबरों मंे हम लोग बने रहे। बिना बात की बात पर बहस करते, कीचड़ उछालते दिन कटते रहे। यूपी के साथ एक और मुश्किल है। इसकी विशालता। इसका क्या करें। आपको मालूम है कि नहीं कि यदि यूपी भारत का एक प्रांत न होकर स्वतंत्र देश होता तो दुनिया का पांचवां बड़ा देश होता। इस विशाल प्रदेश में एक दिक्कत ये है कि कोई प्रांत का वासी तो है ही नहीं। कोई यादव है तो कोई लोधी है तो कोई जाटव है। अब भैया हमारी तो बुनियाद ही है कि हिन्दू मुसलमान के फसाद में कुछ खा कमा लेें। मगर यहां तो कोई हिन्दू है ही नहीं। दूसरे मुसलमान इतनी तादात में हैं कि जीती बाजी पलट दें। इसीलिए हम लोग नरेन्द्र मोदी को कहें कि हे हिन्दू हृदय सम्राट दया करें और उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए न आएं। आप गुजरात ही सम्हाले रहें। यही बहोत है। यहां आपकी शकल दिखी नहीं कि हमारी दो चार सीटें गईं।
आपको बताएं कि ये उत्तर प्रदेश का चुनाव क्या है साला महासमर है। देश के किसी प्रदेश में इतनी मेहनत नहीं लगती जितनी यहां लगती है। हर कार्ड निकालो और खेलो। उमा भारती तक को मैदान में उतार दिया। पिटी गोट क्या कर लेती। उनकी क्या हैसियत है ये उनने खुद ही नाप लिया है। अब वापस किसी तरह पार्टी में आ गईं तो इससे वोटर को क्या फर्क पड़ता है। उनके कहे से कौन वोट देगा। उधर कल्याण सिंह नाम का एक वोट कटवा मैदान में उतर गया। उमा भारती आ गईं तो दो चार बड़े नेता घर बैठ गए। कह दिया कि अब उन्हीं से प्रचार करा लो। हम लोग तो मूर्ख हैं जो यू पी में इतने दिनों से पार्टी चला रहे हैं।
सबसे बढ़िया बात तो ये हुई भैया कि उधर चुनाव हारे और इधर राहुल गंाधी ने कह दिया कि ओ के मैं हार की जिम्मेदारी लेता हूं। नहीं लेते तो भी तो हारे ही रहते। मायावती से किसी ने पूछा भी नहीं और उनने कोई हार की जिम्मेदारी नहीं ली। वो किससे कहें हर बात की जिम्मेदारी तो उनने वैसे ही ले रखी है। उनकी पार्टी में केवल एक मेम्बर है। मायावती खुद। बाकी कोई की हिम्मत है कि कह सके कि बसपा उसकी है। जैसे तृणमूल कांग्रेस में एक मेम्बर है। ममता बैनर्जी। जैसे एडीएमके में एक मेम्बर है जयललिता। इनके यहां कभी पार्टी की मीटिंग नहीं होती। वैसे सचाई तो यही है कि कांग्रेस में भी एक ही मेम्बर है। सोनिया गंाधी। कितना महान लोकतंत्र है। विधायक दल की बैठक होती है। सारे विधायक मिलकर एक आदमी नहीं चुन पाते मुख्यमंत्री के लिए। वे सोनिया जी को अधिकृत कर देते हैं। और जब सोनिया जी मुख्यमंत्री की लाटरी निकाल देती हैं तो यही अनुशासित विधायक सड़क पर उतर आते हैं।
आप लोगो को मालूम भी नही होगा कि उत्तर प्रदेश में हमारी पार्टी का अध्यक्ष कौन है। चुनाव हारने के बाद उन्होंने एक दो दिन इंतजार किया। जब किसी ने उनसे कुछ न पूछा, न हार के कारण पूछे न स्तीफा मांगा तो उन्होंने अचानक बयान दे दिया कि मैं पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेता हूं और इस्तीफा देता हूं। फिर भी किसी ने कुछ नहीं कहा। न इस्तीफे पर कुछ कहा न जिम्मेदारी पर कुछ कहा। हमने कहा कि भाई चुनाव का मैच ड्रा नहीं होता। इसमें तो कोई एक ही जीतेगा। बाकी तीन को हारना ही है। काहे हलाकान हो रहे हो। अब लोकसभा के चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेने की तैयारी करो। और अपनी पार्टी की हार को ज्यादा भावुकता में मत लो। ..........................................सुखनवर

16 03 2012

Tuesday, March 6, 2012

फर्म की मालकिन का लड़का

अब क्या है कि साहब हम तो इसी फर्म में काम करते करते बूढ़े हो गये। तरक्की भी हुई। ऐसा नहीं है कि बस निचले दर्जे के कार्यकर्ता बने रहे। शुरू में तो सबकोई छोटे दर्जे वाले ही रहते हैं। फिर धीरे धीरे फर्म में पकड़ बढ़ाई। कामधाम समझ में आया तो फिर राह निकलती गई। छोटे से कार्यकर्ता से आज फुल साइज नेता हैं। इलाके में पकड़ है। पकड़ है मतलब हम लोगों का काम करा देते हैं। सेवा भाव। लोग मानते हैं। अब तो उम्र ज्यादा हो गई है तो उसका भी फायदा मिलता है। वरिष्ठ नेता।
वरिष्ठ नेता हैं तो लोग उम्मीद करते हैं कि हमको पूछा जाए। हमसे सलाह ली जाए। मगर अपने को ऐसी कोई गलतफहमी नहीं है। अपने को मालूम है कि नौकर नौकर होता है। मालिक मालिक होता है। अपने को ये भी मालूम है कि अपने को कभी मालिक बनना नहीं है। मालिक बनने की कोशिश करोगे तो नौकर भी न रह पाओगे। तो अपनी इसी साफ समझ का नतीजा है कि अपने हाथ में लड्डू ही लड्डू हैं। कमा रहे हैं। इतना कमा चुके हैं कि सात पीढ़ी खा सकती हैं मगर आप कभी हमारी हालत देखो ऐसा लगेगा कि दस पांच रूपये दान कर दो। बेचारा है। ये तरीका है। दीन हीन बने रहने से ही आदमी विश्वासपात्र बन पाता है। जब तक बड़े आदमी के सामने छोटे नहीं बनोगे तब तक बड़े आदमी को कैसे लगेगा कि वो बड़ा आदमी है ?
अब आपको अपनी फर्म की बात बतायें। फर्म पुरानी है। जिनकी थी वो कबके मर खप गये। उनके जमाने में तो फिर भी कुछ पुराने लोगों की पूछ थी। फिर नए लोगों ने फर्म सम्हाली। नए लोगों ने फर्म बनायी तो थी नहीं उन्हें तो बनी बनाई मिली। तो उन्हें लगा कि फर्म चलाने का मतलब है फर्म में काम करने वाले सारे नौकर चाकरों को हांको और काम कराओ। किसी को पुचकार दो किसी को फटकार दो। तो साहब ये दौर भी चलता रहा। नए मालिकों को भी लगा कि ये तो अच्छा है। ये नौकर लोग तो चीं नहीं बोलते। चाहे जो करो भागते भी नहीं हैं और मन लगा कर काम करते हैं। ऊपर से दिनरात मालिकों का जिन्दाबाद बोलते हैं। कभी कभी इक दुक्का लोगों का जमीर जाग गया। उन्हें आत्मसम्मान की सूझने लगी। फर्म छोड़कर बैठ गये। किसी ने अपनी खुद की फर्म डाल ली। साल दो साल चली फिर माफी आफी मांग के वापस आ गये। हमारी फर्म की एक खास बात है। रूठे को मनाते नहीं और लगे तो एकाध धक्का और दे देते हैं मगर माफी मांग ले तो माफ भी कर देते हैं।
साहब बड़ी फर्म है। पूरे देश में ग्राहक हैं। पूरे देश में सेल्समैन हैं। कभी किसी स्टेट में कब्जा हो जाता है तो कभी किसी स्टेट से छूट भी जाता है। पहले तो पूरे देश में एक छत्र राज्य था जनाब। हम सबके जलवे थे। फिर फर्म की पालिसी में कुछ फेर बदल हुआ तो जनता को लगा कि नई फर्मों को मौका देना चाहिए। तो जब से ये अलग अलग राज्य बने और हमारे मालिक लोगों की पकड़ कमजोर हुई। समय के साथ अपने को बदला नहीं तो हो गई दुर्गत। अब जिनको दरवाजे में खड़े नहीं होने देते थे उनके साथ साझेदारी फर्म बनाना पड़ रही है। दो कौड़ी के लोग अब ठाठ के साथ हमारे मालिकों के साथ बैठते हैं और वो कुछ नहीं कर पाते। अब यही तो होता है साहब यहां धंधा बिगड़ा उधर ग्राहक भागा। जो हमारे ग्राहक थे जो हमारे सेल्समैन थे वो दूसरों का मंजन बेच रहे हैं। हमी को धंधा सिखा रहे हैं। अब हम नौकर लोग समझते सब हैं मगर क्या करें किसके सामने रोना रोयें। सामने देख रहे हैं कि फर्म की लुद्दी सुट रही है मगर चुप हैं। क्या करें।
मगर साहब अपने देश की ग्राहकी भी अजीब है। एक बार उसी साबुन को मना कर देंगे दूसरी बार उसी साबुन से घिस धिस के नहाएंगे। वाह रे देश। आप तो जानते हैं कि दो बार हमारी फर्म की दुकान में ताला लग चुका है। मगर फिर हमारी फर्म चल निकली। बस कुछ नहीं। हमारी मालकिन घर से निकलीं। उनने कहा देखती हूं कैसे हमारा साबुन नहीं बिकता। अरे साहब क्या बताएं आपकों जनता तो टूट पड़ी। हम खरीदेंगे हम खरीदेंगे। अब हम सब सेल्समैन लोग भी भौंचक। अरे वाह यार अपनी फर्म तो फिर चल गई। बस फिर क्या था हम लोगों ने भी अपनी दुकानें खोल लीं। ग्राहक आने लगे।
अभी क्या हुआ कि मालकिन का लड़का बड़ा हो गया। सीधा साधा है। मालकिन ने सोचा है कि आगे से फर्म का काम भैया सम्हालेंगे। आप सब लोग बढिया मेहनत करो। तो हमें कौन बुराई है। भैया खूब आगे बढ़ंे फर्म सम्हालें। न हमारी फर्म है न हम फर्म के मालिक। आप लोग हाई कमान हो। जैसा कहो। हमें आपने कभी इस लायक बनने नहीं दिया कि हमारे कारण फर्म का साबुन बिके। आपकी फर्म आपका मुनाफा। हम तो मालिकों का हुकुम मानते हैं। नौकर आदमी।
हमने भी कहना शुरू कर दिया है कि भैया ही फर्म के मालिक बनें। वो हमें सिखायें कि साबुन कैसे बेचें। हमें उनका मार्गदर्शन चाहिए। हम उनके दिखाए रास्ते पर चलेेंगे।
चमचागिरी की हद है भैया। हमें तो अपने पर शर्म आती है मगर क्या करें हमारी रोजी रोटी तो फर्म से है। तो भैया जी जिन्दाबाद।

Thursday, December 15, 2011

अन्ना के ईमानदार चेले

अन्ना के ईमानदार चेले
हमारे शहर में एक मजदूर नेता थे। वो अभी भी हैं पर अब उनके पास मजदूर नहीं हैं। वे मजदूरविहीन हैं और शरीर की अशक्तता और आदत से मजबूर हैं। जब वे शबाब पर थे तो समय समय पर उन्हें भी शहर बंद कराना होता था। उनकी ताकत कम थी। उनके चेले सभी सरकारी मुलाजिम थे। जो शहर बंद नहीं करवा पाते थे। उस समय उन्होंने एक फार्मूला निकाला। निकाला क्या एक बार अचानक निकल गया। वो बंद के एक दिन पहले मशाल जुलूस निकालते थे। मशाल जुलूस जब शहर के बीच से गुजरता था तो व्यापारी डर जाते थे। लगता था कि ये मशालें यदि आग लगाने के काम में लगा दी गईं तो अपना सत्यानाश हो जाएगा। बस दूसरे दिन व्यापारी अपनी दुकानें बंद रखते थे। बंद सफल हो जाता था। ये फार्मूला काफी दिन चला। फिर लोगों को समझ आ गया कि ये मामला क्या है। उसके बाद मजदूर नेता का बंद नहीं हुआ।
अन्ना का अनशन भी शहर बंद करने के पहले के मशाल जुलूस जैसा है। इस बार 11 दिसंबर वाला छुट्टी वाला अनशन था। काफी कम भीड़ थी। लोग भी एक दिन के मेले में नहीं जाते। दो तीन दिन तो माहौल बनाने में निकल जाते हैं। फिर ठंड के दिन। सप्ताह भर काम करने के बाद सुस्ताने को एक दिन मिला। उसमें अन्ना जी के यहां जाओ। घर में टी वी पर न देख लो। सो लोग रजाईयों के अंदर लुके हुए टी वी पर भ्रष्टाचार मिटाते रहे। अन्ना के चेले बहुत होशियार हैं। उन्हें समझ में आ गया कि ठंड में जनता भ्रष्टाचार का विरोध नहीं करेगी। विरोध ठंडा पड़ जाएगा। इसीलिए कहा गया कि यदि ठंड ज्यादा पड़ी तो अनशन बंबई में होगा। बंबई में तो होगा पर रालेगण सिद्धी में क्यों न हो ? क्योंकि वहां रामलीला मैदान वाला माहौल नहीं बनेगा। मीडिया का मसाला तो चाहिए पर दिल्ली में।
मैं काफी दिनों से खोज रहा हूं कि कोई ऐसा आदमी मिले जो चाहता हो कि भ्रष्टाचार फले फूले। हर कोई भ्रष्टाचार के विरोध में है। कल मैं सब्जी खरीद रहा था तो सब्जी वाला बोल रहा था कि वो भी भ्रष्टाचार के विरोध में है। वो अन्ना का समर्थक निकला। मुझे तो अपने आप से बहुत ग्लानि हुई। ये सब्जीवाला तो मुझसे कहीं आगे है। एक मैं हूं जो कुछ नहीं कर रहा हूं और एक ये सब्जीवाला है जो भ्रष्टाचार के विरूद्ध डट कर खड़ा है। बहरहाल मैंने एक किलो आलू लिए और घर आ गया। घर में आकर देखा कि आलू एक किलो से कम थे। आलू वाले ने डंडी मार दी थी। मैंने देखा कि उसने कई सड़े आलू अच्छे आलुओं के बीच रख दिये थे। मैं उसकी बातों में उलझा रहा और वो अपना काम करता रहा।
संवाद माध्यमों के लोग सबसे उत्साह के साथ अन्ना के साथ हैं। बल्कि ये कहा जाए कि ये आंदोलन मीडिया के भरोसे ही चल रहा है। मगर मीडिया अपने ब्रेक कर कर के विज्ञापन के पैसे कमाए जा रहा है। पिछले चुनावों से पैसा दो समाचार छपवाओ वाला काम भी चालू हो गया है। पेड न्यूज। मगर अन्ना के साथ हैं।
सवाल ये है कि भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन भ्रष्टों के विरूद्ध क्यों नहीं है। आंदोलन मनमोहन सिंह और राहुल के विरूद्ध क्यों है। चिदंबरम और सिब्बल के विरूद्ध क्यों है। जो लोग समाज के घोषित अपराधी हैं। सिद्ध भ्रष्ट हैं आंदोलन उनके विरूद्ध क्यों नहीैं उनके घरों के सामने प्रदर्शन क्यों नहीं। उनके कार्यालयों के सामने प्रदर्शन क्यों नहीं। कुछ विभाग ऐसे हैं जिनमें यदि घर का कोई आदमी भरती हो जाता है तो पूरे मोहल्ले में मिठाई बंटती है। कहा जाता है कि तनखाह तो ठीक है पर ऊपरी कमाई इतनी है कि सात पुश्तें सुख से रहंेगीै। ऐसे विभागों के सिद्ध भ्रष्टों के विरूद्ध आंदोलन क्यों नहीं ?
ंहमारे समाज में सब जानते हैं कि भ्रष्ट कौन है। किस किस विभाग में भ्रष्टाचार के मौके ज्यादा हैं। फिर भ्रष्टाचार की ताली एक हाथ से नहीं बजती। केवल पैसा खाया नहीं जाता। पैसा खिलाया भी जाता है। पैसा खिलाने वाला इतना भोला बन जाता है जैसे उसका कोई दोष नहीं है। सारा दोष खाने वाले का है। ईमानदार वो है जिसे बेईमान होने का मौका नहीं मिला। बेचारा ईमानदार।
.................................सुखनवर

Wednesday, September 14, 2011

सन्यासी की बारात उर्फ आडवाणी की रथयात्रा

भाइयो,
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि आज का हमारा यह प्रशिक्षण वर्ग तब आरंभ हो रहा है जबकि आडवाणी जी एक बार फिर रथयात्रा की घोषणा कर चुके हैं। उन्होंने घोषणा करके हम सबको चौंका दिया। हममें से किसी को मालूम नहीं था कि उनके मन में क्या पक रहा है। अचानक उन्होंने घोषणा कर दी। उनकी उम्र 84 वर्ष है। वो इस देश का कल्याण करना चाहते हैं। वो देश का प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। वो देश के प्रधानमंत्री तब ही बनेंगे जब हमारी पार्टी सत्ता में आएगी। इसके लिए वो रथयात्रा करने का निश्चय कर चुके हैं। आपको सबको याद ही होगा कि सन्1992 में जो रथयात्रा उन्होंने की थी उसकी याद करके आज भी लाखांे लोग सिहर उठते हैं। ऐसी अकल ठिकाने लगाई थी आडवाणी जी ने। रथयात्रा का प्रताप ही ऐसा होता है।
आप लोगों ने देखा ही होगा कि जब भी कोई घटना होती है तो सबसे पहले आडवाणी जी सरकार से इस्तीफा मांगते हैं। इसका कारण उनके अंदर छुपी बैचेनी है। वो देश को अपने आपके के रूप में एक काबिल प्रधानमंत्री देना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि ये सरकार जल्द से जल्द गिर जाए ताकि उनकी बारी आए। इसमे ंबुरा क्या है। हर कोई अपना भला सोचता है। पिछले बार उन्होंने एनडीए की बैठक बुलाकर अपने को भावी प्रधानमंत्री घोषित करवा दिया था। कई लोगों ने उन्हें गलत समझा वो कुर्सी के भूखे नहीं हैं। वो इतिहास बनाना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि भूतपूर्व प्रधानमंत्रियांे में उनका भी नाम हो। पुराने जमाने से प्रधानमंत्री बनने के लिए लोगों ने क्या क्या नहीं किया। कई बन गये कई नहीं बन पाये। जो बन गये वो अमर हो गये। बाकी सब अमरसिंह हो गए। चौधरी चरण सिंह और चन्द्रशेखर चाहे जैसे बने चाहे जितने दिन के लिए बने लेकिन कहलाएंगे तो भूतपूर्व प्रधानमंत्री। और एक बाबू जगजीवनराम थे। जिंदगी दे दी उन्होंने कांग्रेस के लिए मगर इंदिरा जी ने ऐसा रास्ता रोका कि प्रधानमंत्री बनने की हसरत लिए वो दुनिया से चले गए।
अब राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बातें चल रही हैं। ये कोई उम्र है प्रधानमंत्री बनने की। राहुल गांधी को खुद सोचना चाहिए कि जब आडवाणी जी जैसे सीनियर आदमी प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश रखते हैं तो उन्हें बन जाने दें। मगर नहीं साहब गांव गांव घूम रहे हैं। प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। अरे जब तुम इतनी कम उम्र में प्रधानमंत्री बनना चाहते हो तो आडवाणी जी 84 साल में प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो उसमें क्या बुराई है ? कुछ तो सोचो।
पार्टी में भी कोई कम दुश्मन तो हैं नहीं। अब जैसे तैसे कुछ सर्वे वगैरह करवा कर हमने ऐसा माहौल बनाया कि हमारी पार्टी सत्ता में आने वाली है। तो दुश्मनों ने हल्ला करना शुरू कर दिया कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाएंगे। यानी अभी खीर पकी नहीं और खाने वालों में झगड़ा शुरू। सोचो आडवाणी जी को कितना बुरा लगा होगा। उनका ही जूनियर उनका ही प्रतिद्वंद्वी। वो तो नरेन्द्र मोदी को समझा दिया गया है कि जब समय आएगा तब देखेंगे अभी से मचलना मत। पहले सरकार बनाने की नौबत तो आए। अब आडवाणी जी सामने रहेंगे तो नरेन्द्र मोदी की हिम्मत है क्या कि प्रधानमंत्री बन जाए।
हम सब को भी उन पर दया आती है। आदमी जिंदगी भर काम करे और जब इनाम लेने का मौका आए तो वरिष्ठता के नाम पर कुर्सी दूसरे को थमा दी जाए। अब देखिए राम मंदिर आंदोलन आडवाणी जी के नेतृत्व में चला। अटलजी कहीं गए नहीं। दिल्ली में बैठे गोलमोल बातें करते रहे। जब चुनाव हुए, पार्टी जीती तो प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार। अरे उन्हें खुद ही कह देना था कि आडवाणी को बनाओ सारी मेहनत उसी की है। मगर उन्हेें गृहमंत्री बना दिया। वो तो आडवाणी जी ने लड़झगड़ कर अपने को उपप्रधानमंत्री बनवा लिया तो ठीक रहा वरना गृहमंत्री को कौन याद करता। गृहमंत्री तो बूटा सिंह भी रह चुके हैं। उप ही सही प्रधानमंत्री तो कहलाए।
हम सबने तो बहुत मना किया कि अब रथयात्रा से कुछ नहीं होने वाला। जहां अपनी सरकारें हैं वहां हमारे मुख्यमंत्रियों ने कोई कम गुल नहीं खिलाए हैं। इसीलिए जबरन फजीहत नहीं कराओ। मगर माने नहीं कहते हैं कि हम तो पुरानी रथयात्रा वाले सुनहरे दिन वापस लाएंगे। अभी सन्यास ले रहे थे अब बारात निकाल रहे हैं। कुछ समझ नहीं आता इन बुजुर्गों का। ............सुखनवर
15 09 2011

Monday, September 12, 2011

अमरसिंह भी अंदर

अनेक मुहावरे हैं जैस होम करते हाथ जले जिनका मायने ये होता है कि आप किसी का भला करने गये और खुद मुसीबत में पड़ गये। अब एक नया मुहावरा बन सकता है कि आप अमर सिंह हो गये। ये तो वही हुआ कि भला करने गये और अमर सिंह हो गये। अमरसिंह एक उद्योगपति हैं। काफी पैसा हो जाने से आदमी अमरसिंह हो जाता है। और अमरसिंह हो जाने से आदमी को यह मुगालता हो जाता है कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर स्थापित है और वह शेषनाग मैं हूं। या ये दुनिया मैं चला रहा हंू। या मेरे बिना पत्ता नहीं खड़कता। आजकल मीडिया चैनलों के कारण भी बहुत लोगों को ये गुमान हो जाता है कि इस धरा पर जो कुछ हो रहा है वो उनकी इजाजत से हो रहा है।
जब पहली बार यू पी ए सरकार बनीं तो सोनिया जी ने एक पार्टी दी। सारे यूपीए दलों को बुलाया। वाम दलों को भी बुलाया। सब लोग पार्टी में अंदर थे। अमरसिंह और मुलायम सिंह भी पंहुचे। उन्हंे सोनिया जी ने बुलाया ही नहीं था। पर वामदलों ने कह दिया था कि तुम लोगों को तो बुलाना चाहिए। तुम लोग आ जाना। मगर गेट पर घुसने नहीं मिला। इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है। मगर वाह अमर सिंह। गेट से भगाए जाने को भी झेल गये। बोले हमें भोज में घुसने न मिले तो भी सोनिया जी हमारी नेता हैं। अमरसिंह के पास भांति भांति के गणित रहते हैं। उनने हिसाब लगा लिया कि अभी बुराई मोल लेना ठीक नहीं। उनने ये शिक्षा नहीं ली कि बिना बुलाये खाने पर नहीं जाना चाहिए। आत्मसम्मान की दो रोटी ज्यादा बेहतर हैं।
अमेरिका से परमाणु संधि पर जब विवाद हुआ तो वामदलों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सरकार अल्पमत में आ गई। अमरसिंह तत्काल सक्र्रिय हो गये। उन्हांेने बिना देर किए सरकार को बहुमत में लाने के लिए प्रयास शुरू कर दिये। उनके प्रयास सफल हुए। सरकार बच गई। जब शादी हो जाती है तो बहुत बार बिचौलिए के योगदान को नकार दिया जाता है। आज पूछा जा रहा है कि अमरसिंह की तो सरकार थी नहीं फिर उसे बचाने के लिए अमरसिंह ने पैसे क्यों लगाए। बातबहादुर अमरसिंह गंभीर रूप से बीमार होने के बावजूद आज तिहाड़ जेल में पंहुच चुके हैं। अमरसिंह की हालत बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की सी है। दीवाना आज जेल में है। जिस सरकार को उनने बचाया था वो आज भी है। वो सरकार बेदाग और अमरसिंह दागदार।
अमिताभ बच्चन जब मुसीबत मंे थे तब अमरसिंह ने उनकी सहायता की। वे उनके परिवार के सदस्य बन गये। यहां तक कि समाजवादी पार्टी के प्रचार के लिए निकल पड़े। जया बच्चन सांसद बन गईं। आज अमरसिंह अमिताभ बच्चन के परिवार से बाहर हैं। जया बच्चन समाजवादी पार्टी के अंदर हैं।
हमारे यहां बहुत से प्रांतीय दल राष्ट्रीय दलों से ज्यादा शक्तिशाली हैं मगर राष्ट्रीय मामलों में प्रांतीय दल और उनके नेता चुप रहते हैं। ये राष्ट्रीय सरकार में शामिल होते हैं मगर केवल मलाई खाने के लिए। मठा पीने का काम मुख्य दल को करना होता है। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा। यूपीए हो या एनडीए। जब परमाणु संधि पर विवाद चला तो लगा देश में केवल दो पक्ष हैं कांग्रेस और वामदल। बाकी सब चुप। उनके प्रांत का मामला नहीं है। उनका प्रांत तो जैसे भारत में है ही नहीं।
अमरसिंह पहले मुलायम सिंह के प्रशंसक बने। फिर सलाहकार बने। फिर मालिक बनने की कोशिश करने लगे। उन्हें लगा कि समाजवादी पार्टी उनकी हाई स्कूल छाप अंग्रेजी से चल रही है। समाजवादी पार्टी मुलायमसिंह की प्रोप्राइटरशिप कन्सर्न है। अमरसिंह उसे पार्टनरशिप में बदलना चाहते थे। मुलायमसिंह जी के सुपुत्र पार्टी का नेजा सम्हाल चुके हैं। समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह की बनाई हुई पार्टी है। वो बिना किसी अमरसिंह के सत्ता में आ चुकी है। इसीलिए आज अमरसिंह कहीं नहीं है। पहले भी उनके साथ कोई नहीं है। आज भी उनके साथ कोई नहीं है।
भारत की जनता को इन सब लोगों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्यांेकि अंदर क्या पकता है ये हम आप नहीं जानते।
.............................................सुखनवर
09 09 2011

Thursday, September 1, 2011

ब्रेंडेड आंदोलन का इवेंट मैनेजमेंट

ब्रेंडेड आंदोलन का इवेंट मैनेजमेंट
ये अच्छा हुआ कि पिछले दिनों देश से भ्रष्टाचार खत्म हो गया। जिस दिन रंग गुलाल हुई और खुशियां मनाईं गईं उस दिन के बाद से सारे भ्रष्टाचारी साधू हो गये। बहुत दिनांे से सब लोग परेशान थे कि देश से भ्रष्टाचार कैसे खत्म होगा। कब खत्म होगा ? पिछले बार भ्रष्टाचार खत्म हो ही गया था। जयप्रकाश जी ने खत्म कर दिया था। मगर फिर ऊग आया। जड़ों में मठा नहीं डाला गया था। कुछ दिन दबा रहा फिर निकल आया। उस समय जयप्रकाश जी आगे थे। भ्रष्टाचार से परेशान लोग उनके पीछे थे। इस बार भ्रष्टाचार के पुनर्जन्म की कोई गुंजाइश नहीं है। पुराना जमाना और था। उस समय भ्रष्टाचार से लड़ने के तरीके भी पुराने थे। इवेन्ट मैनेजमेंट नाम की कोई चीज नहीं थी। टी वी नहीं था। 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनल नहीं थे। इतने ओजस्वी टी वी वाले नहीं थे। अब तो टी वी वालों को देखकर लगता है कि क्या जरूरत किसी अदालत की। क्या जरूरत किसी वकील की। उत्साह से ऐसे भरे हुए कि हकलाने लगते हैं, लड़ने लगते और मुंह से झाग छोड़ने लगते हैं।
इसको कहते हैं योजनाबद्ध तरीके से काम करना। क्रमवार काम करना। एक के बाद एक कदम उठाना। अपने टाइम टेबिल पर काम करना। चौतरफा मार करना। पूरे देश में एक साथ आंदोलन। आंदोलन का झंडा होना चाहिए तो ठीक है और कोई झंडा क्यों रहे तिरंगा ही ठीक रहेगा। मगर ये क्या है लोग तिरंगा सीधे पकड़े रहते हैं। आप लोग ऐसा कीजिए कि इस इवेंट के लिए इसे ऊपर नीचे लहर के समान लहराइये। आजकल ब्रेंड के साथ ब्रंेड एम्बेसेडर, बें्रड फ्लैग, ब्रेंड कास्ट्यूम, बैं्रड स्लोगन सबकी जरूरत होती है। सारी व्यवस्था हो चुकी है। ब्रंेड स्लोगन रखो। वंदे मातरम। भ्रष्टाचार से लड़ाई का ये कैसा स्लोगन ? देखिये बहस मत करिये। हमें काम करने दीजिए। दादा जी के पीछे बैकड्राप में गांधी का बड़ा सा पोट्रेट रखो। एक दम सीधे पब्लिक के दिमाग में जाना चाहिए। एक वो गंाधी एक ये गांधी। मगर ब्रैंड एम्बेसेडर कौन रहेगा। जैसा आंदोलन है उसी टाइप का होना चाहिए। पता करो कौन हो सकता है जो कुछ दिन अनशन भी कर सके। अड़ियल हो, किसी की न माने।
पता चला कि महाराष्ट्र के एक गांव में एक लड़ाकू आदमी रहता है। कई बार अनशन कर चुका है। रामदेव टाइप नहीं निकलेगा कि तीन दिन में हवाइयां उड़ने लगें। महाराष्ट्र में कई मंत्रियांे को हटवा चुका है। अख्खड़ आदमी है। किसी की नहीं सुनता। बस एक मुश्किल है। राष्ट्रीय स्तर का नहीं है। प्रांतीय स्तर का है। चलो कोई बात नहीं। उन्हंे ही पकड़ो। मगर ध्यान रखना-आंदोलन और बातचीत हम करेंगे। हम तीनों की यह प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है। ये हमारी कंपनी का इवेंट है। इसमें जो चाहे वो आए लेकिन अपनी सीमा में रहे। जो और लोग हैं उनको भगाओ। अपमान कर दो खुद भाग जाएंगे। दादा को आगे रखो। इवेंट के हिसाब से सौ जोड़ी सफेद कुर्ता पाजामा और टोपी तो दादा के लिए रखो। आंदोलन के समय हर चार घंटे में उनकी ड्रेस बदलो। हमेशा एकदम झक सफेद ड्रेस दिखना चाहिए। टी वी पर अच्छा दिखेगा। गांधी से इनकी तुलना करवाओ। तीन चार बार राजघाट ले चलेंगे। वहां बिल्कुल गांधी टाइप मुद्रा में एक फोटो सैशन करवा देना। दादा तो महाराष्ट्र वाली टोपी पहनता है। ऐसा करो टोपी को भी ब्रेंड बनाओ। उसमें लिखो आइ एम अन्ना। बहस मत करो यार। एकाध लाख टोपी बनवा कर बंटवा दो। पैसे को मुंह मत देखा। ये क्यों क्यों मत पूछा करो।
देश का मतलब होता है दिल्ली। यहीं पर सारे टी वी वाले हैं। उनको सबसे पहले साथ में लो। दिल्ली के स्कूलों में सौ डेढ़ सौ बसंे लगवा दो। बच्चों केा ढ़ो ढ़ो कर लाएंगी। बच्चों को दे दो मोमबत्ती और तिरंगा। मंुह पे पुतवा दो तिरंगा जैसे क्रिकेट मैच हो रहा हो। माहौल खिंच जाएगा। और बात समझ लो अपना मुद्दा है। जनलोकपाल बिल। इसके बारे में पब्लिक से कोई बात नहीं करना है। इस बिल पर कोई बहस हमें करना ही नहीं है। ये बिल क्या है ये किसी को पता नहीं चलना चाहिए। बस मुद्दा ये उठाओ कि इसमें प्रधानमंत्री को आना चाहिए। इसी पर बहस चलने दो। सरकार को उधेड़ के रख दो। जनता के बीच ये संदेश चला जाना चाहिए कि देश में तीन भ्रष्टाचारी हैं। प्रधानमंत्री, कपिल सिब्बल और चिदंबरम। सरकार भ्रष्ट है मतलब केन्द्र की कांग्रेस सरकार भ्रष्ट है। दस बारह दिन तो ये दादा अनशन खींच ले जाएगा। नहीं भी खींच पाएगा तो भी अपना काम तो बन जाएगा। यदि तबियत काफी बिगड़ गई तो बिगड़ जाए। अपना काम बन जाए फिर इनका जो होना होगा सो होगा। पूरे आंदोलन को इतनी ऊंचाई पर ले जाना है कि फिर आगामी तीस साल तक कोई आंदोलन न हो पाये। जनता का सारा गुस्सा प्रेशर कुकर की सीटी के समान निकल जाए। .....................................सुखनवर
.

01 09 2011